अगर आप वह हैं










अगर आप वह हैं

अगर आप वह हैं
तो इसका मतलब यह नहीं कि
आप किसी के चमचे हो जाएँ
ऐसे में खत्म हो जाएगा-
आपका अपना असली रंग-ढंग
और वजूद !

अगर आप वह हैं
तो इसका मतलब यह नहीं कि
डोलते रहे शक्तिशाली आदमी के आगे-पीछे
गाते रहें उनकी झूठी प्रशंसा
या लिखते रहें चरण-चालीसा
ऐसे में पढ़ाई-लिखाई का 
क्या अर्थ?

अगर आप वह हैं
तो इसका मतलब यह नहीं कि
आप हो जाएँ गमछा
ऐसे में तो कोई भी डाल लेगा अपने कंधे पर
पोंछने लगेगा हाथ-मुँह
और गंदा होने पर फेंक देगा एक कोने में

अगर आप वह हैं
तो इसका मतलब यह नहीं कि
आप हो जाएँ लड्डू-पिश्ता बर्फी
ऐसे में तो कोई भी उठाकर खा लेगा
फिर?

फिर... क्या होगा
अगर आप वह हैं 
यानी युवा।


जिन्होंने नदी नहीं देखी

सफाई कर्मी सफाई करते हैं
छोटी-बड़ी सड़कों की, 
गलियों की, 
पार्कों की, 

सफाई करते हैं
शहर के हाथ-पाँव मुँह की
एक-एक कोने की

सफाई करते हैं
धूप, आकाश, धरती और
हवाओं की

सफाई करते हैं
घर पहुँकर अन्त में 
अपनी भी

जिन्होंने नदी नहीं देखी
देख लें -
सफाई कर्मियों को।


मैंने थाम ली किताबें

किसी ने युध्द थामा,
किसी ने दंगा,
किसी ने भेद-भाव का डंक,
किसी ने लोकतंत्र में सिर्फ अपना हित
किसी ने फेसबुक पर इग्नोर करने का 
सूक्ष्म हथियार

किसी ने थाम ली-
उम्र भर के लिए धूर्तता 
और चालाकी,
किसी ने किसी को नीचा दिखाने की 
सोच,
किसी ने हर स्थिति में चुप रहने की 
कला,
किसी ने डर-डरकर 
जीवन जीने की डालियाँ

मैंने थाम ली किताबें
और तमाम समस्याओं के बीच भी
बचा रहा मेरा चेहरा।


आदमी और भाषा

आदमी के बिगड़ने पर 
बिगड़ जाती है भाषा 
और भाषा के बिगड़ने पर आदमी

हो जाते हैं दोनों
खाली-पुराने मकान की तरह
विरान 
और बेकार

फिर 
बच नहीं पाता 
इनमें से कोई भी।     


कह देना मुझे कुछ भी 

पेड़ करते हैं हवाओं से बातचीत
हवाएँ करती हैं 
बादलों से बातचीत

बादल करते हैं 
आकाश से बातचीत
और आकाश... पृथ्वी से बातचीत

पृथ्वी करती है 
जीव-जन्तु, नदियों से बातचीत
फिर बरसता है पानी टपाटप

इनकी बातचीत के बिना
बरस जाए यदि पानी की एक बूँद भी !
तो कह देना मुझे – 
कुछ ... कभी 
तुम।


दिल-दिमाग होने का मतलब 

रेशमी कपड़े पहनकर धूप
जा पहुँची 
खुली खिड़कियों के रास्ते
उदास कमरे में

यह बात बहुत 
नागवार गुज़री अँधेरे को
जो अपनी टाँगें फैलाकर सो रहा था
सदियों से निश्चिन्त

वह उठा और देने लगा गालियाँ
कभी कमरे को, 
कभी धूप को, 
कभी खिड़कियों को
लेकिन अपनी चलती न देख,
चला गया अपना सा मुँह बनाकर
अतिशीघ्र वहाँ से

उसके जाते ही
चमक उठा कमरा जैसे ताजमहल
फिर दिखने लगा
कमरे के अन्दर सब कुछ स्पष्ट-
कहाँ पर साफ-गंदी चीजें
कहाँ पर बुराइयों की गठरी
कहाँ पर समस्याओं का हल
कहाँ पर क्या-क्या

मनुष्य में 
दिल-दिमाग होने का मतलब ?
यही कि उनकी खिड़कियाँ भी खुली हों 
ताकि पहुँचती रहे धूप भी
उन तक।


अहित में बेशक

पहली आवाज गूँजी-
पेड़ों के पैर काटने पर ही
दिखेगा सामने से उगता हुआ सूरज

दूसरी आवाज ने बागडोर संभाली-
न फल देता है, न फूल, 
न छाया-लकड़ी
और देता भी है तो क्या लेना-देना हमें!

फिर तीसरी आवाज घुसी सभी के कानों में-
बहुत गिरते हैं पत्ते यहाँ
और चिड़ियों की बीट भी
साफ-सफाई करने वाला भी नहीं कोई
इसलिए नेस्तनाबूद करना ही ठीक होगा
इन पेड़ों को

चौथी-पाँचवीं आवाजों ने भी 
प्रकट की अपनी सहमतियाँ 
लेकिन पेड़ों की मजबूती, 
भव्यता और संघर्षशील व्यक्तित्व देखकर 
त्याग दिए उन्होंने अपने इरादे-विचार 

अहित में बेशक...
उठें लाख-लाख आवाजें 
पर व्यक्ति की मजबूती, भव्यता 
और संघर्षशील व्यक्तित्व ही बचाती है उसे 
क्षण-क्षण 
छोटे-बड़े संकटों से 
और तूफानों से।


प्लीज... पैसे न दीजिए

चाय वाले ने 
चाय पिलाकर कहा-
आप चाहते हैं कि 
मैं आगे भी पिलाता रहूँ चाय
तो प्लीज... पैसे न दीजिए

सब्जी वाले ने सब्जियाँ थमाकर 
अपनत्व से देखा उन्हें
फिर बोला- चले जाइए यहाँ से अब 
कुछ भी नहीं सुनूँगा, 
बिलकुल दुर्वासा हूँ मैं
प्लीज... पैसे न दीजिए

रिक्शावाले ने घर तक छोड़ा उन्हें 
और हाथ थामकर कहा-
आप चाहते हैं कि आपसे न लड़ूँ- 
न झगड़ूँ मैं
तो चुपचाप चले जाइए सीधे अपने घर
रात के दस बज रहे हैं 
और भाभी-बच्चे 
इन्तज़ार कर रहे हैं आपका
प्लीज... पैसे न दीजिए

मोची ने 
जूते को नया-नवेला बनाकर कहा-
आपकी तरह ही बहुत दम है इसमें
लेकिन प्लीज... पैसे न दीजिए
इतना ग़रीब भी न हूँ कि
जिन्होंने लड़ा, 
जान लगा दी हमारे लिए
उन्हीं को न जानूँ-पहचानूँ

एक ठेलेवाले ने 
उनके कंधे पर लटका दिया एक झोला-
चुकन्दर और पपीता बहुत अच्छे हैं
ये खून भी बढ़ाते हैं 
और प्लेटरेट्स भी
लेकिन हाथ जोड़ता हूँ-
कभी-कभार ही तो आते हैं आप
उस पर पर भी पैसे देने की सोचकर
इतना ज़ुलम करते हैं!
भाई साहब! ऐसा करके 
न करें- शर्मिदा
आप ही कारण तो बचा है यह ठेला
यह जगह यह चौराहा
हमारी रोजी-रोटी और हम सब
इसलिए प्लीज... पैसे न दीजिए

इस प्रकार 
लगा कि अब एक भी नहीं चलेगी
लेकिन जननायक भी जननायक था
जब किसी की रोजी-रोटी छीनने के लिए 
बेचैन लालची अन्धेरी शक्तियों की 
नहीं चली
उसके सामने

तो क्या मजाल कि चल जाती
चायवाले, सब्जीवाले, रिक्शावाले, 
मोचीवाले 
और ठेलेवाले की एक भी
अन्ततः सबको पैसे देकर ही माना, 
वह जननायक! 


जहाँ लोहा नहीं था

जहाँ लोहा नहीं था
वहाँ की धरती धँस गई

और जहाँ लोहा था
वहाँ की धरती
बिलकुल भी नहीं धँसी!

चाहे 
जितना पड़ा भार!
जितनी पड़ी मार, 
जितना भी पड़ा 
दवाब

इसलिए
जहाँ भी जाता हूँ
लोहा... लेकर जाता हूँ।


नाम : खेमकरण ‘सोमन’
जन्म : 02 जून 1984, रूद्रपुर, उत्तराखण्ड में 
शिक्षा : एमए0 (हिन्दी), बी0एड0, यूजीसी-सेट, यूजीसी नेट-जेआरएफ, हिन्दी लघुकथा में पी-एच0 डी0।

प्रकाशन:   

सब लोग, कथाक्रम, परिकथा, वागर्थ, यथावत, बया, कथादेश, पुनर्नवा, अनुनाद, पहली बार, पाखी, साहित्य अमृत, विभोम-स्वर, नया ज्ञानोदय, यथावत, सेतु, पुरवाई, दैनिक जागरण, आधारशिला, लघुकथा डॉट कॉम, कविता विहान, शैक्षिक दखल, युगवाणी, उत्तरा, आजकल, पाठ, लघुकथा कलश, कादम्बिनी, प्रतिश्रुति, संरचना, कृति ओर, अमर उजाला और अक्सर आदि पत्र-पत्रिकाओं- ब्लॉग में प्रकाशित। रचनाओं का आकाशवाणी रामपुर (उत्तर प्रदेश) से नियमित प्रसारण।

सम्मान:       

कहानी ‘लड़की पसंद है’पर दैनिक जागरण द्वारा युवा प्रोत्साहन पुरस्कार, 
कथादेश अखिल भारतीय हिन्दी लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा ‘अन्तिम चारा’को तृतीय पुरस्कार,
पहला काव्य संग्रह ‘नई दिल्ली दो सौ बत्तीस किलोमीटर’शीघ्र ही प्रकाश्य। 

सम्प्रति:   

हिन्दी विभाग, राजकीय महाविद्यालय मालधनचौड़, जिला-नैनीताल, उत्तराखण्ड -244716 में कार्यरत।

सम्पर्कः 

खेमकरण ‘सोमन’
द्वारा श्री बुलकी साहनी, 
प्रथम कुंज, अम्बिका विहार, भूरारानी, वार्ड-32, 
रूद्रपुर, जिला-ऊधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड-263153
मोबाइल: 09045022156