तदुपरांत

तदुपरांत

अनेक बार बेवक्त बोल पड़ने के बाद
मौके पे चुप रहने का अभ्यास आता है

कुछेक क़ीमती चीज़ें छूट जाने के बाद
चुन लेने की आकंठ प्रतीक्षा आती है

परिंडे पर रखा घड़ा चटखने के बाद
घाट से उतरता कुम्हलाता जल याद आता है

सत्तासीन की उदासीनता देखने के बाद
नाखून पर सूखी नीली स्याही चिढ़ाती है

एक किशोर की आत्महत्या के बाद
बच्चों के निपट शांत कमरें साँस रोकते हैं

अनेक बेचैन पंक्तियाँ अधूरी रहने के बाद
वे कविता नहीं,कोई कहानी बनके लौटती है

स्वजनों के सम्मुख बारहा रोने-बिसूरने के बाद
उनसे मिली घृणा और उपेक्षा,मजबूत बनाती है

आदमी के भीतर स्वयं के लिए उठे विरोध के बाद 
वह बाहर लड़ने-भिड़ने के लिए तैयार हो पाता है


मियाद

कितनी लंबी हो सकती है
शालीनता भरी एक चुप्पी की उम्र
यक़ीनन उतनी ही लंबी ;
जितनी बर्र के छत्ते में हाथ डालने से पूर्व
किसी मसखरे की देह सुरक्षित थी

कितनी देर तक टाला जा सकता है
एक निर्लज्ज मुस्कान का विरोध
यक़ीनन उतनी ही देर तलक ;
जब तक आत्मा सो रही हो
इस गहरे वहम में कि
आँखें स्थिति के अनुरूप शिष्टाचार सीख चुकी हैं

उम्र के किस पड़ाव तक
एक स्त्री बाबुल के घर को थोड़ा कम याद कर सकती है
यक़ीनन उस पल तक ;
जब-तलक उसका साथी आशा-निराशा के क्षणों में
उसके उच्छ्वासों पर अपनी सयंमित साँसों का आलिंगन देता रहे।


स्त्री की व्यक्तिगत भाषा

स्त्री ने जब अपनी भाषा चुनी
तब कुछ आपत्तियाँ दर्ज़ हुई–

 पहली आपत्ति दहलीज़ को थी
अब उसे एक नियत समय के बाद भी जागना था

दूसरी आपत्ति मुख्य-द्वार को थी
उसे अब गाहे-बगाहे खटकाये जाने पर लोकलाज का भय था

तीसरी पुरज़ोर आपत्ति माँ हव्वा को थी
अब उसकी नज़रें पहले सी स्वस्थ न रहीं थीं

चौथी आपत्ति आस-पड़ोस को थी
वे अपनी बेटियों के पर निकलने के अंदेशें से शर्मिंदा थे

पाँचवीं आपत्ति उन कविताओं को थी
जिनके भीतर स्त्री 
मात्र मांसल-वस्तु बनाकर धर दी गई थी

स्वयं भाषावली भी उधेड़बुन में थी 
कि कहीं इतिहासकार उसे स्त्री को बरगलाने का दोषी न ठहरा दें

तब से गली-मुहल्ला,आँगन व पंचायतों के निजी एकांत
अनवरत विरोध में है कि
स्त्री को अथाह प्रेम और चल-अचल सम्पति दे देनी थी

लेकिन उसकी व्यक्तिगत-भाषा नहीं ..!!


रोना निषेध है

लड़के सुनते रहे अपने पिता से
"लड़कियों की तरह क्या रोता है!"
लड़कियां भी सुनती रही अपनी माँ से
"यह औरतों की तरह रोना बन्द करों!"

रोना एक तरह से
सामान्य - नैसर्गिक मानवीय क्रिया न होकर
आदिम स्त्रैण गुण और स्त्री सुलभ कमजोरी सिद्ध था 

लड़के को पुरूष बने रहने के लिए
कठोर बने रहना था
और लड़की को पुरुष जैसा बनने के लिए
अधिक कठोर होना था

अब तुम अफसोस करते हो कि
यह दुनिया इतनी कठोर क्यों होती जा रही है!

जबकि,सबसे आसान था
मन्दिम रोकर कोमल बने रहना
और हमने तो...
आँसुओं को सुखाने के ताबड़तोड़ ढेरों प्रबंध किए हैं।


सन्दर्भ की सीमा

आकाश को निहारते हुए
हमनें सूरज की नियमित प्रतिक्षाएँ की हैं
चाँद से सर्वाधिक बातें -शिकायतें
और तारों के बारे में बताया गया
कि वे पुरख़े दोस्त और कुछ अजनबी हैं
ग्रह-नक्षत्रों को तो शौकिया नजूमी ने भी अधिक समझा दिया
एलियन,उल्कापिंड,उड़नतश्तरी भय-कौतूहल भरते रहे
जबकि आकाश,
हर सिर की सुविधाजनक छतरी भर हो सकता था
जिसे व्याख्यायित करना 
किसी मनुष्य और विज्ञान के हाथ में नहीं था

जब कविताओं ने
समुद्र को प्रेमिल पुरुष की उपाधि दी
जो वह हर नदी के लिए 
स्त्री होने की अंतिम घोषणा बनी 
जबकि वे पिता-पुत्री भी हो सकते थे!
भला..कई स्त्रियों के प्रेम में पड़ चुके
एक प्रेमी की छाती के दुःख,दुश्वारियां
पुत्री के पिता से बढ़कर क्या होते होंगे!
समुद्र की नीली गर्वित देह
प्रेम के उछाह-विछोह से नहीं 
पिता द्वारा पुत्रियों को विस्तीर्ण आकाश सौंप देने से का परिणाम है।

आभासी-सभाओं में 
अपने घर के पुरुषों को बारहा गरियाती 
स्त्री की पीठ ठोंकते स्वतंत्र-स्नेही पुरुषों ने
यदि अपने घर लौटकर
चुप रहती स्त्रियों को खूब प्रेम किया हो !
नहीं पूछा हो उनसे कारण
कुछ देरी से लौटने का
नहीं खंगाले हो चुपके से
उनके सोशल मीडिया के
कुछ मजाकिया /अबूझे कमेन्ट-रिप्लाई 
तो वह गरियाती स्त्री अपने उद्देश्य में ख़ूब सफल है!


किसी एक रोज़

कलम छूटने से पूर्व
कवि को चुन लेना चाहिए 
एक उत्तराधिकारी ;
सौंप देनी चाहिए अपनी अधूरी कविताएँ
जैसे हम घोषित करते हैं
वसीयत में अपने मनपसंद वारिस का नाम

अकाल-गंध पर
किसान को लौरियाँ सुनानी चाहिए
समीपस्थ जंगलात के सभी ठूंठों को ;
और भय मुक्त हो जाना चाहिए
उसके साथियों को भी 
क्योंकि किसान ने बचाया है
उन्हें भी ठूँठ में बदलने से

दुनियादारी सिखाते हुए
माँओं को बेटियों के साथ 
साझे करने चाहिए ;
एक अदद प्रेमिका होने के राज 
और प्रेम लौटाती स्त्री का दुस्साहस भी 
ताकि प्रेम से बावस्ता होने पर
उन्हें शील नागरिकता छिन जाने का कोई भय न हो

सुनी जानी चाहिए
अंजुरी भर-भरके
किसी जलस्रोत के भी सुखया-दुखया 
आख़िर,हमने भी अपने भय और तृप्तियाँ
सर्वाधिक इन्हीं के पास कभी अकेले 
तो कभी दुकेले बैठकर बाँटें ही हैं ;
जल की स्मृतियों में हमारी बुदबुदाहटों की वे अनुगूँजें हैं
जहाँ अभी भी 
हमारे मनुष्य बने रहने के एकाध कारण बचे हुए हैं

हमें चखनी चाहिए
उन सभी बदलावों की तीख़ी फाँकें
जहाँ हम पीठ पीछे धीरे-धीरे 
सम्बोधन से ज़्यादा विशेषणों में पुकारे जाने लगते हैं ;
जैसे–ढोंगी,कुटिल,मौकापरस्त,स्वार्थी वगैरह.. 
और हाँ!
समझदार,गरीब,भिखारी व दुःखी भी
वह भी...
लहूलुहान किये जाने से ठीक-ठीक पहले।


हिन्दी सीझ रही है

पुरानी हिन्दी बनाम नई हिन्दी मौलिकता
को लेकर उठे वैचारिक द्वंद्व के बीच
कहीं भाषा की आत्मा लय-ताल न खो दे

क्या इतना काफी नहीं है
भाषा के आलोचकों और पुरोधाओं के लिए ;
कि हिन्दी खूब बोली जा रही है
लिखी जा रही है..समझी जा रही है
पुराने बासमती चावल सी
हिन्दी सीझ रही है मनुज की आत्मा में

भाषा का नमक चढ़ने दो
उसके मनमाफ़िक पाठकों तक
उस पाठक तक ;
जो,सिर्फ हिन्दी को जानता-पहचानता है
उसकी आयु को नहीं 
यह हिन्दी उसकी पुरखों की आदिम वाणी है
इसे बार-बार फूटने दो,बहने दो,लौटने दो...

रह जाये इतनी पहचान और ठसक 
अपनी हिन्दी की ;
कि इसकी सभा-चौपालों में 
आने वाले के कांधे में 
अगर गँधाता नमकीन अंगोछा हो
या झूलती हो कोई सुगन्धित विदेशी टाई
तो भी मंच पर कोई पराई अकबक़ाहट न हो

बस,
उसके मुँह से जब नेह बरसे 
गझिन आत्मीयता से
या फूटे कोई आक्रोश भी ;
उस बोली की त्वरा और तेवर
अपनी हिन्दी का हो
भले ही वह किसी भी जनपद की हो
टूटी-फूटी या मिश्रित ही सही
सोंधी न सही खाँटी ही भली!
अनबुझी रह जाए तो कोई बात नहीं
अनसुनी रह जाए तो मलाल नहीं

देखना!
हिन्दी की आत्मा
अपनी खूँटी से रँभाती गईया की तरह
अपना नाम हर बोली में पहचान ही लेगी।


सभ्यता

(१)

शाब्दिक प्रक्षालनों के इस दौर में
कोई मुझे असभ्य न पुकार लें
मैं अपनी दुनिया के व्यवस्थित बाड़े में
बहुत सजग रहती हूँ...

सभ्य-असभ्य घोषित होने की बेचैनी में
कभी-कभी सभ्यता मुझे 
नगर से बाहर किसी उजड़ी बस्ती में मिल जाती है!

जब,वे मुझे हर तरह से निहत्था देख
आँखों ही आँखों में सवाल करतें हैं
फ़िर.. मुझे अकेला छोड़ देते हैं!

(२)

बघेरे के पीछे हथियार लेकर दौड़ती 
सभ्यता के मध्य से कोई एक चिल्लाया
"उसे अकेला छोड़ दो..वह हमला नहीं करेगा!'
फ़िर एकाएक सभ्यता ठिठकी...
साँस रोके औदार्य बनी रही

बघेरे के इस तरह अकेले छोड़े जाने पर
यदि नगर में लोकतांत्रिकता बनी रहती है
तो..
हम उसे भीड़ में क्यों ले आये हैं?

(३)

भीड़ ने अपने ही जैसे 
किसी एक को तत्क्षण अकेला छोड़ दिया था !
जो,उसकी तरफ पीठ कर
सड़क किनारे बैठ
बड़ी ही सभ्यता से अपने ईश्वर को पुकारने लगा था

भीड़ को भला
मौन और शांतिपाठ में क्या रुचि!



बाँस में पुष्प खिलना

वे मनुष्य
सर्वाधिक कोमल रह पाए थे ;
जो स्वयं को सोचने भर से
छुईमुई बन जाने के अभ्यस्त हो चुके थे

जो बार-बार निर्बल सिद्ध होने लगे थे
स्वयं की नजरों में ;
आखिरकार उन्होनें,एक दिन
स्वयं को लिखकर उसे सार्वजनिक किया

और जो,बने रह पाए थे सबल 
बनिस्बत उनके ;
जिन्होंने लिखा...मगर
उसे क़िताबों के मध्य रखकर भूल गये

सबसे कठोर वे सिद्ध हुए
जिन्होंने दूसरों के शब्दों को भटकाकर ;
समय से दुरभि संधि की
और लंबे अवकाश पर चले गए

फ़िर एक दिन
कोमल और सबल मनुष्यों ने भी ;
शब्दों से उठते ख़मीर को धूप दिखाई
उन्हें ताम्बई किया और बारिश में भीजने दिया
पीतवर्णी भी हुए तो
अल्पावधि के लिये ही 

क्योंकि वे जान चुके थे
रहस्य इस भाव-सम्पदा का;
कि स्वयं को लिखते जाना
कमज़ोर पड़ते हृदय की सबसे बलिष्ठ भाषा है
गूँगी जिह्वा की अति संवेदी वाचाल ग्रन्थियां हैं

हालाँकि वे सब अवगत हो चुके थे
इस महा-रहस्य से भी,कि
शब्दों को सार्वजनिक करने से
स्वयं के भीतर 

बांस में पुष्प खिलने की घटना भी हो सकती है!


मंजुला बिष्ट कवि और कहानीकार हैं,

विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं व ब्लॉग्स में प्रकाशित हैं। 

कुमाऊँ यूनिवर्सिटी से बीए और मुंबई यूनिवर्सिटी से बीएड।

जन्मभूमि उत्तराखंड,

कर्मभूमि राजस्थान है।

प्रथम कविता-संग्रह 'खाँटी ही भली' बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित।

सम्पर्क:-8209933491