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| छवि श्रेय: ज्योति रीता |
अग्निसंभवा!
वह अलसाई- सी सुबह थी
जाते हुए तुम लौट आए थे
लौट आई थी घर में रौनक़
रसोई में बना पकवान सुगंधित हो उठा था
वह बरामदा
जहां बैठकर कनखियों से तुम प्रेम जताते थे
वह बरामदा अल्पनाओं से भर गया था
पाँव में आलता
हाथ में मेहंदी के रंग उतर आए थे
ठोस से तरलता में देह परिवर्तित हो रहा था
बिस्तर केवड़ों के गंध से भर गया था
भींच कर हथेली तुमने कहा- अग्निसंभवा ! तुम्हारे होने में ही प्रेम है
मिहिरदेव तुम्हारे प्रेम से जीवित है।।
मैं कुणपाशी हूँ।।
मेरे स्वर की वेदना में तुम्हारे दर्द परिलक्षित हैं
मेरे आँखों के कोर से तुम्हारे अश्रु बहते हैं
यह कुठाराघात है मेरे हृदय पर
या मैं कुणपाशी हूँ
यह बारिश का महीना है
और कूबड़ में भरा प्रेम-स्रोत सूख रहा है
जाने यह क्या जब्र है
जो तुम छूटते नहीं
तंज़ेब में बंधी कोई पोटली है
जो हृदयद्वार में आ फंसी है
साँसों का थिर होना
तुम्हारे आगमन का परिचय है
देवोत्थान में चढ़ा आई हूँ एक लाल उड़हूल
तुम्हारे लौटने के मोह में
दिनांध इन दिनों दिन में भी परोक्ष्य निहारता है
जैसे रतौंधी ग्रस्त मन हिलोर उठा हो
क्या इंतजार करना वक्त जाया करना था
याकि जी लेना था एक सदी।।
• कुणपाशी- मुर्दा खाने वाला जीव या प्रेतात्मा।
• जब्र- दवाब।
• तंज़ेब- एक प्रकार का बढ़िया महीन कपड़ा।
• दिनांध- उल्लू।
"मेरे स्वर की वेदना में तुम्हारे दर्द परिलक्षित हैं, मेरे आँखों के कोर से तुम्हारे अश्रु बहते हैं; यह कुठाराघात है मेरे हृदय पर या मैं कुणपाशी हूँ"
मैं जीना चाहती थी तुम्हें ।।
मैं जीना चाहती थी तुम्हें
मैं तुम्हारे उघड़े सीने की भीत पर
लिखना चाहती थी कुछ छोटी-छोटी कविताऍं
उनमें भरना चाहती थी भाव
तरलता से उठते ज्वार में उबडूब सकूं
जमा करना चाहती थी अंजुरी भर पानी
तुम्हारे संग कुछ पखवाड़े बिता सकूं
गढ़ना चाहती थी एक छप्पर
द्वार पर टांगना चाहती हूँ वंदनवार
जीवन जो तमाम बातों पर खर्चती हूँ
अब थोड़ा बचा लेना चाहती हूँ।।
लिखना पहला प्रेम साबित हुआ।।
लिखना सबसे बड़ा गुनाह था
हम गुनहगार हुए
जन्म के साथ ही झाड़ू कटका में हम निपुण हुए
सुबह की चाय पिता के बिस्तर छोड़ते ही
रात का दूध बिस्तर पर जाते ही पहुँचा दिए गए
पिता ने आशीर्वाद में अच्छा पति दिया
माँ ने पुश्तैनी गहने दिए
भाई ने घर के बाहर सुरक्षा दी
बोलने की सलाहियत हमसे छीन ली गई
हमारे कलम से स्याही सोख ली गई
हम घर की दीवार पर टोटके की तरह लटका दिए गए हमारी चुप्पी घर में दंभ का बचा होना था
हमें बस 'क' से कबूतर
'का' से काम रटाया गया
हम 'क' से कलम
'का' से कागज़ रट गए
हम बोले कम लिखे ज़्यादा
हम हँसे कम रोए ज़्यादा
इस तरह दरकने से खुद को बचाए रहे
हमने चौका-चूल्हा के बाद सोचने की जहमत उठा ली
गहरी रात में हम लिखते रहे
कागज़ पर खींच दी एक लकीर
हमने गुड़िया की चाबी तोड़ दी
हम तक़सीर (अपराधी) हुए
मवाद भरा नासूर हुए
नापाक हमें मान लिया गया
लिखना पहला प्रेम साबित हुआ
बाक़ी सब बिवाई।।
"हम तक़सीर (अपराधी) हुए मवाद भरा नासूर हुए, नापाक हमें मान लिया गया;लिखना पहला प्रेम साबित हुआ बाक़ी सब बिवाई।।"
इसके बाहर की दुनिया बेईमानी है।।
मेरे सृजन क्षेत्र में तुम आ बसे थे
अब सृजन संसार समृद्ध हो रहा था
धीरे धीरे बहुत सारे कोपल भी निकल आए थे
जैसे मैं जी उठी हूँ
अब,ब्लैक एंड वाइट पर्दे रंगीन होने लगे हैं
सुबह चिड़ियों की कोलाहल से जाग रही हूँ
खिड़की के बाहर देखते हुए मुस्कुराने लगी हूँ
एक दिन तुम खिड़की के बाहर से मुझे पुकारोगे
मैं हुलककर खिड़की से बाहर निकल आऊंगी
फिर हम लंबी सैर पर निकलेंगे
पगडंडियों पर चलते हुए हम कहीं बहुत दूर निकल जाएंगे
तुम मुझे मीठे बेर खिलाना
मैं तुम्हारे कंधे पर सर रखकर सुस्ता लूंगी
हमें कभी लौटना नहीं था
हमें दूर ले जाना कहीं
जहां कोई भी पुकारे तो उसकी आवाज़ मुझ तक ना पहुंच सके
मैं नहीं लौटना चाहती
यह खिड़की के बाहर की दुनिया अंदर से ज़्यादा सुखदाई है
परंतु तुम्हें तो लौटना होगा / तुमने कहा था
तुम हमेशा के लिए नहीं हो
और तुम्हारे लौटने को मैं जीना नहीं चाहती
कोई मोहपाश हो तो तुम्हें कैद कर लूँ
इसके बाहर की दुनिया बेईमानी है।।
"हमें कभी लौटना नहीं था, हमें दूर ले जाना कहीं; जहां कोई भी पुकारे तो उसकी आवाज़ मुझ तक ना पहुंच सके;मैं नहीं लौटना चाहती यह खिड़की के बाहर की दुनिया अंदर से ज़्यादा सुखदाई है"
एक अबोध बच्चा जब रोटी बेलता है ।।
एक अबोध बच्चा
जब रोटी बेलता है
वह कभी भारत का नक्शा
कभी विश्व का मानचित्र
कभी सफेद नीला आसमान
जहाँ वह फैला देता है पंख
स्याह गर्म काले तवे पर
कभी काढ़ देता घर के ऊपर का छप्पर
और लगाने लगता रेशमी धागों से गांठ
वह हर लकीर को लांघता
लतर जाता समृद्ध सुखी डाल पर कहीं
बहुधा वह सूँघ रहा बारूद
बाँसुरी की धुन पर दागी जा रही गोली
भरसक कोशिश इस धुन पर विध्वंसक नाच हो
बच्चा विभीषक नाच में मग्न है
बच्चा थोड़े में ही विस्तृत सोचता
व्याप्त हो जाता नमक की तरह
दुखों का संभाग भूलकर
संवाद करता सुखों से एकांत में
उसे किसी समीकरण या विषण्ण का पता नहीं
वह रोटी को विश्वव्यापी बनाता और भरना चाहता भूखे का पेट
वह विशारद की भांति नन्हें हाथों से बनाना चाहता एक नया देश
जहां भूख से पहले बेला जाता हो रोटी
जहां समस्या से पहले सोचा जाता हो समाधान
जहां बच्चा रात में मनोहर पोथी में पढ़ता हो अ से अनार
अलसुबह असंख्य अनार से लदे पेड़ उग आता हो
उसके डीह पर...
"उसे किसी समीकरण या विषण्ण का पता नहीं, वह रोटी को विश्वव्यापी बनाता और भरना चाहता भूखे का पेट, वह विशारद की भांति नन्हें हाथों से बनाना चाहता एक नया देश"
तीज़-त्योहार करती आधुनिक स्त्रियाँ ।।
इन दिनों भी
तमाम पढ़ी-लिखी विदुषी स्त्रियाँ
विरासती परंपराओं को विधिवत जीतीं हैं
चश्मा पहन मोटी-मोटी किताबों में उलझी स्त्रियाँ
माचिस की तीली से आलता उकेरना भी जानतीं हैं
सेहत के नाम पर उबले खाने के बाद ग्रीन टी पीने वाली स्त्रियाँ
निर्जला उपवास रखकर आशीर्वाद बटोरना भी जानतीं हैं
पूरे साल आधुनिकता से कदमताल करती स्त्रियाँ
पूजा के दो दिन पहले दिखातीं हैं धूप
पारंपरिक बनारसी साड़ी को
शादी में मिले भारी मोटे झूमके , कड़े , हार , मांगटीका
लगवाती है नक्काशीदार मेहंदी
करतीं हैं सोलह - श्रृंगार
संपूर्ण विधान से पूजा करतीं
समीप रखना नहीं भूलती सिंदूरी डिबिया
सूफियाना धुन पर झूमने वाली स्त्रियाँ
आरती गीत पर बजातीं हैं तालियाँ / सोचते हुए कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम और रक्त संचार बेहतरी को
हर पहलू पर लॉजिक ढूँढती स्त्रियाँ
तीज - त्यौहार में हो जातीं हैं पूर्णत: घरनी
कोने - कोने में जलातीं हैं समृद्धि के दीये
सूर्योदय के पहले विसर्जन करते हुए
जल में बहातीं हैं समस्त स्त्रियों की पीड़ा /दु:ख / संताप
अंजलि में भरकर गंगाजल पी जातीं हैं समस्त रोग
पाँच स्त्रियों के मांग में रहतीं हैं सिन्दूर
गले लगाकर हृदय को करतीं हैं पुनीत
पुलकित मन से पारंपरिक - विरासत को डिब्बे में डाल ओढ़ा देतीं हैं लाल सालूक कपड़ा
नींबू पानी के गिलास के साथ
उठाती है कलम
और करतीं हैं समय के गाल पर कठोर हस्ताक्षर ।।
स्त्रियों के हिस्से कभी कोई रविवार नहीं था ।।
स्त्रियों के हिस्से कभी कोई रविवार नहीं था
रविवार की सुबह
इत्मीनान से बस एक कप चाय नसीब थी
तुरंत बाद ही
बालों को लपेट एक ऊंचा जुड़ा बांधती
और सामने होता कपड़ों का ढेर
जूठे बर्तन /बिखरा सामान
सामानों पर जमी धूल
कोने- कोने की सफाई
फिर फ़रमाइशी खाना
आधा दिन बीत जाता
दोपहर कपड़ों में इस्तरी
कुछ घूमने आए मेहमानों की तैयारी
ना चाहते हुए भी हंसी में शामिल
शाम ढले निढाल हो
फिर एक कप चाय के साथ बैठती
कप से ही बतिया लेती
फूलों में पानी डालते हुए गमलों से गलबहियाँ कर लेती
हालांकि
जुड़ा अभी नहीं खुला था
खोंस दिया था उसमें एक कांटेदार पिन
मन का दूसरा हिस्सा अब भी उड़ता है
दूब-घास , अलगनी पर टंग जाता है
दीया - बाती के समय भी नहीं लौटना चाहता
दिशाहीन हो भटकता है
दार्शनिक-सा बहुतेरे सोचता है
दक्ष है हर कला में
परंतु
अपने शौक को थपथपाता है
तजुर्बा है जीवन का
तकाजा बहुत महँगा है
यह ढिबरी में थी तो खुशी थी बहुत
चाँदनी रात अब डराता है
पंख अब भी थका नहीं
ठोकर खाकर भी रुका नहीं
माँ को याद कर ठुनकती हूँ अब भी
पिता की बाहों में झूलती हूँ
थपथपाता है हृदय का कोना कोई
ठिठकता है आहट से अब भी हृदय
झालरें रंगीन बुनती हूँ अब भी कई
पनीली है आँखों की झिल्ली अभी
सुबह के 4:00 बजे हैं हाथों में काली चाय की प्याली है और हाथ में ममता कालिया की दुक्खम सुक्खम
परंतु हर स्त्री को लौट आना होता है
चिड़ियों के चहचहाने से पहले अपने ख्वाबगाह से
अब लौट रही हूँ मैं सोमवारी कांति लिए
अब कोई ख्वाब नहीं सामने हकीकत है
काम पर जाने की कवायद है
सच तो है
स्त्री हूँ
और स्त्रियों के हिस्से कभी कोई रविवार नहीं था।।
"स्त्रियों के हिस्से कभी कोई रविवार नहीं था, रविवार की सुबह इत्मीनान से बस एक कप चाय नसीब थी; तुरंत बाद ही बालों को लपेट एक ऊंचा जुड़ा बांधती और सामने होता कपड़ों का ढेर, जूठे बर्तन /बिखरा सामान, सामानों पर जमी धूल, कोने- कोने की सफाई फिर फ़रमाइशी खाना..."
ज्योति रीता एक युवा कवियित्री हैं जो विभिन्न विषयों पर अतुल्य रचनाएँ गढ़ती हैं। वह पेशे से हिन्दी प्राध्यापिका हैं जिनका वासस्थान बिहार है।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, ऑनलाइन पोर्टलों पर समय-समय पर रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

