तिमिर का दुर्ग

छवि श्रेय: फूलचंद









तिमिर का दुर्ग 

मैने एक तीली जलाई 
कालिमा दरक गई 
हिल गया तिमिर का दुर्ग 
चूर हो गया अमरत्व का पाखंड 
एक मिथ ढह गया अखंड असत्य का 

तीली भभककर बुझ गई 
रह गई सुलगती 
ज्योति की आशा।

दर्द का सुख 

बावन पार कर चुंकि वो 
सब्जी काटती हैं 
आटा गूंथती हैं 
रोटियाँ सेकती हैं 
और खाना पकाते हुए 
सूचना देने के लहजे में बताती हैं
पिंडलियों की नसें खिंच गई हैं 
जांघों में बहुत पीड़ा है 
ज्यादा देर खड़ा हो पाना 
मुश्किल हो गया है।

खाना खाते खिलाते समय वो 
बावन से बाईस में तब्दील हो जाती है 
खाने के स्वाद की थोड़ी-सी प्रशंसा 
उन्हें मुरीद बना देती है 

वो निबटाने लग जाती है 
जल्दी–जल्दी सारा घरकाम 
बरतन माँजते समय 
फर्श घिसते समय 
कपड़े धोते समय 
वो फिर बावन के पार पहुँच जाती है 
चिकनाहट और कालिख के साथ वो 
अपनी फटी हथेलियों से लड़ती है 
और ताज़गी एवं चमक के एवज में 
सारी वेदना भूल जाती है!

वे कीटक कहलाते है 

रात तो रात होती है 
कभी कोयले – सी काली रात 
कभी दूध – सी झक चांदनी रात 
तारों से भरी कभी सुनहरी रात 
रात के रंग बदलने से 
जुगनुओं की जिम्मेदारी नहीं बदल जाती 
अपना होना बताना ही होता है उन्हें 
रौशनी हो या तिमिर 

अँधेरी रात में जो 
अपनी रौशनी 
अपनी देह में कैदकर सिमट जाते हैं 
वे कीटक कहलाते हैं।

प्रेम के भरोसे  

मैंने अपना छिला हुआ घुटना दिखाया 
और इस तरह 
खून से 
उनका पहला-पहला परिचय कराया 
तलुवों में पड़े छाले दिखाकर 
मैंने उन्हें कदम-कदम चलना सिखाया 
पीठ के घाव दिखाकर 
मैंने उन्हें जिंदगी का ककहरा सिखाया 
भूख की ताकत से मेहनत करना 
लड़ना सिखाया 

अब मेरी सारी  पाठ्यपुस्तकें पूर्ण हो गई हैं 
अब मैं अपने प्रिय बच्चों को 
प्रेम करना सिखा रहा हूँ 
प्रेम के भरोसे 
बिना हिचकिचाए जीना सिखा रहा हूँ |

वह

मोम के बने 
एक जोड़ी पाँव 
पिघले नहीं 
गर्म सतह पर चलते-चलते 

उघड़ी पीठ पर 
दर्ज है 
कठिन संघर्ष और क्रूरता की कथा 
तपते सूर्य के नीचे दिन बिताकर 
टाट के तंबू में 
उमस भरी रात गुजारते हुए 
उसका तालमेल कभी नहीं गड़बड़ाया 
न चिपचिपी हवा 
उसे जगा पाई 
पुलिस के डंडे के पूर्व 
न मच्छरों की भरमार 

सुबह लाल सूर्य की ताज़गी में वह 
इतना हँसता खिलखिलाता है 
जैसे भूख और मुश्किलों को चपत लगाकर 
उनकी खिल्ली उड़ाता है।


● फूलचंद गुप्ता
● संक्षिप्त परिचय

●30 अक्तूबर 1958 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अमराई गाँव में जन्म प्राथमिक शिक्षा गाँव में ही । सन् 1970 में पिता के साथ अहमदाबाद (गुजरात) आ गए। उच्च शिक्षा अहमदाबाद में। एम.ए.(हिंदी) एम.ए. (अंग्रेजी भाषा साहित्य), पीएच. डी. उत्तर गुजरात यूनिवर्सिटी संलग्न बी. आर. एस. महाविद्यालय में अंग्रेजी भाषा का अध्यापन अब सेवा निवृत।

●प्रकाशन

कविता संग्रह 'इसी माहौल में (1996), 'हे राम गुजरात के नरसंहार पर लंबी कविता (पहल पुस्तिका - 2002). 'सांसत में है कडलर गुजरात के नरसंहार पर कविताएँ ।आकंठ पुस्तिका - 2003), 'कोई नहीं सुनाता आग के संस्मरण' (2006), 'राख का ढेर' (2010). 'महागाया' (2011), 'कोट की जेब से झांकली पृथ्वी (2012), 'दिन और कौवे' (2012), 'झरने की तरह' (2013), 'फूल और तितली' (2014) तिमिर का दुर्ग (2021)

●'ख़्वाब ख़्वाहों की सदी है' (गजल) (2009), 'आरज-ए-फूलचंद (गजल) (2015)

●कहानी संग्रह प्रायश्चित नहीं प्रतिशोध (1997) आलोचना: प्रथम दशक के हिन्दी उपन्यास और मुक्तिचेतना' (2016)

●चिंतन: 'गांधी अतरमन' (गुजराती में 2008)

●अंग्रेजी: 3 Gems on grass tips (poems in prose-2018)

●अनुवाद 'लगाव' और 'दरार' श्री रघुवीर चौधरी के मूल गुजराती उपन्यासों का हिन्दी में अनुवाद । 'तलब' श्री हरीश मंगलम की गुजराती कहानियों का हिन्दी में अनुवाद । इसके अलावा गुजराती से हिन्दी में ज्ञानपीठ विजेता स्वर्गीय श्री पन्नालाल पटेल तथा रघुवीर चौधरी की कहानियाँ सहित ढेरों कहानियों कविताजो साक्षात्कारों नाटकों तथा आलोचनात्मक निबंधों के अनुवाद।

●संपादन सुश्री रमणिका गुप्ता के साथ संघर्षरत आम आदमी के गुजराती साहित्य में दलित कलम' का संपादन सहयोग।

●सम्मान

●कविता संग्रह इसी माहौल में के लिए सांप्रदायिक सद्भाव एवं जनवादी लेखन' का 'सफ़दर
●हाशमी पुरस्कार। अरावली शिखर सम्मान गुजरात हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार। हिन्दी के अलावा अंग्रेजी तथा गुजराती में भी लेखन।

●संपर्क:

बी/7 आनंद बंग्लोज, गायत्री मंदिर रोड, महावीरनगर, हिम्मतनगर 383001 (सा.का.) गुजरात

●मोबाइल: 9426379499,8780710593
●इमेल - Phoolchand.1955@gmail.com