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| छवि श्रेय: विशाखा मुलमुले |
रूपांतरण
भले ही प्रेम से तुम विमुख रहो
वह ऐय्यार बन सम्मुख ही रहेगा
वह भावों की सांद्रता के चरम तक
प्रतीक्षारत रहेगा
किसी अनजाने , अचीन्हें क्षण में वह
कौंध की तरह नेत्रों की झपक बनेगा
उसकी आमद का स्वर थोड़े अंतराल में तुम्हें सुनाई देगा
तब तक वह आपादमस्तक तुमको भिगो चुका होगा
वह तुम्हारे हृदय में किलकारी बनकर गूँजेगा
फूलों संग मुस्कुराएगा
वह तितली के कोमल पंख पर सवार होगा
जिसे स्पर्श करेगा उस पर अपना रंग छोड़ जाएगा
वह तुम्हें नेत्रहीन बनाएगा
और ऊंच -नीच , गोरे - काले
धनी - कृपण का भेद मिटाएगा
वह बहरा करेगा और
विरोधियों की बातों के बीच
अनसुने का पर्दा बनेगा
वह बड़बोलों के मध्य
मौन की बाधा बन
तुम्हें गूंगा करेगा
वह तुम्हें कोमल बनाकर
कठोरता के विरुद्ध खड़ा करेगा
वह तुम्हारे प्रभामंडल को ओज देगा
सातों चक्रों को जागृत रख
तुम्हें प्रबुद्ध करेगा
प्रेम तुम्हारे हृदय में बसेगा
और तुम्हारे कर्मों से उजागर होगा
"भले ही प्रेम से तुम विमुख रहो, वह ऐय्यार बन सम्मुख ही रहेगा, वह भावों की सांद्रता के चरम तक प्रतीक्षारत रहेगा"
प्रतिबद्धता
यम से छीन लाएगी माँ मेरी आत्मा
एक डग में माप लेगी
छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र की दूरी
पवनसुता वह ले आएगी मेरे लिए संजीवनी बूटी
डगर - चगर हिलायगी शेष शय्या
तोड़ेगी विष्णु की विश्रांति
वक्र दिशा में चलते ग्रहों को ले आएगी सीध में
हिरकणी बन अंधकार में पार करेगी
बाघों का निवास स्थान
लांघ लेगी मेरे लिए अजिंक्य दुर्ग
पहाट फूटने से पहले
चली जायेगी उज्जयिनी
महाकाल की भस्मारती की लगाएगी तपती भभूत
हंस के नीर क्षीर विवेक से
देख लेगी मेरे अवगुण
फिर भी आँख मूंद
स्थापित कर देगी नाभि में अमृत कलश
इतने पर भी बात न बनी तो
अश्रुओं से कोमल बना देगी
कच्छप की कठोर पीठ
माँग लेगी उससे मेरे लिए डेढ़ सौ वर्ष का आयुष्य
सिरहाने बैठ माथा सहलाते
पढ़ेगी राम रक्षा
चालीस पार की मेरी देह के लिए
घिसेगी जनमघूटी
रोग को हरेगी
पिलाएगी चाँदी के चम्मच में औषधी
श्लोक पढ़ते हुए :
शरीरे जर्जरीभूते व्याधिग्रस्ते कलेवरेऔषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरिः॥
साम दाम दंड भेद से
माँ बचा ही लेगी मेरा जीवन
टुकड़ा भर आसमान
मुझे हासिल टुकड़ा भर आकाश में
मैंने देखना चाहा सूर्योदय सूर्यास्त
देखना चाहा चंद्रोदय
उसकी घटत - बढ़त
चाहत कि,
चन्द्र जब सबसे नजदीक हो धरा के
तब बिन सीढ़ी लगाए छू सकूँ उसे
न हो तो निहार ही लूँ उसे भर आँख
आस रखी उत्तर में दिख जाए ध्रुव तारा
सांझ ढले दिख जाए चमकीला शुक्र तारा
जब कभी बृहस्पति के नज़दीक से गुजरे शनि
तो देख लूँ उन्हें अपने ही घर की सीध से
कहने को क्षेत्रफल में अलां - फलां स्क्वायर फुट का घर मेरा
तो हिसाब से उतनी ही बड़ी मिलनी चाहिए थी छत मुझे
पर महानगर की गुजर - बसर में
हासिल मुझे खिड़की से दिखता टुकड़ा भर आसमान
"चाहत कि,चन्द्र जब सबसे नजदीक हो धरा के, तब बिन सीढ़ी लगाए छू सकूँ उसे, न हो तो निहार ही लूँ उसे भर आँख"
गिरफ्त में
इस शंकालु समय में
मैं उस वृक्ष के समीप जा न सकी
जो बिखेरता था खुशबू
जिसे मैं आँचल में समेटती थी
इस दूरियों के समय में
इक नन्ही सी रुनझुन
इक प्यारी सी मुस्कान
इक मासुमियत का चेहरा है घर के समीप
पर उसको एक बार भी मैं दुलार न सकी
इस कटीले समय में
मैं काटती रहती ना - ना विधि अपना समय
पर कटीली झाड़ियों में फंसा एक लड़की का दुप्पटा हटा न सकी
आँखों ही आँखों से घूमती रही दुनिया
लाल आँखों से उलीचती रही संताप
पर एक आँख का भी आँसू पोछ न सकी
इस निष्ठुर समय में
अन्नदाता के समर्थन में
बापू के देश में
जीभ की परतंत्रता में
एक रोज़ का भी उपवास साध न सकी
इस हमलावार समय में
बंधु संग बांधव
मानव संग मानवता
धर्म संग धम्म
आत्मा संग परमात्मा
किसी को भी बचा न सकी
"इस दूरियों के समय में, इक नन्ही सी रुनझुन, इक प्यारी सी मुस्कान, इक मासुमियत का चेहरा है घर के समीप, पर उसको एक बार भी मैं दुलार न सकी"
किरायेदार
पिता !
कब होगा अपना मकान
दरवाज़े पर लिखा होगा तुम्हारा और माँ का नाम
जहाँ दीवारों पर रंग होंगे मेरी पसंद के
जिस पर ठोक सकूँगा कील
टांगूंगा मनपसंद तस्वीर
सोच में पड़ गए पिता
देह भी तो किराए का मकान
जन्मते ही लग जाता है उपनाम
एक रंग विशेष से जुड़ जाता है नाता
लगती फिर उसी धर्म की कील
टंगती उसी की तस्वीर
पुत्र !
मैं तो न बना सका
तुम बनाना भविष्य में घर अपना
किराए की देह में स्वामित्व अपना
"पिता !कब होगा अपना मकान; दरवाज़े पर लिखा होगा तुम्हारा और माँ का नाम, जहाँ दीवारों पर रंग होंगे मेरी पसंद के, जिस पर ठोक सकूँगा कील, टांगूंगा मनपसंद" तस्वीर
हेली - सहेली
पीठ से पीठ टिका
बैठीं है हेली - सहेली
सुन रही है
सुना रही है अपना दुःख - दर्द
मालूम है उन्हें ,
मिलायेगी नजरें तो
पिघल जाएगा बचा हुआ हिम खंड
बढ़ जाएगा जलस्तर !
पीठ से पीठ टिका
वे बढ़ा रही है हौसला भी
बन रहीं है कमान-सी मेरुदंड का
एक मजबूत आधार
जैसी होती है पतंग की कमान को
थामे दूसरी सीधी बांस की डंडी
ताकि ,
उडान भर सके दोनों की जीवन रूपी पतंग
और छू सके आकाश !
पीठ से पीठ टिका
देख रहीं है संग साथ
दो दिशाएँ भी / दशाएं भी
देख रहीं है पूरब और
देख रहीं है पश्चिम भी
सोच रहीं है
काश !
दुनिया भर की तमाम स्त्रियां
यूँ ही टिका लें पीठ से पीठ अपनी !
"पीठ से पीठ टिका, वे बढ़ा रही है हौसला भी, बन रहीं है कमान-सी मेरुदंड काएक मजबूत आधार, जैसी होती है पतंग की कमान को, थामे दूसरी सीधी बांस की डंडी ताकि, उडान भर सके दोनों की जीवन रूपी पतंग और छू सके आकाश!"
तुम और मैं
हम व्यवहारिक रूप से जुड़े है
हम वैचारिक रूप से भी जुड़े है
हम एक ही दृश्यमान के सूर्य , चंद्र , ग्रहों से भी जुड़े है
हम एक ही नदी
एक ही ग्रामदेवी के एक ही ग्राम में बसे है
बस चार दीवारों के पार तुम्हारा घर है और
चार दीवारों के भीतर मैं हूँ ।
◆नाम: विशाखा मुलमुले
◆रहवासी: छत्तीसगढ़
◆वर्तमान में: पुणे में निवास
◆ईमेल: vishakhamulmuley@gmail.com
◆मैं कविताएँ व लेख लिखती हूँ । कई पत्रिकाओं जैसे आजकल , कथादेश , पाखी , मंतव्य , अहा ! जिंदगी , समालोचन ( वेब पत्रिका ) , दुनिया इन दिनों , स्त्रीकाल ( स्त्री का समय और सच ) , बहुमत , छत्तीसगढ़ आस - पास , विभोम स्वर , सामयिक सरस्वती , समहुत , कृति ओर , शीतलवाणी , प्रेरणा - अंशु , प्रणाम पर्यटक , विश्वगाथा , व्यंजना ( काव्य केंद्रित पत्रिका ) सर्वोत्तम मासिक , प्रतिमान , काव्यकुण्ड , साहित्य सृजन इत्यादि में मेरी कविताओं को स्थान मिला है।
◆सुबह सवेरे ( भोपाल ) , दिल्ली बुलेटिन , जनसंदेश टाइम्स , हिंदी नेस्ट , अनुगूँज ई पत्रिका , युवा प्रवर्तक , स्टोरी मिरर ( होली विशेषांक ई पत्रिका ) , पोषम पा , हिन्दीनामा इत्यादि ई संस्करण तथा राजधानी समाचार भोपाल के ई न्यूज पेपर में ' विशाखा की कलम से ' खंड में अनेक कविताओं का प्रकाशन हुआ है ।
◆पंजाबी , मराठी , नेपाली व अंग्रेजी भाषा में मेरी कुछ कविताओं का अनुवाद हुआ है
◆तीन साझा काव्य संकलनों में मेरी कविताएँ हैं ।
◆ब्लॉग - समकालीन जनमत , होता है शब रोज , पहली बार , समकालीन परिदृश्य , साहित्यकी , कथान्तर - अवांतर , छत्तीसगढ़ मित्र में कविताएँ
◆आदरणीय सुधीर सक्सेना जी की चुनिंदा कविताओं का डॉ सुलभा कोरे जी के मार्गदर्शन में मराठी में अनुवाद किया है । प्रकाशित पुस्तक का नाम है " अजूनही लाल आहे पूर्व " (अभी भी लाल है पूर्व )

