जुम्बिशें

छवि श्रेय: संदीप नाईक









जुम्बिशें
 
जीवन वो नही जो पत्तियों की सरसराहट में था
वो भी नही था - जो सपनों में आता
कुछ पाने को लेकर यात्राएँ की लंबी - लंबी
छद्म रचते - बुनते उम्र बीत गई
उस पानी में भी नही मिला जो कल कल बहता

सब बीतने के बाद याद आया कि जीवन
कोमल नवजात पत्तियों की हंसी में था 
जुगनुओं की रुनझुन में था
भोर में पेड़ पर आ बैठी चिड़िया की बोली में था
लम्बे रास्तों पर था जिनपर घने पेड़ों की छाँह थी

जीवन वो नही था जो मैं सोचता था
जीवन यही था जो रोज़ - रोज़ घटित होता
हर बार चमत्कृत करता था
रोता, हँसता और अँधेरी रात में तैयार होता लड़ने को
कि कल फिर लौटेगा - चढ़ते सूरज के संग

सुनी है नीम या पीपल के पत्तों की सरसराहट
देखा धनराज को जमीन से दाना चुगते हुए
देखा है पानी को चट्टान काटते हुए
एक नदी को इठलाते या
झरने को ऊँचाई पाने के बाद गिरते हुए 

जीवन को सोचिये मत, घटित हो जाने दें

"जीवन वो नही था जो मैं सोचता था; जीवन यही था जो रोज़ - रोज़ घटित होता, हर बार चमत्कृत करता था;  रोता, हँसता और अँधेरी रात में तैयार होता लड़ने को कि कल फिर लौटेगा - चढ़ते सूरज के संग"

साहचर्य 

महज दो पेड़ नही
दशको पुराना साथ 
पुष्पित पल्लवित होने और
वसंत, पतझड़ और आषाढ़ 
संग साथ भोगने का

ये इतने गुत्थ गए दशको में
कि दोनों की छाया पहचानना 
मुश्किल या अलग कर पाना
सिर्फ इसलिए ज़िंदा है अब कि
दोनो साथ है, पर अमरबेल की 
तरह नही है इनका संग  

इनकी जड़ें भी घुलमिल गई है
पत्तियाँ, टहनियाँ और वायवीय जड़ें भी
स्त्री किसी अनजान पुरुष के प्रेम में
रम जाती है प्रेम में डूबकर जैसे
और उनकी कहानी बनती है ऐसे ही

पृथ्वी पर प्रेम और साहचर्य बना रहें
इसकी कामना करते हुए मैं
इन पेड़ों तले सो जाना चाहता हूँ
ताकि बचा सकूं इन्हें उन हाथों से
जो इनकी ओर उठेंगे
 
"पृथ्वी पर प्रेम और साहचर्य बना रहें, इसकी कामना करते हुए मैं इन पेड़ों तले सो जाना चाहता हूँ; ताकि बचा सकूं इन्हें उन हाथों से जो इनकी ओर उठेंगे"
 
अंगना जइयो 

कहना कि कोंपले फूटने लगी है 
उसे कहना कि बूंदे बरसने लगी है
कहना कि गूलर पकने लगे है
रैन लिली के फूल झुंड में आते है 

कहना कि नदी का बहाव कम है
कहना कि कुएं की मुंडेर तक 
पानी आने में समय है अभी
शाम भीगी रहती है हल्की सी
 
कहना कि उसे ही याद करता हूँ
और कारे बादल छा जाते है
इंतज़ार में धूप निकल आती है
गीली मिट्टी से मूरत बना रहा हूँ  

उसे कहना कि सावन के पहले आ जाये
झूलों की पींगे दूर तलक ले जानी है

"कहना कि कोंपले फूटने लगी है, उसे कहना कि बूंदे बरसने लगी है, कहना कि गूलर पकने लगे है, रैन लिली के फूल झुंड में आते है...

उसे कहना कि सावन के पहले आ जाये"

निस्संग 

दिन उदासी भरे थे
रातें काली और लम्बी
ऊंघती अनमनी दोपहर
अक्सर भीगी शाम लाती

जीवन के दुख 
भीगते मकई के दानों की तरह थे
थोड़ी सी बूंदों में उग आते
पहले घास और फिर फल देने लगते 

समय का ही खेल था
सघन से विरल होते - होते
एकाएक सन्नाटे में बदला
सब कुछ झीना था
हल्का, मुलायम, पारदर्शी  

गोया आहट हो एक 
यूँ कि
कोई यहाँ पांच दशक से था
और एकदम से 
बिना बोले उठकर चल दिया

अचानक ही खत्म होता है जीवन
सबको छोड़ना पड़ता है अचानक

"जीवन के दुख भीगते मकई के दानों की तरह थे; थोड़ी सी बूंदों में उग आते, पहले घास और फिर फल देने लगते"

शोक की इस दोपहरी में

अहीर भैरव, भैरव, तोड़ी और ललित
सुबह के राग इतने गूँथ गए है जीवन में कि
मालकौंस, दरबारी कान्हड़ा और यमन को भूलने लगा हूँ
असावरी के धोखे में पूर्वा धनश्री गाता हूँ 

तीन ताल में निबद्ध जीवन की थाप
मंद सप्तक सी बजती रहती है हर पल
लय बिखरती - टूटती है जैसे 
सूख गए हो राग अश्रुओं की तरह 

जीवन सुरों, रागिनियाँ और वाद्य यंत्रों से भरा होता तो
आज ये अवरोह के बीच यूँ सुर उदास ना होते
अपने आहत मन में इकतारा झनझनाता हूँ
पर शब्द रुन्ध जाते है कंठ में 

लौटना होगा कसते हुए जीवन वीणा के तारों को
एक अनहद नाद की तरह बजना होगा 
एकनिष्ठ सा आलाप लेते और सतत अभ्यास करते हुए

गुरु पौर्णिमा दूर है अभी 
गाओ समवेत स्वर में , गाओ वृन्द गान गाओ

पिछली सदी की हीरोइनें

बुआएँ पिता की लाड़ली थी
उतनी ही जितनी हमारी बहनें हमारी है 
उनमें भी उतना ही प्रगाढ़ रिश्ता था 
और उन सबने भी छोटे कमरों में 
बड़ा जीवन साथ बिताया ठीक हमारी तरह

पिता बताते थे जब वे सज कर निकलती थी
तो बाखल के लड़के सीटी मारते थे
वे बहनें सौ पचास की नौकरी में भी खुद के
खर्च के साथ घर मे हाथ बंटाती थी माँ का
दो साड़ी में जीवन निकाल दिया उन्होंने
साधारण पति से निबाह कर संतुष्ट रही 
उफ्फ नही किया, ना कभी शिकायत की 
गाय की तरह रह ली गउ पति के साथ 

अब जीवन बदल रहा है हमारे साथ 
बहनों का और बच्चों का हमारे तो 
लगता है कि अब के सारे तीज त्योहार 
शगुन के लिए मनाए जा रहें हैं हम 
इस तरह कि बच्चों को याद रखवा पाएं
नाम, रिश्तें, शहर, गांव और स्मृतियों के द्वार

इकठ्ठे होने पर हंसते है तीसरी पीढ़ी के बच्चे 
बातों को गौर से सुनकर फ़टी है आंखें उनकी
कुछ इस तरह कि क्या बकवास है 
वे टटोलते है पंक्तियों के बीच गहराई
बातों के अर्थ बूझ नही पातें 
अचकचा जाते हैं 
परिधानों में ब्रांड की अनुपस्थिति
जूतों के पुराने ढर्रे देखते है 
पसीने से महकते कमीज
काले ललाट, चीकट बटुए 
और दस बीस के नोट को सम्हालते हमें
देख मुस्कुराते है हौले से 
और दांत दबाकर निकल लेते है 
हममें से ही 

पिता की बहनों से हमें मजाक करते देख
वे औचक से देखते है और आश्चर्य करते है
उन्हें लगता है कि इन बूढ़ों की हंसी कैसी,
इतना उन्मुक्त और जीवन के प्रति मोह कैसा
राखी, भाई दूज और हरियाली अमावस्या 
होली, शरद पौर्णिमा को ढकोसला मानते
ये असहज हो जाते है, मिलने के नाम पर 
संयुक्त पारिवारिक मौकों पर भाग लेते है 

इस सबके बावजूद हम भी ढीट की तरह
खींच लेते है इन आयोजनों में जबरन उन्हें 
मजबूर कर देते है कि वे सुनें बातें हमारी
खाये घर के बनें मिष्ठान्न और नमकीन
पिता की बहनों के आगे झुका देते है इन्हें 
बीस - पचास रुपया पा जाते है इनसे
इस बहाने उनकी स्मृति में चित्र बनें रहें 
 
कल जब हम ना होंगे तो उनके पास 
कुछ किस्से तो हो - प्यार मुहब्बत 
और अपनत्व के किस्से जो भीगो दें कभी 
पिता की बहनों की चाल पर ही हंस लें भले
एक रुपये की सेंव और कचोरी जेहन में रहें 

हम डर रहें है और हर उत्सव पर 
मिल लेतें है कल जो तस्वीर खींची जाएगी 
तो जाने कौन अनुपस्थित होगा 
उस तस्वीर में दाहिने से तीसरा 

 [ मेरी चार खूबसूरत, सुरीली बुआओं को समर्पित ]

"बुआएँ पिता की लाड़ली थी, उतनी ही जितनी हमारी बहनें हमारी है; उनमें भी उतना ही प्रगाढ़ रिश्ता था और उन सबने भी छोटे कमरों में, बड़ा जीवन साथ बिताया ठीक हमारी तरह"

यात्रियों से अनुरोध 

लम्बी यात्रा होती थी
एक ही ट्रेन चलती थी यहाँ से
एक बार ही साथ गए थे इतना लंबा
माँ, बुआ, चाचा और हम सब पिता के साथ
 
लोग कहते थे - "नर्मदा एक्सप्रेस भी कोई ट्रेन है
इतनी धीमी चलती थी कि पैदल चलना बेहतर
ना पानी, ना खाना, ना फर्स्ट क्लास का डिब्बा" 
पर लकड़ी की बेंचनुमा सीट मजबूत होती थी

चाचा की नौकरी वही थी पहली और आखिरी भी
नई चाची हिम्मत वाली थी, 
जो शादी के बाद उस जंगल चली गई 
जहाँ दूध मिलना भी दूभर था, 
सब्जी तो हाट में ही मिलती थी 

सत्तासी की प्रचण्ड गर्मी में पहली बार 
चाचा से मिलने चचाई गए थे
अमलाई स्टेशन पर लेने आया था 
चाचा एक महेंद्रा जीप में
बिजली विभाग की जीप राख के धुँए से होते ले गई उसके मकान में

आठ भरपूर दिन जिये हम लोग उस मकान में, जो सरकारी था
गर्मी की दोपहरियाँ, बिजली संयंत्र की चिमनियां 
जीवन को कितना काला बना देती है और फिर 
छोटी सी कॉलोनी की दुनिया जो सिर्फ 
कृत्रिम मुस्कुराहटों पर आबाद थी 

उसी ट्रेन से लौटने के अलावा कोई विकल्प नही था
पिता के साथ यह पहली और आखिरी लम्बी यात्रा थी
फिर जीवन भी इसी ट्रेन जैसा हो गया 
छिन्न भिन्न, कभी भी कही भी रुक जाता और 
चंदिया स्टेशन की सुराहियाँ भी किसी
जीवन को जीवित नही कर पाई 

पिता बीमार रहने लगे ट्रेन की तरह
महीनों किसी स्टेशन पर खड़े रह जाते 
मौत से क्रॉसिंग के इंतज़ार में 
अस्पताल में पड़े रहते
शंटिंग करके लौट आते पर फिर क्रॉसिंग होता 
जीवन का बीमारी से,
हम हमेशा ट्रेन के चालू होने के इंतज़ार में रहते
उनसे वादा करते कि ठीक हो जाओ 
जगन्नाथ पुरी चलेंगे एक बार  

मुकाम पर पहुंचना ही था सबको -
पहले पिता, चाचा, फिर माँ और बाद में भाई, 
एक चाचा और अभी - अभी बुआ
हिलते डूलते सारे के सारे रेलवे फाटक तोड़कर 
अपनी - अपनी मंजिलों पर पहुंच ही गए है 

चचाई, अब भी एक जगह है जहाँ जाने के लिए 
अमलाई ही उतरना पड़ता है आज भी
ट्रेन अभी भी एक ही इधर से पर अब गति बढ़ गई है, सुविधाएं भी 
पर मैं डरता हूँ ट्रेन में चढ़ने से 
 
उधर जाता हूँ तो ट्रेन, चचाई और वह अंतिम यात्रा याद आती है
नर्मदा एक्सप्रेस ट्रेन नही, एक गैलरी है
स्मृतियों की 
उसकी हर सीट पर मेरी छाप है
यह ट्रेन मेरे जीवन के सारे स्टेशनों पर
उदासी की चादर ओढ़कर चलती है किसी अनंत में 

आज मैं एक छोटे से स्टेशन के कच्चे प्लेटफॉर्म पर 
किसी सूने कोने में पड़ी बेंच पर बैठा हूँ
जिस पर लिखा है 
"यात्री, अपने सामान की रक्षा स्वयं करें"

"आठ भरपूर दिन जिये हम लोग उस मकान में, जो सरकारी था, गर्मी की दोपहरियाँ, बिजली संयंत्र की चिमनियां, जीवन को कितना काला बना देती है और फिर, छोटी सी कॉलोनी की दुनिया जो सिर्फ कृत्रिम मुस्कुराहटों पर आबाद थी"

आस्था 

इन धागों में क़ैद है 
आस्थाएँ 
असँख्य विश्वास
उम्मीदें और ख़्वाब 

मुझे याद करना 
तो आँख बंद करना 
दोहराना प्रार्थनाएँ 
बुदबुदाना वो गीत
जो हमने किसी पीपल की छांह में लिखें थे

तीस जनवरी

जल्दी चली गई माँ
अड़तालीस में जन्मी थी
इधर मारे गये गाँधी
उधर जन्मी माँ अहिल्या के शहर में
 
बहुत सहज, शांत और सौम्य थी 
गुस्सैल मिज़ाज रहा हो याद नही आता
मरने तक नौकरी और संघर्ष 
सब कुछ हार गई हम लोगों के लिये

हमारी आज की आज़ादी
हमारी आज की खुशियाँ
हमारे आज के पूरे होते स्वप्न
इसीलिये है कि इनकी नींव में
माँ की कुर्बानियां है 
 
जब बजता है ग्यारह बजे 
सायरन कि झुको, नमन करो
मैंने कभी गांधी को नही 
हमेशा माँ को याद किया  

आज के दिन और आज भी यही करूँगा
जबकि वो साथ नही मेरे

"बहुत सहज, शांत और सौम्य थी, गुस्सैल मिज़ाज रहा हो याद नहीं आता, मरने तक नौकरी और संघर्ष, सब कुछ हार गई हम लोगों के लिये, 'माँ'

बिसराना 

खोजता हूँ उन सबको
जो मिलें जीवन पथ पर
मिलें,बिछड़े और खो गए
चींटी, केंकड़ा, ऊदबिलाव
गिलहरी, सियार, बाज, धनेश
गौरैया, कौवा, नेवला, सांप, या तोता
सब लौटे बारी बारी पर मन में
छोड़ गए मीठी छाप अपनी
मनुष्य भी मिलें जो बराबर रहें 
संग साथ और यूँ चिपकें जोंक की तरह
खून पी गए सारा
जाते नही स्मृतियों से 
भूलना चाहता हूँ इन्हें
यह मनुष्यता के विरुद्ध
असंवेदनशील होने का समय है
 
अटाला

करीने से जमा था मालूम ही नही
कि इतना गैर जरूरी यहाँ था
बरसों से खरीदा, उपयोग किया
सम्हालकर रखा जैसे यादें

सफाई में जब निकला और
बिका तो जगह बन गई
खाली जगहें देखकर यकीन नही हुआ
कि वो सब जो फेंका जा चुका है
यही था जीवंत ठोकरें खाता हुआ
बेहद अपना सा घुला मिला

खाली जगह नये सामान से यूँ भर गई
जैसे कोई गुजर जाये अपना
और दो घड़ी बाद ही
सब कुछ सामान्य हो जाएं
शुष्क कर दें सांसों को

"खाली जगह नये सामान से यूँ भर गई जैसे कोई गुजर जाये अपना और दो घड़ी बाद ही, सब कुछ सामान्य हो जाएं, शुष्क कर दें सांसों को"

प्रीतम घर नही आये 
[ स्व शोभा गुर्टू को याद करते हुए ]

(१)

बेलगाम वह जगह है जहां भानुमति जन्मी थी 
उन्नीस सौं पच्चीस में 
बड़ी होती गई तो माँ मेनकाबाई शिरोडकर ने कहा कि 
जब मैं नाचती हूं तो सुनो 
तुम्हारे कान में सुनाई देगी है धरती के घूमने की आवाज़
मंच को अपने पांव से नाप दो 
संसार को वह दो जो कोई नहीं दे सका 
कभी अल्लादिया खान साहब की शिष्या रही मेनकाबाई अतरौली घराने की गायिका थी 
जो बाद में घुंघरू बांध मंच पर समा गई

(२)

भानुमति ने जब मां को घुंघरू से थिरकते देखा 
अचरज में थी और देखती रही देर तक औचक सी
उस्ताद भुर्जी खान ने उसकी आंखों में नृत्य नही 
संगीत का विशाल समंदर देखा 
उसे लपक कर खींचा और सितार, पेटी, 
तबले के सुरों में गूंथ दिया 
यहाँ से उसकी ठुमरी, दादरा और 
कजरी की शुरुआत हुई जो होरी पर जाकर खत्म हुई

(३)

बड़े गुलाम अली खां और बेगम अख्तर को 
सुनकर भानुमति बड़ी हुई 
बेलगाम से मुम्बई का सफर भी रोचक रहा 
जब गाने लगी तो ऐसा गाया कि 
कमाल अमरोही भी चकित थे 
पाक़ीज़ा में गाया 
बेदर्दी बन गए कोई जाओ मनाओ मोरे सैयां 
पाकीज़ा और फागुन से शुरू हुए सफर में 
कर्नाटक की लड़की मुम्बई में फिल्म फेयर ले बैठी

(४)

मैं तुलसी तेरे आंगन की में वह सैयां रूठ गए गाती रही 
खूब गाया - खूब गाया दादरा, खूब गाई ठुमरी 
मराठी में भी सामना और लाल माटी में गाती रही 
बिरजू महाराज की संगत में गाया 
मेहंदी हसन साहब की संगत में ग़ज़ल भी 
संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार पाया 
विश्वनाथ गुर्टू के घर आई तो भानुमति 
शोभा बन गई उनके घर की - शोभा गुर्टू

(५)

एक दिन मेरे शहर के पुराने हॉल में 
जब वह बहुत देर तक अपनी बंदिश सुना रही थी 
एक खूबसूरत मिट्ठू रंग के हरी साड़ी पहने 
जिस पर सफेद फुलकियाँ लगी थी 
तीन संगत कलाकारों के साथ दादरा गा रही थी 
पर जनता थोड़ी देर सुनती रही 
यह वही शहर था जिसने कलाकारों को 
सर पर चढ़ाया था - नजरों से गिराया था 
बाशिंदे संगीत के मुरीद थे और गुलाम भी 
जो संगीत समारोह सुनकर गर्दन हिलाते हुए 
अहम और दर्द को घर छोड़ कर चले आते थे 
उस दिन शोभा गुर्टू के दादरा में 
किसी को रस नहीं आ रहा था 
बाद में शोभा गुर्टू ने देखा कि 
लोग उठकर जा रहे हैं तो वह गाने लगी 
सावन की ऋतु आई रे सजनिया 
खनकदार आवाज़ में कजरी सुनकर 
बाहर खड़े लोग भी हॉल में आ गए 
देर तक सुनते रहें जब तक नही गाई शोभा गुर्टू ने भैरवी 
हिला नही जगह से कोई अपने 
शोभा गुर्टू ने तीन घँटे सतत गाकर थकने की दुहाई दी
मंच से विदा लेते समय उनकी आंखों में अश्रु थे

(६)

अफसोस है कि मैं उसके बाद कभी 
शोभा गुर्टू को आमने-सामने बैठकर नहीं सुन पाया 
मुस्कुराता चेहरा और विरल दृष्टि के सघन अश्रु आज 
मुझे याद आते है आज 
जनता रूठ कर जाती है मंच को अपमानित कर 
किसी भी गायक के दादरा, ठुमरी या कजरी गाने पर भी कोई लौटता नहीं हॉल में 
भीड़ गायब है गायक जिंदा है 
बाज़ार ने सुरों का धंधा ऐसा बुना है जो
सुर, साधना और तपस्या सब के ऊपर है 
आज की गायिका जुगाड़ की पारंगत कलाकार, 
सफल उद्यमी है जो सब बेच सकती है
ठुमरी, कजरा, दादरा, होरी या कबीर 
आप क्या लेंगे श्रीमान

"बाज़ार ने सुरों का धंधा ऐसा बुना है जो सुर, साधना और तपस्या सब के ऊपर है; आज की गायिका जुगाड़ की पारंगत कलाकार, सफल उद्यमी है जो सब बेच सकती है: ठुमरी, कजरा, दादरा, होरी या कबीर"


◆संदीप नाईक
●5 अप्रैल 1967 को महू, इंदौर जिले में जन्म. 

◆विज्ञान, शिक्षा शास्त्र एवं कानून में स्नातक अंग्रेजी साहित्य, समाज कार्य, ग्रामीण विकास में स्नातकोत्तर, भविष्य अध्ययन में शोध है.  

◆35 अलग अलग जगह नौकरी करने के बाद इन दिनों फ्री लान्सिंग करते है. 

◆“नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं” कहानी संकलन प्रकाशित इसके अलावा दर्जनों कहानियाँ, डेढ़ सौ के लगभग कविताएँ, पांच सौ से ज्यादा सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षिक आलेख एवेम शोध आलेख प्रकाशित

◆वागेश्वरी और पंडित सीताकांत शास्त्री पुस्र्कार से सम्मानित 
◆सम्पर्क: naiksandi@gmail.com