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| छवि श्रेय: राज बोहरे |
उम्मीद
मेरे सामने जब भी कही कारखाना खुलने की बात चलती है, मुझे टीका बब्बा बेतहाशा याद आते हैं। टीका बब्बा यानी कस्बे के ताँगेवालों की पुरानी पीढ़ी में से ऐसी यादगार हस्ती जिनक पास किस्से कहांनियों का खजाना भरा पड़ा है। वे आप बीती और पराई बीती घटना को बड़े रोचक ढ़ंग से किस्सो में ढाल लेते हैं। आप कभी उनके ताँगे में बैठकर तो देखिए, कथा धारा में डूबे बिना न रह पाएँगे।
वे जयस्तंभ चौराहे से सवारियाँ उठाते हैं और गोपालपुरा या कैंट तक की सीधी सवारियाँ ही लेते हैं, बीच की - यानी हनुमान चौराहे या जेल रोड की - सवारी उन्हें इल्लत-सी लगती है। इसलिए वे अपने ताँगे में कम दूरी की सवारियाँ कभी नही बैठाते, सीधे रसाले की सवारी सुहाती हैं उन्हें।
आप पैरदान पर पाँव रखके उनके ताँगे में चढ़ जाइए और इत्मीनान से बैठकर उन्हें चलने का इशारा कीजिए।
वे बड़ी अदा से मुस्काएँगे और चाबुक संभालकर घुड़भाषा में अपने घोड़े से चलने के लिए बोलेंगे-तत् तत् तत् तत्। घोड़ा सिर हिलाएगा और शान से चल पड़ेगा चहलकदमी के अंदाज में। टीका बब्बा आपसे मुखातिब हो उठेंगे-कहाँ से आना हुआ जनाब का ?
पिचहत्तर साल पूरे कर चुके टीका बब्बा का असली नाम क्या है, शायद कोई नही जानता। जाने कितने साल पीछे छूट गया है, उनका असली नाम। लंबे-लंबे टीका लगाए माथे पर साफा कसे टीका बब्बा का चमचमाता ताँगा और उसमें जुता स्वस्थ कद्दावर घोड़ा ही उनकी खास पहचान है। उन्हें बड़े टीका मुद्रा लगाने पर टीका बब्बा कहा जाता है, या उनका नाम टीकाराम है, इसे जो लोग जानते होंगे , वे कब के जा चुके इस दुनिया से। लेकिन टीका बब्बा आज भी चुस्त-दुरूस्त भिड़े हैं अपने धंधे में। विजयपुर खाद कारखाने को गालियाँ बकना उनका नया शगल है, जिसके कारण कस्बे के लोग बदल गए लगते हैं उन्हें । बल्कि कस्बे के लोग बिगड़ गए लगते हैं उन्हें । बहुत प्यार है उन्हें अपने कस्बे के रीति-रिवाजों से, स्थानों से और वहां के निश्छल नागरिकों से।
काफी दिन पहले गुना कस्बे के पास एक खाद कारखाना खुलने की घोषणा सुनकर कभी उनमें भी बड़ा उत्साह जागा था, चलो इस बहाने कस्बे में तमाम नई सुविधाएँ आ जाएगी। रोटी रोजगार बढ़ेगा लोगों का। लेकिन ये कब सोचा था उन्होंने कि दरअसल उनके ही मुँह से यह सब सुनना ज्यादा अच्छा लगा है। आप उनके ताँगे में बैठेगे, तो वे सबसे पहले परिचय पूछेंगे, “कहाँ से आना हुआ जनाब का ?”
आप यदि बाहर के हुए तो परिचय पाके वे कहेंगे‘ “क्या बताएँ साहब ! गुना का तो सब कुछ बदल गया। हर चीज मिटर गई यहाँ की। यहाँ के मेले-ठेले, तीज-त्यौहार बड़े अनुठे और आपसी प्रेम बढ़ाने वाले रहे हैं। खाने पीने की चीजें निराली होती थी यहाँ की। महाजन की जलेबी, जवाहर वाले का दूध और बालचंद की सोनपपड़ी तो अभी पाँच-सात साल पहले तक दूर-दूर तक मशहूर रही। पहले घी की बड़ी मंडी रह चुकी यह बस्ती आज घी की बूंद-बूंद को तरसती है। बजरंगगढ़ की बीस भुजा देवी के भूलभूलैया से हाथ, मालपुर की गुफा और गादेर की खोह में बने मंदिर देखकर आज भी आप दाँत तले अँगुलियाँ दबा लेंगे। कुदरत ने बड़ी-बड़ी खैरातें बख्शी हैं हम गुनावालों का। पहले ऐसा प्रेम था यहाँ के लोगो में एक-दूसरे के प्रति कि आज भी आँखे गीली हो जाती है, उसे याद करके। हमारा गुना छोटा सा कस्बा था, न ऊधो का लेना, न माधो का देना। लेकिन अब तो सब गड़बड़ है भीड़ ही भीड़ हो गई है सब जगह अब। पुराने दिनों की ही बात है, एक बार क्या हुआ कि....”
इन शब्दोँ के साथ ही उनकी कहानी शुरू हो जाएगी। गुना के नामकरण के प्रेरणास्त्रोत बलिदानी गुनिया सहरिया के किस्से से लेकर विजयपुर के खाद कारखाने वाली जमीन पर उन्नीसवी शताब्दी में हुए भीषण युद्ध का इतिहास उन्हें मुखाग्र याद है। हाटरोड़ पर बनी रजवाड़ों की कोठियों के किस्सों से लेकर कैंट (रिसाले) में आजादी के समय वापस जाते अंग्रजो द्वारा मार दिए गए कद्दावर घोड़ों और उनके मजबूर साईसों तक की हुलिया उनकी आँखों में अब भी तस्वीर की तरह जड़ी हैं।
मै पहली बार उनके ताँगे मे तब बैठा था, जबकि एल.एल.बी. में एडमिशन लेने गुना आया था। मेरे नाना केशव चंद दुबे ठेकेदार कैंट में ही रहते थे, सो टीका बब्बा के ताँगे में मेरा बैठना हुआ था ताँगे में बैठते समय मैंने उन्हें आदाब किया तो वे निहाल हो उठे और ढ़ेरों आशीष दे डाले मुझे । ताँगे में दूसरी कई सवारियों की उपस्थिती के बावजूद वे मुझसे ही बाते करते रहे थे।
बाद में उन्होंने मुझे आप बीती घटना का किस्सा सुनाया था कि, एक बार जवानी के दिनो में टीका बब्बा बैंक में चौकीदारी की नौकरी पर तैनात थे, एक दिन सुुना था कि बजरंगगढ़ सूबात के एक अंग्रेज क्लर्क ने अपनी इंडियन नौकरानी की बिना बात पिटाई कर दी है, तो वे गुस्सा से भर उठे थे और अकेले ही उस डांसिंग हाल में जा घुसे थे, जिसमें आज कलैक्टोरेट है। वहां नाच रहे गोरों में वे उस गोरे को ही नही ढ़ूढ पाए तो उन्होंने भकुआये से ताकते सारे गोरों को माँ-बहन की गालियाँ देना शुरू कर दिया था। एकआध के साथ तो उन्होने झूमा झटकी कर डाली थी। इस जुर्म में टीका बब्बा कई दिनों तक हवालात में बंद भी रहे और अपना गुरिया-गुरिया तुड़वा के घर वापस लौट पाए थे। पर यह तो शुरूआत थी ऐसे झगड़ो की, बाद में तो बहुत हुए।
उसने पहली मुलाकात में मुझे बड़ा मजा आया और फिर तो मैं रिसाले जाने के लिए प्रायः टीका बब्बा का ताँगा ही तलाशने लगा था। मुझे कई किस्से सुनने को मिले थे उनसे कस्बे की भी और उनकी अपनी जिन्दगी के भी।
काफी पहले उनकी पत्नि बीमारी के कारण एकाएक समाप्त हो गई थीं। अकेले थे वे। जब हवालात में बंद रहने को कारण उन्हे बैंक चौकीदारी से हटा दिया गया, तो वे कई दिनों तक तसला-तगारी डालने की मजदूरी करते रहे। पढ़े-लिखे तो थे नहीं, सो काई काम करने की शर्म भी नही थी उन्हें। बाद में किसी की सलाह पर गाँव की जमीन बेची और ताँगा बनवाया, तब से वे है कि ताँगा है। इस ताँगे से कई महत्वपूर्ण काम किए है उन्होंने, मसलन जाकिर भाई की पतोहू की डिलेवरी बिगड़ जाने पर रात ढाई बजे बिना बुलाए अपना ताँगा जोतकर वे ही खुद जा पहुँचे थे और पतोहू को ताँगे मे डालकर दौड़ते हुए सरकारी अस्पताल ले गए थे। इस रात वे वहाँ से हिले तक नही और जब पता लगा कि बच्चा-जच्चा ठीक है, तो सुबह जाकर ही वे अपनी कोठरी में लौंटे और दिन-भर सोते रहे। जाकिर भाई के बहनोई शरीफ मियाँ की मिट्टी को एक्सीडेंट के बाद वे ही तो अपने ताँगे में डालकर लाए थे। दीना भइया की बिटिया के ब्याह में टीका बब्बा ने अपना ताँगा ही गिरवी रख दिया था और बाद में जाकर किश्त-किश्त चुकाकर वापस उठाया था। अपने किए पर संतोष है, आज भी टीका बब्बा को।
पहनने-ओढ़ने का बड़ा शौक है उन्हें। जब धंधे पर नही होते, तो अपनी कपि दाढ़ी में चमेली के तेल की एकाध बूँद चुपड़कर शेरवानी सूट पहने वे रिसाले के बाजार में चहलकदमी करते आपको प्रायः मिल जाएँगे। घोड़ावाले पीर के उर्स में हर साल रात-रात-भर कव्वाली सुनते हैं और उसी रूचि से वे पन्द्रह दिनों तक रामलीला भी देखते हैं। दशहरा समिति की गल्ला मंडी की रामलीला हो या कैंट की रामलीला, टीका बब्बा परमानेंट दर्शक हैं। मंच पर बोले जाने वाले शेर, कविता और सवैया उन्हें रट से गए हैं और पार्ट करनेवाले कलाकार के साथ-साथ वे भी गुनगुना उठते हैं प्रायः-हे मूर्ख जनक, जल्दी बतला सिव धनवा किसने तोड़ा हैं। इस भरे स्वयंवर में सीता से नाता किसने जोड़ा हैं।
पिछले दिनों टीका बब्बा का ताँगा बड़े दिनों बाद देखने में आया, तो मैंने सोचा कि आज टीका बब्बा की एकाध कहानी ही सुन लूँ।
कैंट तक का किराया आज चार रूपये से कम नहीं, लेकिन टीका बब्बा अभी भी एक रूपया ही लेते हैं। मैं तांगे में बैठ गया तो उन्होने घोड़े को हांक लगाई और चौराहे से गुजरते-गुजरते वे शुरू हो गए-क्या बताएँ बाबू साहब, ये साले एनेफेल ने तो गुना के बच्चों की जिन्दगी ही खराब कर दी। जब इसकी शुरूआत हुई थी, तो सरकार का कहना था कि यहां के निवासियों को रोजगार दिया जाएगा, बच्चों को कमाने को काम मिलेगा, दुकानदारों की बिक्री-बिढ़ोत्री होगी, खुशहाली आएगी। लेकिन सब-कुछ उलटा-शुल्टा हो गया। रोजगार मिलना तो दूर रहा, हमारा तो रोजगार ही छीन रहा है। जाने कहा से टैम्पो टूसीटर वाले आ गये हैं, जो चवन्नी-अठन्नी में सवांरियाँ बैठा लेते हैं और हम टांपते रह जाते हैं। हमेंतो अपना और घोड़े का पेट भरना मुश्किल हैं। बाजार के भाव आसमान छू रहे हैं । क्या करें, कहाँ जाएँ? समझ में नही आता। गुना में देसी लोग कम, परदेसी लोग ज्यादा दिखते हैं। न लाज बची हैं, न शरम। जाने कौन जगह के लोग आए है यहाँ। बेशर्म, अधनंगे लोग-लुगाई हाट बाजार में हाथ में हाथ डाले घूमेंगे, तो हमारे बाल-बच्चों पर भी असर पड़ेगा ही। आज आँखों का लिहाज ही जाने कहाँ खो गया है। पहले जरा किसी को ताप-बुखार हुआ, सारा मुहल्ला दौड़ पड़ता था। आज हर आदमी एसा परेशान और कमैला हो गया है कि केवल अपने घर से मतलब रखता है, पड़ौस में आग लगे या दुःख बीमारी हो किसी को कोई परवाह नही है। आप लाख उनके लिए मरते हो वे आपकी चिरी उँगली पर मूतने नही आएँगे। हमारा क्या है, “आगे नाथ न पीछे पगहा।“ कहते-कहते उनकी आँखे भर आई थीं।
मुझे उनकी आँखों के पीछे दुःख का समंदर लहराता दिखा तो मैंने सहानुभूति वश उनसे सब कुछ स्पष्ट करने का निवेदन किया। वे आहिस्ता से खुले उन्होने अपने भतीजे की कहानी सुनाई थी उस दिन। भतीजा यानी कि उनके घर का एकमात्र चश्मोचिराग मुरारीलाल। बस उसके अलावा बब्बा के घर में गाँव पर कोई न था।
खुद तो उन्होंने घर बार दुबारा बसाया नही था। भाई की मौत के बाद गोदी मे खेलता उनका बेटा मुरारीलाल टीका बब्बा का प्राण प्यारा बन गया था। उनकी इच्छा थी कि वह खूब पढ़े लिखे और खानदान का नाम उछार दे।
कैंट से गुना आते जाते वे एक क्वार्टर के सामने कुछ देर को रूकते थे, पता लगा था कि यह तहसीलदार का बंगला है। चपरासी-बाबू-पटवारी-गिरदावर-किसान और जाने कौन-कौन सी भीड़ लगी रहती थी वहाँ। टीका बब्बा की हसरत थी कि मुरारी बड़ा होकर तहसीलदार बने इसके लिए चाहे कितना भी क्यों न पढ़ना पड़े, वे पढ़ाएंगे, उसे इम्तिहान दिलवाएंगे। कुछ दिनों उन्होंने मुरारी को अपने साथ कस्बे में भी रखा, मगर वे तो फक्कड़ आदमी थे। सुबह तांगा जोता तो शाम को ही लौटना होता था। उधर बेचारा मुरारी दिनभर में हलकान हो जाता थ। उनके पहुंचते ही रोने लगता। एक दिन गांव से भाभी आई, तो वे अपने साथ ही ले गई उसे। टीका बब्बा रोक न पाएं उन्हें ।
किसी के दिमाग को ठोंक-पीटकर तो तेज बनाया नही जा सकता न। मुरारी का दिमाग ज्यादा तेज नही था, इसलिए हर परीक्षा में वह तीसरे दर्जे से पास होता आ रहा था। मुरारी ने जब बी.ए. कर लिया, तो टीका बब्बा की सहज इच्छा हुई कि वह नौकरी करे, कस्बे में और ऊँची नौकरी का इम्तिहान दे। उन्ही दिनों खाद कारखाने की शुरूआत हो रही थी। उसके बड़े अफसर तब गुना में रहते थे। एक अफसर से पहचान थी टीका बब्बा की, उसके बच्चो को तांगे से स्कूल छोड़ने जोते थे वे।
टीका बब्बा ने उस अफसर से कहा-अफसर ने रोजगार कार्यालय में संपर्क करने को कहा। मुरारी और बब्बा कई दिनो तक घूमें, लेकिन रोजगार दफ्तर से लेकर विजयपुर तक किसी से गहरी जान-पहचान न होने से उनका भागना दौड़ना बेकार गया। हिन्दी वाले गरीब-गुरबा की सुनता कौन है आजकल, अंग्रेजी बोलने वाले देश भर के लोगों की भीड़ की भीड़ लग गई, लेकिन टीका बब्बा का एक भतीजा न लग पाया।
टीका बब्बा भी निराश हो चले थे।
दुबारा खाद कारखाने के उस अफसर के पास पहुँचे वे सुबह-सुबह मुरारी को लेकर, तो जाने क्या सोचकर वह अफसर जीप में बैठकर मुरारी को अपने साथ ले गया। टीका बब्बा निश्चिंत होकर लौटे, चलो भगवान ने सुन ली आखिरकार, अब राहत मिली।
शाम को भतीजा लौटा, तो उसने डरते-डरते बताया कि उस अफसर ने प्लांट की साईट पर मुरारी को नौकरी पर नही तसला फैंकने की मजदूरी पर लगाया है, और जब मुरारी ने अपने बी.ए. पास होने की बात कही, तो हँसी उड़ाता वह अफसर बोल उठा कि ऐसे बी.ए.-फी.ए. सैकडों फिरते है यहाँ चप्पले चटकाते हुए। करना हो तो ठीक अन्यथा किसी और को लगा लेंगे।
रात भर दोनों बैठे सोचते रहे थे, कि क्या किया जाए। भतीजे का कहना था कि काम ही करना है, तो कोई सा सही। आज मजदूरी करते हैं, कल को दूसरी कोई नौकरी मिली, तो वह कर लेंगे। आँख के सामने तो निकलेगा कारखाने में नया काम, इसे छोड़ने में कितना समय लगता है।
बब्बा ने भरे मन से स्वीकृति दी थी और मुरारी ने अपने बोरिया-बिस्तर बाँध लिये थे, साईट पर जाने के लिए। जाते समय वह मंदिर पर दर्शन करने गया और लौटकर सीधा मोटर स्टैण्ड के लिए निकल गया था। बब्बा भी ताँगा लेकर उसे छोड़ने गये थे।
कुछ दिनों से टीका बब्बा महसूस करने लगे थे कि कस्बे की रंगत बदलने लगी है। लोग एक अजीब-सी भागमभाग में फंस गए हैं, हरेक को जल्दी हो गई हैं। कस्बे में मकान कम हैं, दुकानें ज्यादा हो गई हैं। हर आदमी अपने मकान का अगला हिस्सा दुकान में तब्दील करना चाहता है। वे समझ नही पा रहे थे, कि ये क्या होता जा रहा है ? आते जाते लोगों को वे पहले जब नमस्कार करते थे, तो लोग झुककर जवाब देते थे। आज आदमी नमस्कार भी नही करता। हरेक व्यक्ति केवल नफा नुकसान देखता है। रिश्ते-संबंध, मान-मर्यादा का किसी को ध्यान नही है। अच्छे-भले घरों की बहू-बेटी नाइन खवासिन का काम करने लगी हैं। औरतों के बाल काटने, चेहरो पर मालिश करने, रंग-रोगन करने की दुकानें घर-घर में खुलती जा रही हैं। टीका बब्बा को वितृष्णा होने लगी है इस विकास से। सच है संस्कृति और मानवता की समाप्ति की शर्त पर होने वाला विकास भला कैसे स्वीकार्य होगा।
यह वही गुना था, जब एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की मौत पर या किसी हादसे से दुःखी होकर लोग पुरा बाजार बंद कर देते थे, और आज यह हाल है कि पड़ोस में गमी हो या दुःख-बीमारी, पड़ोसी को कोई मतलब नही रहता बल्कि अपनी जरा-जरा सी खुशी को खूब गाते-मनाते हैं लोग। न किसी से मतलब, न किसी का लिहाज है उन्हें।
सबसे बड़ी बीमारी जो उभरी थी, वो थी वेश्यावृत्ति। जाने कहाँ से ढेर की ढेर छिनाल औरतें कस्बे के चारो और फैल गई थीं। कस्बे के लड़के बिगड़ रहे थे। घर मिट रहे थे। पर शहर बनता जा रहा कस्बा ऊपर से एकदम ठीक-ठाक, चाक-चौबंद नजर आता था और भीतर ही भीतर नष्ट हो रही थी इसकी निजी पहचान।
किसी से सुना था कि कारखाना बनाने वाले किसी ठेकेदार की किसी बड़ी मशीन के नीचे कोई जवान लड़का बड़ी दर्दनाक मौत मर गया तो वे आशंकित हो उठे थे। कारखाने मे ही तो उनका भतीजा है वह भी जवान है कहीं ? नही नही वह नही हो सकता, होगा कोई और ! सोचते विचारते वे अगले दिन ही कारखाने जा पहुंचे थे। उस अफसर को ढ़ूढा था, तो उसने कंधे उचकाते हुए बताया था कि मुरारी किसी दूसरे ठेकेदार के यहाँ मुंशी बनकर चला गया। टीका बब्बा को ढाढस बँधा। वे सब जगहों पर अकेले भागते दौड़ते रहे, लेकिन हजारो मज़दूरों के बीच किसी एक को तलाशना सहज है क्या ? तीन दिन बाद वे निराश होकर लौटे तो जी उछलकर मुँह को आ रहा था। कहाँ गया मुरारी ? उन्होने खुद तो घर-वार बसाया नहीं, सोचा मुरारी ही वंश चलाएगा, पर मुरारी भी जाने कहाँ।
जाने कितने दिन तक वे अपने कोठरी में लेटे रहे, न कुछ खाना-पीना न सोना। दिन-रात कोठरी के छप्पर को ताकते रहते और डरावनी-सी कल्पनाएँ करते रहते। कई दिनो बाद बाहर निकले तो भूखे प्यासे घोड़े की फिकर हुई और बूझे मन में तांगा जोता। बाजार आए तो लोगो से दुआ सलाम हुई, मन बहला। अगले दिन भी तांगा जोता। फिर भी दिन रात एक ही चिंता मुरारी कहा गया ? आखिर उसी पर टिकी है उनके जीवन की आशा। खानदान का एकमात्र लड़का है वह, वंश डोर उसी के हाथ में है। भाड़ में जाए कारखाना और उसकी नौकरी, राजी खुशी घर लौट आए वह, तो अपनी खेती और गाय-भैंस भले। कही न जाने देंगे उसे, मुरारी के इंतजार में बेचैन रहती हैं टीका बब्बा की आँखें!घुनते जा रहे है वे भीतर ही भीतर।
अपना किस्सा सुनाके जब उन्होंने मुझसे पूछा था कि “वह लौटेगा न बाबूजी !”
तो मैंने उनका दिल रखने को हाँ में सिर हिला दिया था और ताँगे से उतर आया था।
●नाम: राजनारायण बोहरे
●जन्म: 20 सितम्बर 1959 अशोकनगर जनपद मध्यप्रदेश
●शिक्षा: एम ए हिन्दी, एल एल बी
●पुस्तक: चार कथा सँग्रह व एक उपन्यास
●पुरस्कार, सम्मान: मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी पुरस्कार, साहित्य अकादेमी मध्यप्रदेश के सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार
●सम्पर्क: 89 हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी,बस स्टेण्ड,दतिया मप्र 452001
●मोबाइल: 9826689939

