| छवि श्रेय: नरेश |
सात आदमी
हर आदमी के पास
एक वीणा है
जिसे वो
बजाना नहीं जानता
हर दूसरा आदमी कहता है
दुख एक स्वर है
जो पकड़ में नहीं आ रहा
हर तीसरा आदमी
उलझा हुआ है
विचारों को कसने में
हर चौथा आदमी
चारों ओर देख रहा है
इस उम्मीद से
कि कोई उसे देख ले
हर पांचवे आदमी का
नहीं है
उसके पास
अपना कोई परिचय
हर छठवें आदमी के पास
एक कहानी है
छल जिसका, मुख्य किरदार है
हर सातवें आदमी को
शिकायत है
हर पहले आदमी से।
एक बच्चा
मैंनै बुजुर्गों से बात की
उनके पास अनुभव थे
और अफसोस भी।
मैंने प्रौढ़ होते लोगों के भीतर देखा
वहाँ एक गहरा खालीपन था
अनसुनी पीड़ाएँ थी।
मैं युवाओं से मिला
उनके चेहरे पर
चिंताएं थी
प्रश्न थे।
फिर मुझसे एक बच्चा मिला
जिसके पास कुछ नहीं था
उसने आसमान की तरफ एक चुंबन उछाला
और मिट्टी पर लेट गया।
आसान उपाय
कभी गाते हुए गायक के चेहरे पर
वो गीत देखा है?
जो वो गा रहा है...
कभी किसी संगीतज्ञ को
सुरों में स्वयं को मिलाते हुए देखा है?
कभी किसी शिल्पकार की चोट में
किसी आकार की आवाज़ सुनी है?
कभी किसी दो दांत वाले शिशु को
मुस्कुराते हुए देखा है ?
कभी किसी स्त्री को
अपने प्रिय पुरुष के कमीज के बटनों को बंद करते हुए देखा है?
अगर नहीं देखा है
तो देखना
और ऐसे देखना
जैसे, तुम सिर्फ आंखें हो
ईश्वर को देखने का
यह सबसे आसान उपाय है।
तो समझना
चित्र बनाते हुए
जो कभी
चित्रकार की कूंची से
एक अकेला रंग
छिटक कर बह निकले
विषय की विपरीत दिशा में
तो समझना
वो कोई मिजाजी बच्चा है
या कैद से छूटी कोई कविता
या फिर
खुद की ओर लौटती हुई
कोई स्त्री....
स्त्रियों ने बचाए हैं
स्त्रियों ने बचाए हैं
रसोई के किसी डब्बे में कुछ पैसे
आड़े वक्त की रसोई के लिए
आंगन में तुलसी बचाई है
पीपल बचाए हैं
चौक चबूतरे पर
स्त्रियों ने बचाया है
दरवाजों के किवाड़ों को
छत की दीवारों को
दीवारों में खिडकियों को
घर में घर
रिश्तों में रिश्ते
और पुरुष में पुरुष को
स्त्रियों ने बचाया है
अपनी आवश्यकताओं से बचकर
प्रश्नों का पानी बचाया है
मौन के बांध बनाकर
स्त्रियों ने
कभी कभी
प्रेम न कर के भी
प्रेम को बचाया है
स्त्रियों ने।
पकड़ा जाता हूँ
बहुत सी चीजों से मुझे बचना होता है
पर बच नहीं पाता हूँ
उनमें से एक है
मेरी अपनी आंखें
मैं अक्सर यह जानने के लिए उन्हें देखता हूँ
कि कहीं वो मुझे देख तो नहीं रही
और मैं पकड़ा जाता हूँ।
अब दुनिया में प्रेम
तुम्हारी उंगलियों के नाखूनों पर
बचा ये मेहंदी का रंग
देख कर लगा
कि कितना कम बचा है
अब दुनिया में प्रेम
और
कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं
नाखून।
नाम : नरेश गुर्जर
निवास : राजस्थान
वर्तमान में सउदी अरब में कार्यरत।
कविता लेखन में रुचि
विभिन्न ऑनलाइन वेब पोर्टलों पर कविताएँ प्रकाशित।
दो काव्य संकलन प्रकाशित:
: सारे सृजन तुमसे है (2019)
: मेरा मुझमें कुछ नहीं" (जनवरी 2021) बोधि प्रकाशन जयपुर से
