बेईमान प्रार्थनाएँ

छवि श्रेय: कविता कादंबरी









बईमान प्रार्थनाएँ

अषाढ़ के महीने में
ये पक्के रंग वाली मेहनतकश औरतें
मय परिवार उजाड़ आईं हैं 
अपना डेरा-डंडा

बूढ़-पुरनियाँ, बच्चा-बुतरू सब लेकर
घर झारकर उठ आईं हैं
बहुत दूर

मंदिर के पीछे
और मंदिर से दूर

तालाब के किनारे
और तालाब से दूर

निखहरे लेटी हुई हैं इनकी बुढियाएं
आसमान ताकते हुए

जिनकी आंखों के लिए इस उम्र में भी
दिन में देखा गया सपना ही है
दो मुट्ठी भात

सांप बिच्छू के दिन में
घास पर नंगे ही सोए हुए हैं
उनकी गोद के बच्चे

जिनकी सांसें उनकी पसलियों के बीच
अटक-अटक कर चल रही है
यह देखने के लिये
नहीं चाहिए किसी डॉक्टर की नज़र

खड़ी दोपहर में
बाल-बच्चों को छोड़
घुटने भर कीचड़ में कछोटा मारकर
उतर जाती हैं

बाढ़ उतर जाने के बाद

कमर तोड़कर रोपती हैं धान

खुली भूख लिए
आधा पेट खाती हैं
गीत गाती हैं

और घोंघे और जोंक के दिए घावों को
गिने बिना ही
सो जाती हैं खुले आसमान के नीचे

बदले में
उनके आंचलों में पलट दिया जाता है
सूंड़ी,सुरसुरियों और मूस की लेडियों से भरा हुआ अनाज
गाय-भैंसों ने फेर लिए हैं जिनसे मुंह

भादो तक खुले आसमान के नीचे
अपने प्रवास के बाद 
लौट जाती हैं अपने देस

उनके हाथों में छोटी-छोटी पोटलियां हैं
जिनमें एक भी पोटली
कृतज्ञता की नहीं

फसल लहलहा जाती है 

जोत मालिक
आसमान की तरफ उठाता है हाथ

और उस ईश्वर को देता है धन्यवाद
जिसके पसीने की एक बूंद तक नहीं टपकी है
उसके खेत में

अपनी प्रार्थना में अर्पित कर देता है
रोपनिहारिनों के हिस्से की सब कृतज्ञताएँ

और मैं सोचती हूँ कि

इन पेट-कटवा बईमानों का
कौन सा बईमान ईश्वर है!
जो स्वीकार करता है बईमान प्रार्थनाएँ
और हड़प जाता है मेहनतकशों का हिस्सा
बिना हिचके और बिन सवाल किए

"जोत मालिक आसमान की तरफ उठाता है हाथ और उस ईश्वर को देता है 'धन्यवाद' जिसके पसीने की एक बूंद तक नहीं टपकी है, उसके खेत में; 

अपनी प्रार्थना में अर्पित कर देता है, रोपनिहारिनों के हिस्से की सब कृतज्ञताएँ"

प्रेम का हासिल

पीपल की गांछ की तरह लहलहाता हुआ प्रेम
न मेरे द्वार पर उगा न आंगन में
प्रेम में इतनी दूरी सधती भी कैसे?

वह सीधे उगा
जेठ में जली-तपी मेरी देह के ऊपर
छांव का आभास करता हुआ

इतना गहरा पैठा
कि दरक गई एक-एक कर
देह- दुनिया की सभी दीवारें

ठंडक पाती
अर्ध-निद्रित अर्ध -मूर्छित मैं
कौन सी अलौकिक शक्ति अर्जित कर उखाड़ कर फेंक देती

जाते-जाते
तुमने एक हाथ क्या लगाया
कि भरभरा कर गिर गईं 
सभी सब्ज़ा-ज़ार दीवारें

फड़फड़ाकर उड़ गए
जोड़े में बैठे आखिरी कबूतर

और अपने मर्मस्थल पर 
दुनिया के सबसे कोमल हाथों का घात लिए
धूप,आंधी,पानी में अरक्षित खड़ी मैं
नृत्य करते हुए
अपनी ही भेद्यता का उत्सव मनाती हूँ

तुम्हारे प्रेम का हासिल यही है

"वह सीधे उगा जेठ में जली-तपी मेरी देह के ऊपर, छांव का आभास करता हुआ; 
इतना गहरा पैठा कि दरक गई एक-एक कर, देह- दुनिया की सभी दीवारें"

बंजर होने का घोषणापत्र

मिट्टी की देह बंजर ही रह गई
मैंने नहीं स्वीकारे बीज
धतूरे के,

कितने ही बाजार से लौटे प्रेमियों ने 
रोपने चाहे अपने ओठों के गुलाब
मेरे माथे पर,

मैंने उनके हाथ देखे
वो किसान नहीं थे

और उनकी देह 
इत्र के भभके से भरी हुई थी

मेरी मिट्टी ने 
नहीं दी उन्हें
एक रोप की भी जगह

बच्चों का भूख से मर जाना जब रोज़मर्रा की ख़बर हो
तब बाजार की बेहयाई ही है
गुलाबों की खेती

मेरी मिट्टी ने रास्ता देखा
धान के बीज से भरे
एक किसानी हाथ का

मेरे माथे ने प्रार्थना की 
कि छूट जाएं कुछ चिन्ह उनपर
एक किसानी गीत के

लेकिन
धरती के भू-मानचित्र पर कोई किसान बचा हो तभी तो लौटे!
धरतीखोरों ने ढकेल दिया है उन्हें गर्तों में
भू-मानचित्र की सीमाओं के बाहर

और अब मेरे माथे पर उग आईं 
बड़ी-बड़ी दरारें
बंजर होने का मेरा आखिरी घोषणापत्र हैं

"लेकिन धरती के भू-मानचित्र पर कोई किसान बचा हो तभी तो लौटे! धरतीखोरों ने ढकेल दिया है उन्हें गर्तों में भू-मानचित्र की सीमाओं के बाहर"

पिता

पिता कम बोलते हैं
37 की उम्र में भी
उनसे हुई बात-चीत के मौकों को
मैं उंगलियों पर गिन सकती हूँ

पिता कभी हमारे स्कूल नहीं गए
पिता ने कभी नहीं पूछा
"कैसी चल रही है पढ़ाई?"

जब भी परीक्षाफल आया
पिता ने शाबाश नहीं कहा
उन्होंने हमेशा झिड़की दी
"आजतक इसे पढ़ते नहीं देखा"
"जब भी घर लौटा सोती ही मिली है'
"कैसे आती है अव्वल?"
और ऐसा कहते हुए
उनकी आंखें चमचमा रही होती

पिता की इन्हीं झिड़कियों ने
मेरे आत्मविश्वास को पहाड़ जैसा ऊंचा
और मज़बूत बनाया है

आज भी लगता है कि
पाँव मारूंगी तो पत्थर से भी पानी फूटेगा

और किसी भी उम्र में कर सकती हूँ 
जीवन शून्य से शुरू

मेरे बारहवीं तक आते-आते 
दादी कई-कई बार चेताती रही
मेरी ब्याह के उम्र के बारे में
उनकी पिता से कुल जमा शिकायतों में
सबसे बड़ी शिकायत रही
लड़की को घर बैठाकर बुढ़वाना

बारहवीं खत्म होते-होते
सखियों में जब-जब भविष्य की योजनाओं की बात होती
मैं घोर संशय से ठिठकी रहती हर बार
मेरे पास भविष्य के असंख्य सपने थे
मगर योजनाएं बनाते डरती ही रही
पिता पर दादी का प्रभाव
एक अनिश्चितता की तरह घेरे रहा
मेरे भविष्य की योजनाओं को

दादी बार-बार कहती
पिता कुछ न बोलते

और यूँ दादी के कहते-कहते
और पिता के चुप रहते-रहते
बीत गए दस साल
मैंने पीएचडी में दाखिला ले लिया
स्कॉलरशिप ले ली
तब जाकर हुआ ब्याह

महीनों-महीनों फ़ोन पर बात नहीं हुई
और हुई भी तो इतनी ही कि
"सब ठीक है?"
"हां ठीक है"

जब-जब रातें ज़रूरत से अधिक बाढ़ी और अंधेरी हुईं
कि पाँव उठाऊँ भी तो धरने की जगह दिखाई न दे
तड़के ही माँ का फ़ोन आ गया
कि जाने क्यों रात भर नहीं सोए हैं पिता
कहते हैं कि बच्चों का कुछ हाल-चाल लो 

पिता का प्रेम झिड़की, चुप्पी और चिंताओं की शक्ल में
हमारी खाट के सिरहाने बैठा रहता है चुपचाप

मैं जो सत्ताओं के भय को अंगूठे पर रखकर उछाल देती हूँ

वो किसी और की नहीं मेरे पिता की देन है 

"पिता का प्रेम झिड़की, चुप्पी और चिंताओं की शक्ल में, हमारी खाट के सिरहाने बैठा रहता है चुपचाप; मैं जो सत्ताओं के भय को अंगूठे पर रखकर उछाल देती हूँ, वो किसी और की नहीं मेरे पिता की देन है;"

पलाशी

मैं फूलों के गांव की कल्पना करती हूँ
दृश्य पटल पर उभर आते हैं
इंद्रधनुषी रंग

फूलों के साथ
तितलियों के, चिड़ियों के
खुशरंग खिलखिलाते लोगों के

मैं फूलों के गांव की कल्पना करती हूँ
जीभ पर उतर आता है स्वाद
मकरंद का और मीठी बोलियों का

मैं फूलों के गांव की कल्पना करती हूँ
हवा में उतर आती है गन्ध
सखुआ,बेला,गुलंच की

मैं फूलों के गांव की कल्पना करती हूँ
होठों पर उतर आते हैं गीत
देह में उतर आता है जांगर

मैं फूलों के गांव की कल्पना करती हूँ
हवा में खुल जाते हैं हाथ
पांवों में उतर आती है लय

मैं नहीं चाहती 
कि मैं फूलों के गांव की कल्पना करूं
और मुझे खोपा में फूल न दिखे
आंखों में उतर आए रक्तरंजित दृश्य
कानों में गोलियों की तड़तड़ाहट
हवा में बारूद की गंध
जीभ पर लोहे का स्वाद
और पहाड़ों और जंगलों में विलाप

जैसे मैं प्लासी का नाम लूँ
और स्मृतियां खून से लथपथ हो जायें

वहां किसने बोयी थी बंदूकें?
किसने काटा था लोहा?
और किसने दागी थी गोलियां?

कि हमारी जीवनराग की कल्पनाओं से निष्काषित ही हो गया
वह सुंदर, लाल, पलाश के फूलों का गांव
जहां बनते थे गुलाल
प्रेम के उत्सव के लिए

आज भी कोई है जो बो रहा है बंदूकें
काट रहा है लोहा
और दाग रहा है गोलियां

अबकी उनके हाथों में
संविधान के पन्ने भी हैं

और फिर से 
खतरनाक ढंग से
जीवन-राग की कल्पनाओं से निष्काषित हो रहे हैं धीरे-धीरे
हमारे फूलों के कितने सुंदर गांव

खरसावां,बस्तर,बीजापुर, सुकमा,सारंडा....

"हमारी जीवनराग की कल्पनाओं से निष्काषित ही हो गया, वह सुंदर, लाल, पलाश के फूलों का गांव, जहां बनते थे गुलाल, प्रेम के उत्सव के लिए

आज भी कोई है जो बो रहा है बंदूकें, काट रहा है लोहा और दाग रहा है गोलियां"

मरे हुए लोग

कोलतार की तरह
अंधेरा इतना गाढ़ा है
कि राह टटोलते चलिए तो
पोर-पोर धँसिए

बन्द कानों में
क्रंदन सा
गूंज रहा है सन्नाटा

आदमखोर गिद्धों के
विशाल पंखों की फड़फड़ाहट
सिर के ठीक-ठीक ऊपर है

खूनी, कर्मठ,क्रूर
नुकीली चोंचें
आंखों के ठीक सामने है
नज़र को नोच लेने को तैयार

भाग रही हूँ
छुप रही हूँ
बन्द कर रही हूँ
एक-एक दरवाजे,खिड़कियां और रौशनदान
मिचमिचा कर मूँद रही हूँ 
दोनों आंखें

बन्द पलकों के भीतर भी
खड़े हो जा रहे हैं आकर

गिद्ध उत्सव के अनगिनत
नुचे,बचे-खुचे
अधजले शव

नदियों,घाटों, कब्रों 
और जंगलों से उठकर 

मुट्ठी भर-भर
चिता की राख
मल रही हूँ चेहरे पर
कि आईना देखूँ भी तो
डर न जाऊँ कहीं

मुर्दा चुप्पियों के सामने 
बड़बड़ाते हुए भी मैं
ज़िंदा होने की तमाम जिरहें 
हार रही हूँ...हार रही हूँ...हार रही हूँ

"मुट्ठी भर-भर चिता की राख मल रही हूँ चेहरे पर, कि आईना देखूँ भी तो डर न जाऊँ कहीं"

मनुष्य होने का नियम

पक्षी होने के नियम के विरुद्ध
दुनिया के सारे पक्षी
ऊंचाई से गिरकर मर जाने के भय से
अपने पंख नोच लें
और लोटने लगें किसी तानाशाह के कदमों में

मछली होने के नियम के उलट
दुनिया की सभी मछलियां
डूबकर मर जाने के भय से
छोड़कर भाग जाएं
अपने तालाब, नदियां और समंदर

तो क्या बहुसंख्यक होने भर से
बदल जायेगा
पक्षी या मछली होने का नियम?

कायर, क्रूर और मदांध भीड़ के बीचो-बीच
अकेले खड़े तुम
और तुम्हारी भंगिमा में अभय

प्रेम और स्वायत्तता पर तुम्हारा अखंड विश्वास
और जयकारे करते असंख्य हाथों के बीच
प्रतिरोध में तनी तुम्हारी इकलौती मुट्ठी

तुम्हें देखती हूँ तो लगता है
कि बहुसंख्यक अपवादों के बीच
इकलौता खड़ा है

मनुष्य होने का सार्वकालिक नियम

"प्रेम और स्वायत्तता पर तुम्हारा अखंड विश्वास और जयकारे करते असंख्य हाथों के बीच प्रतिरोध में तनी तुम्हारी इकलौती मुट्ठी;

तुम्हें देखती हूँ तो लगता है कि बहुसंख्यक अपवादों के बीच इकलौता खड़ा है-'मनुष्य होने का सार्वकालिक नियम'



नाम: कविता कादंबरी
जन्म: 04 फरवरी 1984

◆इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक, बी.एड. और मध्यकालीन इतिहास विषय में परास्नातक। 
◆काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एम.एड व शिक्षाशास्त्र विषय में शोध करने के बाद से दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के शिक्षापीठ में शिक्षणरत एवं शिक्षा के सांस्कृतिक वर्चस्ववादी स्वरूप पर सवाल खड़ा करते हुए एक जनपक्षधर शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए सामूहिक रूप से प्रयासरत।

◆अदहन, सदानीरा, समकालीन जनमत, वागर्थ और पक्षधर आदि पत्रिकाओं में समय-समय पर कविताएँ प्रकाशित।

निवास: फ्लैट नंबर 101, ब्लॉक-ई, प्यारा घराना कॉम्प्लेक्स, चंदौती मोड़,गया, बिहार -823001
◆मोबाइल नंबर: 7258810514
◆ईमेल: singhkavita.bhu@gmail.com