जिनका स्वभाव ही खिलना है
जब-जब आप
अपने ज़ख्मों पर मिट्टी डाल
हँसना चाहोगे, खिलखिलाना चाहोगे
खिलते गुलाबों की तरह
तब-तब वो
जो आपके ज़ख्मों से आनंदित होते हैं
चुन-चुन कर आपके पपड़ाये ज़ख्मों पर
कांटें चुभोते रहेंगे
लेकिन पता नहीं
उन्हें पता है या नहीं कि
जिनका स्वभाव ही खिलना है
वे कांटों की परवाह नहीं करते।
युद्ध
(१)
युद्ध समाप्ति के उपरांत
विधवा हुई औरते
पुत्रहीन हुए बूढ़े माँ-बाप
अनाथ हुए बच्चे
झोंक दिये जाते हैं
अंतहीन युद्ध में
और पहाड़-सी जिंदगी का
बोझ उठाए
करते रहते हैं संघर्ष ताउम्र।
(२)
युद्ध के मैदान में उतरे सैनिक
युद्ध करते-करते ऐसे बीज बन जाते हैं
जो रक्त सिंचित भूमि में बो दिये जाते हैं
कभी न पनपने के लिए।
(३)
युद्ध के मैदान से लौटा जवान
कोई बैसाखी पर चलता है
तो कोई ह्वीलचेयर पर
किसी की आस्तीन में हाथ नहीं होता
तो किसी के लिए
हर रंग ही काला पड़ जाता है।
(४)
युद्ध समाप्ति की
घोषणा तो हो जाती है
लेकिन युद्ध में
अंग-भंग होकर लौटे
योद्धाओं की जिंदगी में
युद्ध जारी रहता है।
(५)
सभी जानते हैं
युद्ध के मैदान में
शांति वार्ता नहीं होती
उसके लिए आमने-सामने बैठना पड़ता है
लेकिन फिर भी
मालिक युद्ध की घोषणा करेंगे
रक्तपात कराएंगे
फिर दिखावा युद्ध समाप्ति का
हर नया मालिक इसे दोहराएगा
बार-बार दोहराएगा।
"युद्ध के मैदान में उतरे सैनिक, युद्ध करते-करते ऐसे बीज बन जाते हैं, जो रक्त सिंचित भूमि में बो दिये जाते हैं; कभी न पनपने के लिए।"
मैं फूल होना चाहूँगी
प्रेम में ठुकरायी गई स्त्रियाँ
धूल होना
पसंद करती रही हैं अब तक
लेकिन किसी के हृदय की शूल नहीं
अब ये मत सोचना कि
मैं भी हर हाल में धूल बनकर
चिपकी रहूँगी
तुम्हारी चरणों से
क्योंकि मैं प्रेम में
न धूल होना पसंद करूँगी
न ही शूल होना
मेरा प्रेम स्वीकृत हो
या अस्वीकृत
दोनों ही स्थिति में
मैं फूल होना चाहूँगी।
"प्रेम में ठुकरायी गई स्त्रियाँ, धूल होना पसंद करती रही हैं अब तक; लेकिन किसी के हृदय की शूल नहीं"
रोटी की खुशबू
जब कभी किये जाएंगे सर्वे
इकट्ठे किये जाएंगे आंकड़े
तमाम तरह की खुशबुओं को
पसंद करने वालों की संख्या के
तो यकीनन
अलग-अलग फूलों की
खुशबुओं को पसंद करने वालों की
तादाद बहुत होगी
कस्तूरी की खुशबू
पसंद करने वालों की संख्या भी
कदाचित कम न होगी
लेकिन सच मानिए
ये सब आंकड़े बौने साबित हो जाएंगे
रोटी की खुशबू पसंद करने वालों की
संख्या के आगे।
ज़हर पी कर पैदा हुईं हैं हम
अरे!
ज़हर पी कर पैदा हुई है
ज़हर पीकर...
इन्हें क्या कोई हारी-बीमारी होगी
ज़हर पचा कर
अम्मर हो गई है... अम्मर
देखो जरा
सूखी रोटी नमक खाकर भी
कैसे छतनार हुई जा रही है छोरियाँ
न जाने क्या ?
खुसुर फुसुर करती हैं तीनों
बात-बात पर खिलखिलाती हैं
धस् मारती ये जंगल-झाड़ छोरियाँ
पता नहीं कभी उमजने भी देगी कि नहीं
खानदान के एकलौते चिराग को
कितनों दवा-दारू, टोनिक-बिटामिन
खान-पान दो
इस कलकुसरे छोरे को
देह पर बारह ही बजा रहता है
एकलौते पोते के जरा सा खाँसने भर से
दादी तीनों पोतियों को
गालियों से बिछ लेती हैं
वैसे तो इस तरह गालियों से
असीसने की आदत
पुरानी है उनकी
लेकिन जब से तीन पोतियों के बाद
पोता जन्मा है
उसकी गालियाँ और ज्यादा तीखी हो गई हैं
वहीं तीनों छोरियाँ गालियों को
हवा में उड़ाती और ज्यादा बेपरवाह
क्यों बुरा नहीं लगता
क्यों सह जाती हो हँस-हँस कर
इतनी जली-कटी तुम ?
पूछने पर बतातीं हैं वो
उनकी इच्छाओं-अनिच्छाओं को ठेंगा दिखा कर
मारक गोलियों और इंजेक्शनों को
बेअसर कर जन्मी हैं हम
अब उनकी गालियों का
भला क्या असर होगा हम पर
सच कहती हैं वो
ज़हर पी कर पैदा हुईं हैं हम...
ज़हर पीकर...
"उनकी इच्छाओं-अनिच्छाओं को ठेंगा दिखा कर, मारक गोलियों और इंजेक्शनों को; बेअसर कर जन्मी हैं हम, अब उनकी गालियों का, भला क्या असर होगा हम पर"
हम थक गये हैं साब!
कहिए !
कुछ तो कहिए
चुप क्यों बैठे हैं
कुछ नहीं तो जरा पलकें ही उठाइए
आस-पास नजरें तो दौड़ाइए
क्यों बैठे हैं इस तरह से
खुद को खुद में समेटे ?
क्या कहें
और क्यों कहें
निरीह प्राणियों का कोई कभी
सुनता भी है
और सुन भी लें तो क्या गारंटी है कि
वो समझ भी लें
जाओ साब! जाओ
अपने रस्ते जाओ
हम देख भी लें
अपने आस-पास तो क्या
दृश्य बदल जाएगा ?
नहीं बिल्कुल नहीं
वही दिखेंगे चारों तरफ
हारी-बीमारी से हाय-हाय करते लोग
रोटी/भात के लिए रिरियाते बच्चे
दुःख से छाती कूटती औरतें
बहुत बोल लिये साब
नजरें मिला-मिला कर
भगवान से भी लड़ कर देख लिये
कुछ नहीं बदलने वाला
अरे! हम गरीब आदमी दर-दर दुत्कारे जाने के लिए ही पैदा होते हैं
सच कहूँ तो
ये बार-बार
पेट पर लात और
कलेजा पर वार सहते-सहते
हम थक गये हैं साब!
थक गये हैं।
"क्या कहें, और क्यों कहें, निरीह प्राणियों का कोई कभी सुनता भी है और सुन भी लें तो क्या गारंटी है कि, वो समझ भी लें"
हाथियों को बचाना जरूरी है
पिद्दी सी चींटियों में
दम ही कितना होता है राजन !
वो तो यूँ ही मसली चली जाती है
पैरों तले चुटकियों में
धूप से बिलबिलाती है
पानी में बह जाती है
उन्हें बचाने की जरूरत ही क्या है
उनके हित-अहित का सोच-सोच
अपना नींद हराम क्यों करना
वैसे भी ये चींटियाँ ही तो हैं
जरूरत आन पड़ी कभी इनकी तो
मुट्ठी भर चीनी छींट दिया जाएगा
भागे-भागे आ जाएंगे सभी
बचाना तो हाथियों को जरूरी है
आखिर दुनिया के नक्शे पर
इन हाथियों से ही तो
हमारी सम्पन्नता झलकती है।
बुनूँगी अपना आसमान
मुझे बाँधने को मेरी ओर
फेंकी गई डोरियाँ
मुझे बाँध नहीं पायीं
हाँ! सच में नहीं बाँध पायीं
अलबत्ता ये कि
वो उलझ पड़ीं आपस में ही
और पता है क्या ?
उन उलझी-ओझरायी डोरियों में से
कुछ को सुलझा कर
बना लिया है मैंने गोला
गोला मतलब क्या समझे ?
फटने वाला बारुद का गोला क्या ?
अरे नहीं!
रेशमी/ऊनी डोरियों का गोला
स्त्रियाँ तोड़ने-फोड़ने का काम
भला कहाँ कर पातीं हैं
वो तो बाँधती हैं, जोड़ती हैं
गुनती हैं, बुनती हैं
रचती हैं
तो इन डोरियों के फंदे मैं
न तो पैरों में और न ही गले में डालूँगी
इसे डालूँगी सलाइयों में
गिन-गिन कर पूरे हिसाब से
और बुनूँगी अपना आसमान
अपना सूरज, अपने चाँद-सितारे
अपने फूल-पत्तियाँ, चिड़िया-चुनमुन सब।
"मुझे बाँधने को मेरी ओर फेंकी गई डोरियाँ, मुझे बाँध नहीं पायीं; हाँ! सच में नहीं बाँध पायीं अलबत्ता ये कि वो उलझ पड़ीं आपस में ही"
उसे दुःख जरूरी चीज लगती है
वह दुःख को दबा-छिपा कर रखती है
सहेज कर रखती है कलेजे में
उसे दुःख जरूरी चीज लगती है
बहुत जरूरी
एकदम नमक की तरह
या कहें तो
वह दुःख को नमक ही मानती है
दु:खों को जमा करते-करते
नमक का पहाड़ खड़ा कर लेती है
अपने इर्द-गिर्द
और कभी-कभी वह खुद भी
समाहित हो जाती है उसमें
और नमक का यह पहाड़
न धूप के तपन से गलता है
न ही हृदय के
इसे गलने के लिए
शीतल गुलाबी प्रेम का
खुशनुमा फुहार चाहिए होता है
मिल जाएं ऐसे चंद फुहारें तो
गल कर समंदर में मिल जाते हैं
ये पहाड़
और वह निखर उठती है
बहार बन कर
वरना नमक के पहाड़ हुए दुःख के साथ
वह भी पथरा जाती है एक दिन
प्रेम के इंतजार में।
"वह दुःख को दबा-छिपा कर रखती है, सहेज कर रखती है कलेजे में, उसे दुःख जरूरी चीज लगती है, बहुत जरूरी, एकदम नमक की तरह या कहें तो, वह दुःख को नमक ही मानती है"
चॉक की तरह
स्त्रियाँ सह जाती हैं हर दुःख
झेल लेतीं हैं तमाम दिक्कतदारियाँ
स्याह पन्नों पर भी लिख देतीं हैं
उम्मीदों के अक्षर
काढ़ लेतीं हैं रंगीन फूल और बेल-बूटे
टांक देतीं हैं जगमगाते सितारे
लेकिन नहीं सह पातीं हैं
हृदय पर हुए प्रहार को
चटक जातीं हैं वो प्रथम प्रहार से ही
और एक बार चटकने के बाद
न प्रहारों का सिलसिला थमता है
न ही टूटने का
टूटती चली जाती हैं वो
चूर-चूर होकर धूल बन जाने तक
ये स्त्रियाँ भी ना...
बिल्कुल चॉक की तरह होतीं हैं
जिसे समझ आती है सिर्फ
कोमल स्पर्श की भाषा
थाम लो उसे प्रेम से तो
घिसकर भी रौशन कर देती हैं दुनिया।
"और एक बार चटकने के बाद, न प्रहारों का सिलसिला थमता है, न ही टूटने का, टूटती चली जाती हैं वो; चूर-चूर होकर धूल बन जाने तक ये स्त्रियाँ भी ना... "बिल्कुल चॉक की तरह होतीं हैं"
● रानी सिंह
● जन्मतिथि- 30 जून
● शिक्षा- स्नातकोत्तर (इतिहास), यूजीसी नेट
● सम्प्रति- अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन
● निवास- पूर्णियाँ, बिहार
● प्रकाशन- देह, देहरी और दीया (काव्य संग्रह/2021), दस साझा संग्रहों एवं पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ ब्लॉग्स पर निरंतर रचनाएँ प्रकाशित।
● ई-मेल- raniksingh77@gmail.com

