लड़कियाँ

लड़कियां

लड़कियों को अब चलना होगा,
अपने पांवों को दाबकर ।
जिससे बन सकें छाप,
उसके बढ़ते हर कदम पर ।

वही छाप रोपकर उगाना होगा
अपने पंख ।
हवा का रूख पहचानकर
उड़ना होगा उन्हें
उस तरफ ।

हवाओं के जोर से
अगर टूट जाये पंख ,
पंख बगैर उड़ना होगा
असीम आसमान में ।

सभी झंझावातों को लांघकर
आग की तपिश को झेलकर
नदी समंदर सबमें तैरकर।
विलीन ना होकर
मौजूद होना होगा
अपने पूरे वजूद के साथ।


शह - ज़ोर

वह लड़की लंगड़ाती चलती,
उचक-उचक  कर कदम बढ़ाती ।
बिना सहारे आगे बढ़ती,
छोटे कदमों से मीलों नाप देती।

ना आया बन कोई इमदाद
हर कूचे से वह निकली
ऐसी हालत में शिकस्ता ना हुई।

खुर्शीद भी यह देखकर नतमस्तक था
उसके तलवों में आबला देख रो पड़ा था।
काम ना आई तदबीर ...
अब तो मोजिज़ा ही हो सकती थी।

बारह साल की इस लड़की की क्या तक्सीर थी
यही कि वह गरीब घर में जन्मी बेटी थी।

सब देख सुन वह शोरीदा थी
शह - ज़ोर घर पहुँच ही गई।


बारिश
 
(१)

भीगी हैं आंखें
आंसुओं से हर बार।
भींगा जाना
बारिश के बूदों से इस बार।

इस सावन
फौज की छुट्टियों में
साजन।
छुट्टियाँ  लेकर एक - दो दिनों की
तुम आना
जरुर आना
इस बरस घर - आंगन ।

(२)

तितलियां बारिश मांगती हैं
अबकी बरस ।
चाहती हैं कि खिलें
फूलों की बगियाँ ।
नाच सकें वे
पंख फैलाकर,
फूलों की पंखुड़ियों को
अपना पंख बनाकर ।


◆ चाहती हूं प्रेम में

तुम्हें स्वप्न मिले उनमें अच्छी नींद
तुम्हें उन तमाम प्रश्नों के उत्तर मिले
जिसे तुम खोजते रहे हो।
मंजिल मिलें उन रास्तों पर चलते हुए
जहां चलना दुरह और असंभव था।
मैंने तुम्हें प्रेम किया है
और मैं चाहती हूं
तुम्हें वो सब मिले जो मांगनी ना पड़े।


नींद

रात तुम्हें अच्छी नींद आई
मैं रात जगी रह गई
मैंने अपनी नींद भी
तुम्हें सौंपी थी
तुम्हें उन नींदों को पाकर मिला
वो सब कुछ जो तुम चाहते थे
और मिला मुझे
अंतर का तरलायित सुकून


हाथों में डोर, लेके पतंग 

आज देखा इक़ सपना
कुछ बच्चे उड़ा रहे पतंग
खींच रहे पतंग की डोर
थोड़ी छूट, थोड़ी उड़
थोड़ी ढील, थोड़ी पकड़
महीन डोर ले जाते दूर
उड़ा रहे पतंग को दूर से दूर ।

चाहते हैं बच्चे
खूब दूर उड़े उसकी पतंग
आंखों में ठहरी बैठी
जिज्ञासा की चमक
चमकती आंखें
चहकते चेहरे
मुस्कुराते होंठ
पकड़े डोर
वो दूर उड़ जाएं उसके संग
पहुंचे आसमान में,
खेलें बादल तारों संग ।

मासूम आंखों में सौ-सौ सवाल उपजें
गई है वहां हमारी पतंग
बैठे बातें करे सबके संग
रहते हैं वहां कैसे लोग
पतंग नहाने गया होगा जहां
बारिश रहती होगी वहां
यह बाते सोचते
उसके होंठ पर ठिठकी हंसी
खिलखिला उठी ।

आसमान है और कितना ऊंचा
और कितनी दूर ले जाना होगा
अचम्भा हो ऊपर देखते
ढूंढ़ती नज़रें ऊपर रहता है कौन
कोई तो पकड़े मेरी पतंग
अटकी नहीं, किसी ने पकड़ी नहीं।

दिखीं नहीं अब तक इंद्रधनुषी रंग
कोई नहीं दिखता ऊपर बैठा बादल संग
जो जल्दी पकड़े मेरी पतंग।
हवा ख़ूब तेज़ चल रही
नीचे जाने को झकझोर रही
फट जायेगी पतंग
अब ना जाने दूं
खींच लाऊं
पतंग की डोर ।

जैसे पतंग आई नीचे
मैंनें आंखें खोली आंखें मींचे
मैं रह गया यह देख सोचता
आजकल ये सभी गुम सी है ज़मानें में
कहां वक्त बिताते बच्चे पतंग उड़ानें में

मोबाइल की दुनिया में बच्चे हैं मशरूफ़
उन्हें अब कहां पता ये बात
पतंग जाती है और कितनी दूर
यक़ीनन वह सुबह आएगी
बच्चे जब उड़ा रहे होंगे
हाथों में डोर, लेके पतंग


बूढ़ी काकी  

चढ़ते सूरज को देख,
बूढ़ी काकी समय का अनुमान लगाती है।
अपनी हथेलियों पर
उभर आई नसों, सिकुड़े चमड़े के
सूखेपन की झांकती हड्डियां लटके देख
ना जाने क्या कुछ बुदबुदाती है।

सरसों तेल में लहसुन पका
पीले, उजले, काले
गिनती करती हैं।
हाँ! दस कलियाँ हैं।
मालिश देह की मरोड़
तेल सूखता पेहम होता
सूखी चमड़ी में जान आ जाती
चम-चम चमकता।

हड्डियां अब मौसम के थपेड़ों से,
जूझने को तैयार है।
खुरदरे नाखून के कड़ेपन को
ब्लेड से काटने की मशक्कत करती है
आलता से सफेद को लाल बनातीं है ।

काका के आने का  वक़्त हो चला
तांबे के बासन में,
दुवार पर एक लोटा जल ढ़क
दीरखा पर रखती हैं।
छोटी शीशी किरासन लगी कपड़े की बाती
ढ़िबरी पर रख देती है।

जम्हुआए  दर्पण में,
मुख को निहारती
उग आई रेखाओं के
सिकुड़न को गौर से देखती
खाली आंखों की सफेद जमीन पर
अपनी तस्वीरें खींच
कल्पना लोक में विचरती है।

अफ़ग़ान असनो पाउडर
चेहरे पर रगड़कर
झड़े हुए बालों का मांग काढ़
सफेद चुटिया बनाती है।
बालों के बीच की
कंघी से पतली धार बना
सिंदूर भरती है।
भारी आवाज़ में
गीत गाती गुनगुनाती
गीत में गालियाँ
दे - देकर खुद आप पर हंसती हैं।
गालियों में चुनिंदा नामों के नाम पर
गालियों वाले गीत में सबको
याद करते काकी की सजल आंखें होती हैं।

बीड़ी को काठी से जलाती
फूंक मार, बुझा, अपनी लाठी में घिस
आंचल के कोने में आधी बची को
बांध लेने का सुख वो ही जानती है।

काका को आता देखकर
खटिया बिछाती है दुवार पर,
वहाँ बंधीं गायें खूंटे में
पदचाप सुन गर्दन को आड़ी - तिरछी
ऊपर नीचे डुलाती रंभाती है।
खूंटे को डिगाती, काका के पास
आना चाहती है।

नाद में चारा डालते काका
उसके दोनों पेरों को रस्सी बांधते
जल से छुआते, थन खींचते दूध दूहते
यत्न करती गायें...
कल की अपेक्षा
आज ज्यादा सफेदी देंगी।

काका थमाते है आजी के
एक हाथों में बाल्टी
दूसरी में पान सुपारी।
दोनों हथेलियों को दबा
घीसते उनके बीच तंबाकू ।
कबूतरों का झूंड
लौट चुका है अपने
रोशनदान में गाते हुए राग।

झूकी कमर, लड़खड़ाते क़दम
थायरॉयड से ग्रसित
काकी चबाती है पान
काका चुटकी से खैनी को मसूड़ों में दाब
टिमटिमाते नज़रों से,
काकी को निहारते हैं।
देखते हैं पान से रंग चुड़ाती काकी को
ओठलाली करती काकी को छेड़ते हैं।
एक-दूसरे के चेहरे पर  मुस्कान देख
दोनों एक-दूसरे के समीप आते हैं।
गुज़रे हुए ज़माने के लम्हें
याद कर खिल-खिलाते हैं।


गाँव की सोधीं महक  

मेरे पास थे बासमती,अरवा
ब्राउन चावल उपलब्ध
लेकिन मैंने पकाया तसले में
उष्णा चावल का भात।

मेरे पास थे रहड़, मसूड़, मूंग, राजमा, उपलब्ध
मैंने पकाया रसोई में चने की दाल।
मेरे पास थे शीशे, फाइबर, स्टील, फुलवा थाली
भरे पड़े थे सभी तरह के बर्तन।
पर मैंने पकाया पकवान,परोसा केलों के पत्तों पर।

मेरे पास थे रेडिमेड खाने की वस्तुएँ,
महंगे समान उपलब्ध
फिर भी मैंने कड़वे तेल में,
झांस देने वाली सनसनाहट में
छाना चक्का, प्याजुवा, बजका,मिर्ची, भिंडी,
परवल, कद्दू, बैंगन, आलू के पकौड़े
साथ में चरोड़ी...
उसके पास समय नहीं था
मैंने , सैकेंड - मिनटों की दूरी में,
उसे प्रेम का भेंट दिया।

वह शहर लौटना चाहता था
अगली फ़्लाइट से, इस शहर से।
जिस शहर में कुछ देर पहले ही उसने
कदम रखा था।

मैं खिला देना चाहती थीं उसे सबकुछ
जो वह कस्तूरी मृग की
भांति ढूँढ़ता - फिरता था...
जिसका स्वाद वह अपने गाँव में छोड़कर,
जा चुका था  कई साल पहले शहर
उच्च पढ़ाई और नौकरी की तलाश में।

वह किसान परिवार का, किसान बेटा था
इसलिए मैंने सारे पकवानों की महक में
उसे उसका गाँव लौटाना चाहा।


आजी के किस्से 

आजी की आंखों में
किस्सों वृत्तांतों की लहलहाती फ़सल
कब उनके चेहरे को, हरी कर जाती
इस बात से वह खुद भी अनभिज्ञ थीं ।

उनकी जुंबा पर उग़ आते
दर्जनों किस्सों के बीज
आंचल हरियाली लिये
सिर माथे नज़र आते
उजले बालों पर दूब से फैल जाते।

सबसे कोमल होती उनकी आवाज़
रूह के ज़ज़्बात कंठ में,
रंगों से उतरते,फूलों की पंखुड़ियों सी।
जब भी सुनाती किस्सें
कितनी ही निकल पड़ती पंखुड़ियाँ
अपने नयी किस्सों - कहानियों के साथ।


गण 

बस, इतना भर कह देने से कि
मैं राक्षस गण से हूँ, तुम देवता गण से
तो तुम देवता। मैं राक्षस।

देवताओं से गलतियां
नहीं होती क्या   ?
सभी गलतियां राक्षसों पर
मढ़ दी जायेंगी।

तुम अपनी गलतियां
देवता भर होने से
नहीं दिखला सकते।

माना कि, तुम्हारी गलतियां
किसी और को नहीं दिखती
इतना कहना है मेरा
बेशक नहीं दिखती,
तुम्हें तो दिखती है
अपनी खामियां, अपनी कमियाँ।


डर 

जब  आप  किसी  अपने को
खोने से डरते हैं
भय आपको खाता है,
खामोशी आकर चुपके - से
होठों को सील जाती है
गूंगा बनना आपके लिए
उस वक़्त बेहतर होता है।

जब आप किसी अपने को
खोने से डरते हैं
आप सवाल करना बंद कर देते हैं
खुद ही जवाब ढूँढ़ते
चक्रव्यूह भेदते है,
हल होता कि आप कुछ सुनें ना
अपने को बहरा बना लें।

जब आप किसी अपने को खोने से डरते हैं
आप देखकर भी
अनजान बने रहते हैं
तिरछी नज़रों से सबकुछ
दिखने के बावजूद
नज़रों को धोखा होने का भम्र पालते हैं।

जब आप किसी को खोने से डरते हैं
मन की बातें मन में ही जगह पाती है
मन कुछ कहता है, जबान कुछ और
मन को बांधने की कला में
हमें महारथ हासिल होती है।

जब आप किसी को खोने से डरते हैं
आप दिल की बातों में आ जाते है ।
हमेशा 'दिल की सुनों'  ' दिल की करो'
राग अलापते हैं ।

एक समय ऐसा भी आता है।
आप दिल की जगह,
दिमाग़ की सुनते हो ।
दिमाग़ की ख़ाली दराज़ो में
दिल को छुपा,
हर बात को दिल से लगाते हो।
तब आप सबकुछ खो देते हो।


क्या हम आजाद हैं 

अगर मैं ज़ोर - ज़ोर
चिल्ला - चिल्ला
गला फाड़ रोती,
अगर मैं, ज़ोर- ज़ोर
ठहाके लगाकर हंसती ।

अगर मैं ज़ोर- ज़ोर
आवाज़ ऊँची कर
कुछ बोल पातीं
अग़र मैं तेज़- तेज़ कदमों से
अकेली राहों में
सुरक्षित चल पाती।

अग़र मैं तेज़ - तेज़
दौड़ लगा सरपट घर लौट आती
अगर मैं तेज़ - तेज़
धड़कती धड़कनों को
उस समय रोक पाती।

गुमटियों पर कश खींचते लोगों,
काॅलेज के गेट पर खड़े
' यूथ ' की घूरती निगाहों से
उस समय मैं किसी आशंका
बेचैनी, सवालों के समंदर से निकल पाती ।

और फिर सारी बातों को दरकिनार रख
उन आलू की फांकों जैसी आंखों  को
तश्तरी में सज़ाती
ऐसा करने के लिए
क्या हम आज़ाद हैं ?

यह पूछने
अगर मैं लगा पाती नारा
जब तक सांस
गले से चीख़ निकलने भर
हाय - हाय! मुर्दाबाद!

और अंत में,
ज़ोर- ज़ोर, तेज़- तेज़
हाय-हाय करते, चलते,
घिसटते, रंगियाते, सरकते
चलती जोंक की तरह
वही ज़मीन, वही नमीं
धरती को कुरेदती
अपने से पूछती
और फिर,
हथौड़े से कर रही होती
आॅडर... आॅडर....
चोट पर चोट से
निकलती मर्मभेदी आवाज़

चींख़ती और जा पहुँचती
उसी स्त्री के पास
जो खड़ी है आंखों पर
काली पट्टी बाँधे ।
हाथों में तराजू लटकाये
स्लोगन चिपकाएं
क़ानून अंधा होता है।


मन्नतें 

मैं खोजती हूँ, मन्नत का वो धागा
जो कभी पहले बांध आई तुम्हारे नाम

वो धागा तो ना मिला,
पर तुम दिखे सामने से
जो माँगा था उन मन्नतों में...!

मेरी पलकों के छतनार पर बंधीं हैं
अब भी वे मन्नतें उलझी उलझी सी ।

उसकी गिरह इतनी गहरी हो चुकी है कि
शायद मेरे वजूद के साथ ही मिटेंगे।


तुम्हारी शिकायतें  

मेरे अश्कों में लिपटी
तुम्हारी शिकायतों का ढ़ेर
अब भी मेरे सिरहाने मौजूद है
कपास के भीतर का
वह जिंदा द्रव
अब तक सूखा नहीं है
उसकी छाप गिलाफ़ के साथ
उनिंदे चेहरे पर दिखती है।
तुम्हारी शिकायतें,
शब्दों को बे-अर्थ कर देती है
जब मैं उन्हीं शब्दों को ख़ामोश रहकर
तुम्हें ही सौंप देतीं हूँ।


बीज  
         
मेरी आजादी को  तुमनें
मुठ्ठी में क़ैद किया
पुरूष का अंहकार, स्वामित्व,
अपना वर्चस्व सबकुछ
अजमाया  तुमने मुझपर ।

मैंने तुम्हें अपना सर्वस्व सौंपा
दे दी अपनी आजादी भी
कर लिया तुम  ने मुझे
अपनी मुठ्ठी में क़ैद।
मेरे होंठ सिले,उसके अंदर
जीभ छटपटाती, तड़पती, खीझती 
और फिर हाड़कर
अंदर-अंदर ही घुटकर सह जाती....

अचानक !
मुठ्ठियों के अंदर से
आती रोशनी की
पतली - पतली दूधिया किरणें
लाल दीप्तिमान रोशनी
आख़िर अपनी आजादी का
रास्ता.... मैंने पा लिया।

मैं तो अपने आप से
हारी - थकी - सूखी
फैंकी हुई बीज थी तुम्हारी
कुलमुलाहायी, अंशकित मन,
अंजान डर से भयभीत
अकेलेपन की मार   से
त्रस्त बेजान पड़ी।

मुठ्ठी में लाल दीप्तिमान रोशनी
ऊष्मीय गर्माहट
मुझे बार-बार झकझोर रही थी
उठ खड़ी हो
बेजान नहीं 
तुम हारी नहीं...

अपनी विजय  खुद करो
अपनी मंजिल खुद ढूंढ़ो
अपनी लड़ाई खुद लड़ो
अपने हक़ की बात कहो

अपने हक़ और अधिकारों के लिये
तुम्हें  खुद लड़ना होगा
इस मरे हुए समाज,
मरी हुई इंसानियत के बीच ।

ललकारा था उसने नारी शक्ति को
और आत्मविश्वास की लहर ऐसी दौड़ी,
मैं बेजान उठ खड़ी हुई।
बाकी था मुझमें जीवन
उम्मीद की किरण
अपने पर विश्वास
साहस का कदम
भरोसा अपने बीज होने पर
निकल पड़ी खुद के 
वजूद की खोज में
पूरी शक्ति के साथ ।

नयी जिंदगी की तरह
कांपती हुई उम्मीद की तरह
और फिर लहलहा उठी
फसलों की तरह।



नाम - एकता प्रकाश
शिक्षा - स्नातकोत्तर हिन्दी साहित्य पटना विश्वविद्यालय से
प्रकाशन - मुख्य धारा की पत्र-पत्रिकाओं में कविता एवं आलेख प्रकाशित
संप्रति - गृहणी