दखल

दख़ल

रात हुई भी क्यों?

जब उसका होना था
माँ के गर्भाशय में लौटना  
रोज़

प्रसूति की पीड़ा का आदिम सुख, 
क्यों नहीं फिर दिन की 
मेरी सुबह!

टाल-मटोल का सूरज
पहली कड़वी बीड़ी सी
जैसे किसी
अखबारनवीस की चाय में
गूड-डे बिस्किट की तरह भरभरा गईं
नगर भर की खबरें...


तीस का एक

इतने सारे लाल झंडे
इतने सारे महान दख़ल

सब अच्छे मनुष्य हैं
में चुनना
सबसे श्रेष्ठतम 

और तुम 
इस कैंपस में
टोनी दा के साथ
अक़्सर पाई जाती थी

अपने एक हरे पुड़िए के बल पर
जिन्होंने ज़िंदा रखा था
अलग-अलग भाषाओं में
भिन्न  दिमाग़ों के भीतर
क्रांतिकारी भविष्य की
एकरूपता


ईर्ष्या

पहले मुझे उस कवि से 
ईर्ष्या होती है

फ़िर यक़ीन पुख़्ता होता है
कि मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ

तुम्हें छोड़ जाता हूँ 
रोज़ उसके भव्य अन्तःस्थल के पास

किसी पराए उत्स
की गहराई में 
गिरती हुई तुम,

कितनी सम्मोहक दिखती हो!

हमेशा चूमकर
देती हो विदा .


मृत व्यक्ति

आज सुबह-सुबह
मैं छत से कूद गया

लटकाने लगा
पेड़ पर 
फंदे अनायास

तुमने देखा कल शाम मुझे
खरीदते
सायनाइड की गोलियां

रेल-गाड़ी की प्रतीक्षा में 
निर्जन किसी सिक्के की तरह
लेट गया हूँ
पटरियों पर

कुछ भी नहीं शेष रख पाता
अनीश्वरवाद के इस
आक्रांत ऊब के भीतर

रोज तुम्हारे बारे में सोचने के बाद
सोचता हूँ
अपने मृत के विषय में;

कविताएँ मुझमें बचाए रखती हैं
एक कायर तटस्थ भाव ::

न ही  छूटती हैं देह से कभी विकलताएं
न ही छोड़ पाता हूँ पूरी देह...

मृत व्यक्ति
मेरी विचारधारा वाला कवि नहीं है।


विराग

साथियों के दुःख 
मेरे दुःख से
इतने खाते हैं मेल

कि लगता है उन सबने किया था
तुमसे ही प्रेम

तुमने ही उन सबको 
धोखा दिया था!


दो रंग

अब वे उच्चाटन
सफ़ेद प्रतीकों में लिपटे
कविता के अंधेरे में
धंसे जा रहे हैं

इतना अधिक सफ़ेद तो
शोक का रंग है

मेरा इतना अधिक दुःख 
डाल देता है
मुझे ही विस्मय में

सैकड़ों साल पुराना यह संगमरमर का फ़र्श ::
 एक प्रतिध्वनि गुंजती है 
 लगभग रोज़

"मुर्दों के रगड़े जाने की"

युद्ध की चोट में 
घायल किसान के बच्चे
का पहले फूटता है सिर
फिर घिसते हैं धब्बे,
इस दृश्य के आर-पार

स्मृति का रंग प्रायः
काला और सफ़ेद होता है

मक़बूल की आख़िरी सीन;
खून का प्रतिबिंब काला


मंगलेश डबराल के लिए

घर के सामने की मृत्यु घर की मृत्यु लगती हैं 
घर का अपना बूढ़ा मर जाए तो
दुःख कम होने की तरह 
हमें होता है कम दुःख
घर के सामने की मृत्यु पर

मृत्यु में झांट भर का आकर्षण भी नहीं बचा
फिर भी
दुबक जाता है पूरा मोहल्ला 
देता है अंतिम शांत विदा
अपने कम-कम दुःख से

एक अजन्मे को जैसे खो दिया था
पिछले वर्ष
तब से अपनी लंबी रूलाई के भीतर ज़ब्त हूँ 

ख़ुद को
और सरकार को 
नहीं माफ़ कर सकता
जीवन-पर्यंत


 ◆ अतियथार्थ

सबसे पहले, आकाश में दिखे, 

अविराम  
हिलते हुए दो सफ़ेद पंख

तो 
एक आंख ने, 
दूसरी आंख की निंदा की.

दिमाग बन गया, फिर टिन का एक छत
जहाँ स्मृतियों बरसाती रहीं
रात भर बर्फ़ गोले

रात भर सोया कल
किसी और के सपने

एक बूढ़ा लगभग मृत घोड़ा
हिनानाता हुआ दौड़ गया, 
आर-पार इस
रेशम की दृष्टि के

कविता नहीं महसूस पाना तब,
दुख
मेरा शब्द के 
तिनके के
 प्रकाश के भीतर

क्षण में जीते हुए क्षण से मुक्त हो जाना
सीलिंग की तरफ़ देखते हुए भी
सीलिंग को नहीं देखना.


इस जल प्रलय में

यहां कुछ भी झूठ-मुट का 
नहीं होता

जब मैं कहता हूँ :
मुझे तुम्हारी अभी-अभी आई
बरबस  याद..

तो यक़ीन करो
सच में आती है तुम्हारी बरबस 
याद...

बादलों की फूली थैलियां
भर देती हैं मुझे
कृतघ्नता से

रात का सबसे तन्हा फूल
आत्मा पर चुभता है
कांटे की तरह

और यह खिड़की की ठंडी सलाखें
धंसती हैं भीतर 
छाती के आर-पार

चाँद का दुःख 
एक सफ़ेद बीमार कुत्ते का दुःख है
जो लहराता है अपना प्रतिबिंब
भीगी पुतलियों पर

एक मादा चिड़िया
घोंसले के बिखर जाने के बाद 
अपनी पीढ़ी तलाश रही हैं

चंडीगढ़ तक जाने वाली आख़िरी ट्रेन
फिर से छूट गई हुज़ूर,

रोटी के लिए ख़ुद को भीख मांगता
कहते देख--
पसीजने लगा सहरसा का मजूर

समय की
उत्सताओं में दबकर
साहस का हर एक तिनका
कांच की तरह
बिखर पड़ता है

कविता की यह
कैसी दुर्लभ जड़ता है?

मेरा ही फ़र्श मेरी ही एड़ियों को गड़ता है.


तनुज वर्तमान में विश्वभारती विश्व-विद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक कर रहे हैं।इनसे tanujkumar5399@gmail.com पर सम्पर्क साधा जा सकता है।