मन की भोर

मन की भोर

नींद के लिए लड़ी हूँ, लड़ी हूँ नींद से भी,
प्रतीक्षा को दिया है खाद-पानी,
ये जानते हुए कि ऐसी कई उम्रें खपाकर भी,
जरूरी नही,
उससे कोई फूल खिले ही;

कितना अकेला रहा यह जीवन,
फिर भी खदेड़ती ही रही अकेलापन,
नहीं स्वीकार सका यह मन,
कि यही रही होगी मेरी नियति,

मैंने ये विश्वास कभी नहीं खोया,
कि कभी नहीं सोएगा दुर्भाग्य,
नहीं हो सकेगी मन की भोर।


प्रेम के लौटने पर

देह और मन में इतनी टूटन रही,
कि दोनों की पीर मिलाकर,
 बटी जा सकती थी एक रस्सी,
और चढ़ा जा सकता था उससे फाँसी;

पर मैंने उसे ठीक वैसे रोपा इस तन में,
जैसे रोपे जाते हैं खेतों में धान;

फूलों की सुगंध से भरता है संसार,
जैसे चैत में हर बरस नीम के फूलों से भर जाती है वसुधा,
जैसे वासना के ज्‍वर से देह की नस-नस फड़कती है,
और फागुन में जगता है कौमार्य;

भादों में जैसे मेह बरसता है,
और स्पर्शों की धुंध से भरते हैं स्मृति के कोटर,
जैसे स्पर्श का स्वाद,
देह पर चढ़ता-उतरता है अनजाने ही;

और प्रेम के लौट आने पर,
जीवन की लय पर मलंग हो झूमती है आत्मा।


स्मृति और विस्मृति

स्मृति में कितनी बैलगाड़ियाँँ दर्ज है अब तक,
कानों में गूँजती उनकी चरर-मरर,
वे कच्चे रास्ते, ढाक और कांस के वन,
बैलों की घंटियाँ, उनकी पदचापें,
इस जीवन में..
चिता के साथ ही हो सकेंगी राख;

कितना ही पीड़ाओं, चीत्कारों से भरा रहा संसार,
 कि वह सब किसी मधुर स्मृति-सा आप ही,
संजोए रहा मन,
यह भी तो निरा आश्चर्य!

कितनी होती थी कभी बाजरे की बालियाँ,
भिंडी के खेत, सोया के पात,
बेरियों से टपकता शीत, मकड़ी के जालें,
दांत कड़कड़ाती ठंड में भी बहकता था सरसों,
हवा के वेग हिलते थे पीपल के गुलाबी पात,
बाल्टी में गिरती दूध की धार से उफनता था झाग
और साँँझ-सवेरे चकटती थी आग,

और वह ना जाने कौन रूत रही होगी,
जो अब स्मृति और विस्मृति के बीच कहीं जा धँसी है,
जिसमें तिल की सूखी फलियों में भर जाते थे तिल,
और कान के पास हिलाने पर कान में बजते थे
जिन्हें मैं मुँह में तम्बाकू की तरह रखा करती थी,
मुट्ठी में भरने पर हाथ में चुभते थे धान के तींकुर,
और नथुनों में भरती थी पाथर के पीछे लगी,
कृष्णकली की गंध..

और वे सिक्के जो नानी दिया करती थीं,
वे सिक्के ढूँँढता ही रहा है मन,
जो अब कहीं नहीं दीखते,
कहीं नहीं चलते;

मगर गढ़े होंगे किसी जमीन के किन्हीं हिस्सों में,
किन्हीं सहस्त्राब्दियों बाद जो बतायेंगे,
कभी हमारा भी इतिहास,

कितनी तो यात्राएँ रही, कितने रहे अंधकार, 
कितने जंगली जीव देखे, जो अब कहीं नहीं दिखते,
इसी जीवन में कितने ही मानुख दीखे,
असल में जो सब कुछ हुए,
बस एक वही ना हुए।


तुम्हारी गंध

शिराओं में दौड़ती ये बेचैनी क्या है,
ये भावनाओं का लहराता समंदर,
कलेजे से उठता हुआ ये ज्वार-भाटा,
क्यों उस चाँद को मचलता रहा मन

वहां तक पहुँचने की राह,
कितनी तो दुरूह कैसी तो दुर्गम,
फिर भी चला है वहीं,
बार-बार भटका है,

फिरता है उसी वन में,
जहां जमीन को बामुश्किल छूती है धूप,
वहीं जहां इस काया को खो जाना है एक रोज,

फिरना है उसी वन में जहां लहराता है पतझड़,
जहां नदी कल-कल करती है,
और पुकारती है..
ठीक मेरी ही तरह तुमको,

जहां हर बूटा अपनी एक कहानी कहता है,
जहां पत्ते फूलों के मानिंद झड़ते है,
और जहां की गंध तुम्हारी गंध को चीन्हती हैं।


अस्तित्व की पुकार

आकर्षण को प्रेम मत कहो,
मत कहो वासना को प्रेम,
प्रेम कहो तब ही,
जब कोई तुम्हारे अस्तित्व की पुकार हो,

जब तक ना उठे हृदय में वह पीर,
वह हूक जब तक तुम्हारे वजूद का हिस्सा ना हो,
मत पुकारो
कि स्त्री और प्रेम से ज़्यादा कवचहीन,
संसार में कोई दूसरा कौन हुआ?

वह वध्य नहीं है,
पर जब चाहे तब किया जा सकता है उनका वध,
छल से, कपट से, झूठ-फरेब से, उम्मीद से, इतंजार से,
उस तमाम हथियारों से,
जिनका इस्तेमाल उन्हें कभी नहीं आया,

कोई आवरण ही नहीं बना,
जो कर सका हो उनकी रक्षा,
बन सका हो उनकी ढाल,

उनको बस एक सत्य ही बचाए रहा,
वह भी बस उतना कि बना रहे उनका होना,
ताकि बार बार किया जा सके उनका वध।


वियोगिनी ठाकुर एक युवा कवयित्री व कहानीकार हैं जो बदायूँ (उत्तर प्रदेश) की रहने वाली हैं। यह एक सुन्दर पाठिका भी हैं जो इनकी लेखनी को और परिमार्जित करता है। इनकी कविताएँ आप सदानीरा वेबपोर्टल पर भी पढ़ सकते हैं और गद्य 'एक पुरुष की देह लेकर' हिन्दवी पर भी प्रकाशित हैं। 

जल्द ही इनकी पहली पुस्तक 'दूसरा प्यार' हम सब के बीच होगी।