तुम्हारा नाम

तुम्हारा नाम 

इस उम्र में जबकि 
तलब किसी लत की तरह सताती है,
तुम्हारी याद का निर्मम दु:ख सीने में,
भारी पत्थर की तरह पड़ा रहता है।

मुझे हर चीज़ ज़रा देर से मिली ।
मन मुताबिक तो कभी कुछ मिला ही नहीं। 
मन मिला, वो भी बेहद कच्ची मिट्टी से बना हुआ।  
टूटा हारा और सदा दुखता हुआ। 

दर्द के मौसम भी मन की टहनियों पर खिलते हैं
याद के पीले पत्ते इसी आत्मा के आंगन में झरते हैं। 
मैं इन्हे नियति मान बुहारती हूँ
ज्यों किसी को कभी दिए, दुःख का पश्चाताप हो। 

तुम्हारे नाम के अर्थों से 
तुम्हारी आत्मा का पता पूछती हूँ ।
पूछती हूँ कि आख़िर तुम्हारे नाम के 
किस पर्याय की सदा तुम्हारे अंतस में गूंजती है!

सोचती हूँ;
वे लोग कितने ख़ुश क़िस्मत होते होंगे
जिनकी पुकार पर तुम पलट कर देखते होंगे। 

जीवन बेहद क्षणिक और भंगुर है मेरे प्यार! 
मैं बहुत सी कामनाएं ढो कर नहीं मरना चाहती । 
तुम पलट कर एक बार देख लेना बस । 

उम्र की धूप ढलने से पहले 
मैं एक बार तुम्हारा नाम पुकार लेना चाहती हूँ। 


मनोरोगी

डोले से उतर, तुम्हारे आंगन में पग धर
देहरी पर अक्षतों की बौछार की। 
तुम हर्षित हुए
तुमने मुझे लक्ष्मी कहा। 

तुम्हारी रसोई के धुंधुआते चुल्हे पर 
पकाई खीर, परोसी सबको
तुम तृप्त हुए
तुमने मुझे अन्नपूर्णा कहा।

बच्चे अपनी कोख में रख
किये भीतर बाहर के सारे काम 
जने तुम्हारे बच्चे, दांत और मुठ्ठियाँ भींचकर 
तुम्हे वारिस मिले
तुमने मुझे पूतों वाली कहा। 

तुम्हारी गृहस्थी में जोता खुद को
तुम्हारे कर्ज़ स्वयं पर फ़र्ज़ किये
तुम्हारी गाड़ी को खींचने में दो नहीं 
तीन पहिये, मेरे खून पसीने के रहे
तुम उपकृत हुए
तुमने मुझे कमाऊ कहा। 

फिर एक दिन आधी उम्र ढलने पर
मैंने पंख देखे अपने, नुचे और फटे हुए
पैर देखे लहूलुहान और कमज़ोर
कोख देखी क्षत विक्षत 
छातियाँ देखीं ढांचे में बदली हुई।

तुम ने कहा इतना मत सोचो
देखो ये घर,ये बच्चे, ये जायदाद, ये ऐशो इशरत
और क्या चाहिए एक औरत को 
जीवन मे भला ! 

मैंने सोचा...
कि यह सब ही चाहिए था क्या मुझे ! 
यही सुख है क्या सबसे बड़ा! 
तब क्यों 
मेरी आलमारी में किताबे कम 
दवाएं,एक्सरे और अल्ट्रासाउंड फ़ोटोज़ अधिक हैं।

तब क्यों मन हमेशा डूबा रहता है! 
किसी से पूछ नहीं पाती
बस कभी कभार आवाज़ आती है
"तुम बहुत सोचने लगी हो, सोचना औरतों का काम नहीं है।"

मैं सोचती हूँ कि सोचना नहीं सोचना क्या अपने वश मे होता है! 

अब वे मुझे मनोरोगी कहते हैं। 


त्रास 

कौन दुःख के इन सदाबहार 
फूलों को खाद और पानी देता है !
मेरे भीतर एक क्षीण ध्वनि कराहती है 
"उसकी याद ही तो" ...

मेरे चित्त के अरण्य में किसके मौन का कोलाहल आखेट करता है!

किससे पूछूँ कि
जंगल मे रह-रह कर गिरते 
देवदारों के पत्तों का शोक 
मेरे मन मे क्यों झरता है ! 

लकदक फूले बुरांस का रक्त
मेरी आत्मा की कोरी चादर क्यों रँगता है! 

जबकि कोई नहीं है उस तरफ,
तब धार के सबसे ऊंचे बांज की
कोटरों से 
घुघूती के करुण कंठ में कौन बाँसता है !  

कौन बताए? 

कि मेरी खोई हुई हँसी,
दबी हुई सिसकी,
और कांपती हुई पुकार

उस तक नहीं पहुंचती 
तो आख़िर कहां जा कर टकराती है !

( दिल धड़कने और साँस चलने से बड़ा त्रास कोई नहीं। )


जोग बिजोग

प्रेम में इतना भर ही रुके रस्ता 
कि ज़रा लम्बी राह लेकर
सर झटक कर, निकला जा सके काम पर ।

मन टूटे तो टूटे, देह न टूटे
कि निपटाए जा सकें 
भीतर बाहर के सारे काम ।

इतनी भर जगे आंच
कि छाती में दबी अगन
चूल्हे में धधकती रहे 
उतरती रहें सौंधी रोटियां 
छुटकी की दाल भात की कटोरी खाली न रहे।

इतने भर ही बहें आँसू
कि लोग एकबार में ही यकीन कर लें 
आँख में तिनके के गिरने जैसे अटपटे झूठ का।

इतनी ही पीड़ाएं झोली में डालना ईश्वर!
कि बच्चे भूखे रहें, न पति अतृप्त!

सिरहाने कोई किताब रहे 
कोई पुकारे तो 
चेहरा ढकने की सहूलत रहे।

बस इतनी भर छूट दे प्रेम 
कि जोग बिजोग की बातें 
जीवन मे न उतर आएं।

गंगा बहती रहे
घर संसार चलता रहे। 


ओ मेरी मृत्यु

ओ मेरी मृत्यु !  
अभी स्थगित रख अपनी आमद ।

कि अभी मैंने देखा नहीं समंदर कोई
अभी किसी वर्षावन में भटकी नहीं 
आर्द्रता से भरा, खाली मन लेकर।

अभी किसी ऐसी यात्रा की सुखद स्मृति मेरे पास नहीं
कि जिसमे रेलगाड़ी में ही होती हों 
तीन सुबहें और दो रातें ।

अभी हुगली के रेतीले तट पर 
नहीं छोड़ी मैंने अपने थके हुए पैरों की भटकन।
अभी नौका में बैठाकर पार ले जाते 
किसी मल्लाह की करुण टेर ने मुझे बाँधा नहीं। 

अभी मेरे पास नहीं है दोस्तोवस्की का समूचा साहित्य
अभी मैंने किरोस्तामी को पूरा जाना नहीं।
अभी मजीदी की एक फ़िल्म
राह तकती है मेरी, फोन की गैलरी में चुपचाप।

अभी मेरा एक दोस्त जूझ रहा है हर साँस के लिए 
अभी उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां नही रखीं
उसे दिलासा नही दिया। 

अभी मेरी बेटी बच्ची ही है नन्ही सी
अभी मैंने उसे दोस्त नहीं किया
अभी पूछा भर है कि "प्यार में है क्या तू मेरी बच्ची"?
अभी अपने प्रेम के विषय मे बताने का साहस नहीं जुटाया ..

और तो और 
अभी उस पगले से भी है एक ही मुलाकात 
अधूरी और सकुचाई हुई
अभी उसने मेरा हाथ नहीं थामा 
अभी उसने मुझे चूमा नहीं। 


सहृदय बीमारियां

 वे कितनी सहृदय बीमारियां थीं
जिनमें कुशल क्षेम जानने, दुख दर्द पूछने
आते रहे दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार घर।

मरीज़ का हाथ अपने हाथ मे लेकर
देते रहे दिलासा "कुछ नहीं होगा तुम्हे " का 
सुझाते रहे कोई नुस्खा, व्यायाम या पथ्य 
बड़ी समझाइशों के साथ ।

आते समय लाते फल और जूस के डिब्बे
किताबे या कोई पुराने गीतों की कैसेट
उन्हें वापस करने की नसीहत भी कितनी 
मीठी और आत्मीय होती थी। 

दलिया खिचड़ी और मूंग की दाल से भरे
उन बर्तनों में कैसी दयावान सुगंध हुआ करती थी
और यह सदाशय इसरार भी कि बताओ
कल क्या खाओगे। 

कोरोना की इस बीमारी से जूझते हुए
आदमी बस उस आत्मीय स्पर्श को तरसता है 
जो अब सम्बन्धों से बिला गया है।

अकेले कमरे में लेटे हुए सोचता है कि 
बीमारियां तो पहले भी थीं
पर इतनी क्रूर कब थीं। 
आदमी और आदमी के बीच
इतना बेहिस फ़ासला कब था ! 


कोरोनाकाल की कविताएँ 
 
(१)

तुम बिस्तर पर हो
मैं कांटों पर
कोविड मरीज़ और तीमारदार 
सबकी साँस रोकता है। 

(२)

कहीं नहीं मिल रही सुविधाएं।
दवा इंजेक्शन और ऑक्सीजन ।
मरीज़ प्लाज़्मा देने के लिए 
जीवित ही नही बच रहे।
ऐसे में जब कुछ और नहीं सूझता 
मैं तुम्हारी टूटी हारी देह पर 
मलती हूँ अपने अश्रुओं की ऊष्मा 
और पढ़ती हूँ साँस की तस्बीह पर 
अपनी सबसे निर्दोष प्रार्थनाएँ बेआवाज़ ।

(३)

तुमने कहा कि तुम्हारी देह दुखती है बेतरह
तुम्हारा माथा जल रहा है 
रसोई से पानी लाने की हिम्मत नहीं हो रही। 
तुमने कहा कि दूध फल सब्जी सब खत्म होने वाला है
और कोई डिलीवरी देने वाला भी तैयार नहीं
ऐसे समय मे इधर मैं टेलीफोन पर 
सुनती हूँ चुपचाप एक असहाय कातर ध्वनि
ये तुम्हारा नहीं, मेरी आत्मा का विलाप है 

(४)

तुम कहते हो तुम अगर किसी रात मर गए तो
तुम्हे कौन ले जाएगा श्मशान
मैं सोचती हूँ कि तुम्हारे बाद
मुझे इस देह के श्मशान में कब तक जलना होगा। 


युक्ति

साँस के क्लान्त शंख पर 
निरन्तर बजती है
एक अनथक प्रार्थना ! 

एक उदासी नित 
बैठ जाती है
धड़कन के थके, म्लान फूल पर  

घनघोर यातना है यह जीवन
और प्रेम,उससे भी बड़ी ।

काश ! 
कि उसके प्रेम में 
गिरने जितना ही सरल होता!
उस निर्मोही को भूल पाना भी ।

मेरे ईश्वर ! 
कोई तो युक्ति होगी!
कि बिछोह की दुर्बोध भाषा में मर कर 
प्रेम की सरल बोली में तर सकूँ ....
जीवन में लौट सकूँ,
फिर प्यार कर सकूं ..


सपना भट्ट का जन्म 25 अक्टूबर को कश्मीर में हुआ।

शिक्षा-दीक्षा उत्तराखंड में सम्पन्न हुई। सपना अंग्रेजी और हिंदी विषय से परास्नातक हैं और वर्तमान में उत्तराखंड में ही शिक्षा विभाग में शिक्षिका पद पर कार्यरत हैं। 

साहित्य, संगीत और सिनेमा में गम्भीर रुचि । 
लंबे समय से विभिन्न ब्लॉग्स और पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।