ओढ़नी


ओढ़नी

शरीर जब थकता है
तो माँगता है एक नरम बिस्तर और थोड़ा आराम।
सूखा कंठ माँगता है-
ग्लास भर शीतल जल।
यात्रा से थके हुए पैर मांगते हैं कुनकुना
नमक घुला पानी।
दिनभर पोथियाँ पढ़कर थक चुका मस्तिष्क
माँगता है थोड़ी सी नींद।
कविता लिखने से पूर्व
कवि का शांत चित्त
माँगता है थोड़ी-सी बेचैनी।
समाज के बंधनों से बंधकर पृथक हुए दो प्रेमी,
माँगते हैं थोड़ी-सी आज़ादी और आत्माओं का आलिंगन।
वर्षों के व्यभिचार से थक चुकी व्यभिचारिणी,
माँगती है खाली बिस्तर और अपनी करवटें।
चार पहर के दिन में
दो रोटी से गुज़ारा करने वाला मज़दूर माँगता है-
एक और अदद रोटी,
कचड़े से भरी टाट की बोरी ढोते-ढोते
लगभग टूट चुके नाज़ुक काँधे
माँगते हैं मुलायम टेक और किताबों की ख़ुश्बू।
नाम और पैसे की लिप्सा में
स्वार्थ और प्रपंच में लिथड़ा ज़मीर माँगता है-
अंजुली भर ईमान का पानी।

रोज़ ढलते जीवन की साँझ पर
मैं बस चाहूँगा
कविताओं की ओढ़नी
जिसे ओढ़कर चैन से सोया जा सके।


किक्की के लिए

तुम्हें बढ़ते हुए देखने से ज़्यादा सुखद
मेरे लिए और कुछ नहीं 
परन्तु तुम ऐसे वक़्त में बड़ी हो रही हो
मेरी बच्ची
जब मानवता की हांफनी छूटी जा रही है
और हर कोई यह सिद्ध करने
में लगा है कि मनुष्य के भीतर पशुओं से
ज़्यादा पशुता है
प्रेम के मोल में लगातार दर्ज की जा
रही है गिरावट
और संवेदनशीलता हमारी वर्तनी से निरंतर
छिटकती जा रही है
सारी संवेदनाएं हाशिये पर धकेल दी गयी हैं
और मुख्य धारा में ध्वंस की प्रतियोगिताएं 
जारी हैं
आँसू महज़ अभिनय के वक़्त निकल
रहे हैं ग्लिसरीन के सहारे से
और ह्रदय की सीमा रेखा तीव्र गति से
सिकुड़ती जा रही है

मैं नहीं जानता कि तुम्हारा करुण ह्रदय
इस क्रूर समय के लिए अभी तैयार है भी या नहीं
या कभी हो भी पाएगा।

पर इन सबसे परे
तुम बढ़ रही हो अपने सपनों और तमाम
इच्छाओं के साथ

और मैं तुम्हें देख रहा हूँ हँसती आँखों में
छिपी असुरक्षा की भीगी नज़रों से

साथ ही जैसे-तैसे पोस रहा हूँ अपने भीतर
उपजी उम्मीद की उस कोंपल को
जो फुसफुसा रही है
कि इस वक़्त से उलट तुम्हारे समय में
तुम बेफ़िक्री से देखोगी अपनी बच्ची को 
बढ़ते हुए।


प्रतीक्षा

उसकी पसीजी हथेली स्थिर है
उसकी उंगलियां किसी
बेआवाज़ धुन पर थिरक रही हैं

उसका निचला होंठ
दांतों के बीच नींद का स्वांग भर
जागने को विकल लेटा हुआ है

उसके कान ढूँढ़ रहे हैं असंख्य
ध्वनियों के तुमुल में कोई
पहचानी सी आहट

उसकी आंखें खोज रही हैं
बेशुमार फैले संकेतों में
कोई मनचाहा सा इशारा

उसके तलवे तलाश रहे हैं
सैंकड़ों बेमतलब वजहों में चलने का
कोई स्नेहिल सा कारण

वह बहुत शांति से साधे हुए है
अपने भीतर का कोलाहल
समेटे हुए अपना तिनका तिनका
प्रतीक्षा कर रही है किसी के आगमन पर
बिखरने की।

 
घर

एक चिड़िया लौटकर आती है 
और पाती है एक खाली कोना
वह देखती है उस कोने को हर 
कोने से 
इतने जतन के उपरान्त भी उसे नहीं मिल 
पाता एक भी रेशा उसके घोंसले का।

मैं भी कई बार जब लौटकर आया हूँ अपने घर
मैंने हर बार ही पाया है उसे साबुत
पर देहरी के भीतर रखते ही पांव
महसूस करता हूँ उस चिड़िया की पीड़ा,
उसकी बेचैनी

मेरे घर के सही सलामत होने के बावजूद
अचकचाता हुआ ढूँढता रहता हूँ 
वह रेशा 
जिसे मैं पहचानता हूँ।


तुम्हारी स्मृति

कल शाम इच्छाओं की पोटली टटोली
तो हाथ लगी मुझसे भली भांति परिचित
एक लगभग भूला दी गयी इच्छा।

रात एक नए सपने का बीज रोपने जब खोदता हूँ ज़मीन,
तो खुदाई में पाता हूँ सपनों का ढेर सारा मलबा
जिसमें खुंसी पड़ी है तुम्हारी सेफ्टी पिन।

मेज़ की दराज़ के कोने में तुम्हारे कोट का
धूल में लिथड़ा बटन मिला
जिसपर अंगुलीयाँ फिराते ही वह किसी परिचित
तारे की तरह चमका।

मैं प्रार्थना करता हूँ ईश्वर से कि मेरी स्मृतियों
के पौधे पर उगे फूलों पर बसंत हमेशा मेहरबां रहे
और काँटों पर चल जाए पतझड़ का हंसिया

पर यह प्रार्थना भी बाक़ियों की तरह रह जाती है उपेक्षित।

स्मरण शक्ति का दुरुस्त होना भी एक दुर्भाग्य है
और दुर्भाग्यों का कोलाज ज़िन्दग़ी की दीवार
का श्रृंगार है।


अंत में

और अंत में तुम्हारे होंठों के कोरों
पर फटे चिथड़ों की भांति चिपके रह
जाएंगे शब्द

तुम्हारी जीभ जब करेगी उनका स्पर्श
तो तुम्हें याद आएंगी वह तमाम बातें
जिनका गला घोंट तुम भरते रहे दिल मेंंरा नाम राहुल रोोोर है मम
के भीतर मौजूद चुप्पियों का दराज़

दुनिया को विदा कहने से पूर्व
तुम बनाना चाहोगे एक ख़ुशरंग लिबास

बटोरोगे होंठों के कोरों से चिथड़े
खंगालोगे चुप्पियों का दराज़
करोगे बहुत सी कोशिशें
पर अंततः
बस बना पाओगे एक बदरंग सी चादर
जहाँ उधड़ी होगी चिथड़ों के बीच की
सिलाई
जिससे झाँकती मिलेंगी चुप्पियाँ
चुपचाप।


धूप

जितनी भर आ सकती थी
आ गयी
बाकी ठहरी रही किवाड़ पर
अपने भर जगह के लिए
प्रतीक्षित

उतनी भर ही चाहिए थी मुझे बाकी के लिये रुकावट थी
जिसका मुझे खेद भी नहीं था

दरवाज़े की पीठ पर देती रही दस्तक
उसे पता था कि दरवाज़ा पूरा खुल सकता है

जितनी भर अंदर थी उतनी भर ही जगह थी सोफ़े पर…
उतनी ही जगह घेरती थीं तुम

उतनी भर जगह का खालीपन सालता है मुझे
जिसे भरने का प्रयत्न हर सुबह करता हूँ।


जीवन

सुख विलुप्ती की कगार पर खड़ी उस संकटग्रस्त चिड़िया का नाम है जिसके मिलने की ख़बर कभी-कभार कानों में पड़ जाती है।

दुख वह जंगली घास है जिसे हर सुबह बस इसलिए काटता हूँ
कि जब कभी सुख नामक चिड़िया दिखे तो उसे झट से
पकड़ लूँ।

उम्मीद कटी घास के गट्ठर में कहीं घोंसले का दिख
जाना है।

और जीवन है,
उसी गट्ठर पर
एक ही तरीक़े से बार-बार चढ़ने के प्रयास में
हर बार नए तरीक़े से गिरना।


चाभी

प्रकाश से बनी चाभी से हम
खोलतें हैं अन्धकार से घिरा दरवाज़ा
और पाते हैं स्वयं को और गहन अन्धकार में
एक नए अन्धकार घिरे हम
फिर खोजने लगते हैं एक नया दरवाज़ा
जिसके मिलते ही हम वापस दौड़ पड़ते हैं
प्रकाश की ओर
हासिल करने एक और चाभी

वर्षों की भागादौड़ी के बाद भी
अंततः बस यही जान पाते हैं

कि सारी चाभियाँ प्रकाश से बनती हैं
परंतु वे जिन दरवाज़ों को खोलती हैं
वे सब के सब अंधकार की ओर
खुलते हैं.


सामान्यीकरण

संकेतों को समझना कभी आसाँ नहीं रहा

तभी तो हम कभी ठीक से समझ नहीं पाए आँसूओं को
न ही जान पाए कि हँसना
हर बार ख़ुशी का इज़हार नहीं होता

हमनें व्यक्ति को जीवित माना नब्ज़ और धड़कन के शरीर में होने से
और यह उम्मीद रखी कि हमारा माना हुआ जीवित आदमी
करेगा जीवित व्यक्तियों सा बर्ताव

हम चौंके इस बात पर कि एक जीवित व्यक्ति भी हो सकता है
मुर्दे से ज़्यादा मृत

हम गुस्साए, खिसियाए
फिर, फिर हो गए सामान्य…

न जाने कितनी लंबी फ़ेहरिस्त है उन चीज़ों की
जो अब इतनी सामान्य हो चलीं हैं कि उनका ज़िक्र करना तक
उबाऊ लगता है।


उम्मीद

उसने पढ़ा "दोज़ख" और 
और सोचा पृथ्वी के बारे में

उसने पढ़ा "सम्भावना"
और बनाई स्त्री की तस्वीर

कुछ इस तरह उसके भीतर बची रही
एक रोज़ धरती के स्वर्ग बनने की उम्मीद


प्रश्न चिन्ह

बाथरूम के नलके से टपक रहा है पानी बूँद बूँद
प्लास्टिक की बाल्टी से उठती टकटक की ध्वनि
कुछ ही देर में हो जाएगी टपटप में परिवर्तित
तुम सुनोगे और सोचोगे कि कौन सा संगीत
था ज़्यादा बेहतर फिर इस प्रश्न की निरर्थकता
पर हंसोगे और करोगे अन्य कई निरर्थक
प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास
यह जानते हुए कि वहाँ भी हल की जगह आएगी
केवल हँसी

 तुम्हारे पास प्रश्न बहुत हैं 
इतने कि उत्तर के लिए आरक्षित जगह पर भी
उग आए हैं प्रश्न चिन्ह

तुम कामू का द्वार खटखटाते हो और उसके घर के भीतर
कुछ समय गुज़ारकर प्रश्नों को बस एब्सर्ड भर कहना सीख
पाते हो।

दर्शन के चूल्हे पर जीवन को चढ़ाते हो और
जीवन के पकने के इंतज़ार करते तुम पाते हो
जली हांडी में चिपका अंधकार
नीचे होम हो चुका सारा दर्शन और
हवा में गुल जीवन की सारी
परिभाषाएं।


टीस

मैं जुड़ना चाहता था जूड़े से फूल बनकर
मैं जुड़ना चाहता था सड़क से पहिया बनकर
मैं जुड़ना चाहता था धरती से पेड़ बनकर
मैं जुड़ना चाहता था अंतरिक्ष से तारे और आकाश से 
चिड़िया बनकर
मैं चीज़ों से, लोगों से जुड़ना चाहता था
उन्हें और सुंदर करता हुआ
जबकि सबकुछ छूटता रहा 
धीरे धीरे
मुझे करता हुआ कुरूप


बारिश

बारिश में तन गीला हो या न हो 
मन अवश्य ही भींजता है
 
मिट्टी की सौंधी गंध नथुनों में
पड़ते ही खुल जाती है
अतीत के कमरे की कोई खिड़की
जहाँ से दिखते हैं कीच में सने 
मेरे नन्हे पैर
और हँसते हुए मेरे चेहरे पर
झरती बारिश की निर्मल बूंदें
 
जवानी में हो रही इस बारिश का स्पर्श पा
भीगने लगता है मेरे बचपन का कोई कमरा

और औचक ही सूखी आँखों में उतर
आती है नमी


एक दिन

कोई रोयेगा नहीं क्योंकि आँसू ख़त्म हो चुके होंगे
और आँखें भूल चुकी होंगी सपने देखना
कोई मदद के लिए पुकारेगा नहीं क्योंकि मदद नामक
शब्द हमारी भाषा के शब्दकोशों में होगा ही नहीं
कोई विरोध के लिए आवाज़ बुलंद नहीं करेगा क्योंकि
क्रांति की परिभाषा इस क़दर दूषित हो जाएगी कि
लड़ने से बेहतर समझा जाएगा हथियार डालना
हम कुछ इस तरह अमानवीयता और अन्यायों के
आदी हो जाएंगे कि किसी भी दुर्घटना के बारे में सुनकर 
न माथे पर बल पड़ेंगे हमारे, न झुकेंगी शर्म से हमारी आँखें।


एकमात्र विकल्प

प्रार्थना में उठे हाथ कराहते कराहते
सुन्न पड़ गए हैं
प्रतिक्षा में सूख चुकी है उनकी
आँखों की नमी
पीठ की अकड़न
गर्दन से होते हुए पहुँच चुकि है
ज़ुबान तक।
अब वे जिस भाषा में रिरिया रहे हैं
उसे सुन
उन्हें पागल कह देना ही एकमात्र
विकल्प है


राहुल तोमर एक युवा लेखक व अनुवादक हैं। यह ग्वालियर के रहने वाले हैं।