◆ मैं बचा लूंगा एक दिन
"सुनो लड़की !
मैं नहीं लिखूंगा कविताएँ तुम्हारे सौंदर्य पर
नहीं गढूंगा तमाम अलंकृत उपमाएं तुम्हारी काम्यता पर
मोहक शब्दों का जाल हरगिज़ नही बुनूँगा !
ये सब ले जाएंगे तुम्हें आत्ममुग्धता की ओर...
मैं लिखूंगा अपनी कविताओं में
थेरीगाथा की थेरियों की कहानी ।
ठीक तुम्हारी ही बोली में लिखूँगा ;
अनामिका , कमला प्रसाद और देवेन्द्र इस्सर को
करूँगा अनुवाद ठीक तुम्हारी ही भाषा में
सिमोन , सिल्विया और वर्जीनिया वुल्फ़ का
सुनो फिर पढ़ना तुम इन्हें
तब तुम देखोगी अपने अंदर बुद्ध को बनते हुए
क्योंकि बुद्ध बोध का पर्याय है !
और इस तरह मैं बचा लूंगा एक दिन
तुम्हारे भीतर के मरते 'स्व' को ।"
◆ विरही मैं
"सुनो स्त्री !
आँसू नहीं बहने चाहिए , बिल्कुल भी नहीं
रोक लो उन्हें बहने से !
वो बहा ले जायेंगे अपने साथ
तुम्हारे अपार दुःख और अगाध पीड़ाएँ
मत जाने दो अपने मन से पीड़ाएँ और क्षोभ
रहने दो उन्हें अपने भीतर ताकि ;
आते रहे मन में विक्षोभ
और धधकता रहे विद्रोह का ज्वालामुखी
ये मन की पीड़ाएँ , ये विक्षोभ , ये विद्रोह
ये ही पहुँचायेगे तुम्हें तुम्हारे सर्वोच्च 'स्वयं' तक !"
◆ तब जीवित हो जाएंगी मेरी कविताएँ
"स्त्री चेतना पर लिखी मेरी कविताएँ
जो खूब छपी और ट्रेंड हुई
जिनके लिए माने मैंने अशेष आभार
अब दबी पड़ी है किताबों में
सब धरी की धरी रह गई जब मैंने देखा
मुक्ति की सुलगती शामों में
जिम्मेदारी की फूंकनी से परम्परा का चूल्हा फूंकती औरत को
वेदना के उड़ते धुएँ में, अधूरी इच्छाओं से मिचमिचाती आंखों को
तब , मर गई मेरी कविताएँ !
अब मैं प्रतीक्षा में हूँ कि
जब चूल्हा बन जायेगा सूरज ;
जो अन्तर्मन के आकाश में लाएगा
एक सार्थक जीवन की भोर
बस तभी सफल होगी मेरी कलम
और जीवित हो जाएंगी मेरी कविताएँ !"
◆ गांव की लड़कियाँ
" किसी शांत सदानीरा सी
सौम्यता और झिझक से सटे मन के किनारे
ये जानती है नदी की अमावस और पूनम
बस नही जानती , तो अपने मन के समंदर की अमावस और पूनम ;
जिसमें आता है विचार का ज्वार ,
गुस्से और विद्रोह की लहर के साथ द्वंद का तूफ़ान
और आती है दिशाहीन लक्ष्यों की आंधी
किन्तु , कोई ज्वार इनके मन को झंझोड़ नहीं पाता
क्योंकि मन को घेरे है क्वार के चुप्पी के बदरा
अन्ततः बचती है शांति और मन के किनारों पर पड़ा कचरा ,
जो फिर किसी ज्वार के इंतज़ार में है
और अधिक विध्वंसक होने की आस में कि ;
अब तो बरस जाए चुप्पी के बदरा ! "
◆ प्रेम
"जानते हो ...
मेरी कविताओं में तुम्हारे प्रेम के मायने क्या है ?
शायद, मैं ये तुम्हें कभी न बता पाऊँ
इसका उत्तर ठीक वैसा ही है ,
जैसे वसुधा और व्योम के बीच बनता क्षितिज ,
जैसे बसंत में बजते हिंडोल
जैसे जेठ में खेजड़ी की ठंडी छांव
और ठीक वैसे ही जैसे ;
लंबी बरसात के बाद निकली मीठी धूप !
सुनो
अब मैं तुमसे उत्तरापेक्षी नहीं हूं
क्योंकि मैं तुम्हें अब महसूस करती हूँ ,
अपनी कविताओं में
सावन में बरसते मेघ की तरह !"
◆ ईश्वर ने रोपे है शब्द ...
"सुन्न हो जाएगी मेरी कलम
नहीं लिख पाएगी तुच्छ शब्द प्रेम पर
जब कोई यूँ ही कहेगा !
कैसे लिख दूं अनगढ़ शब्द प्रेम पर
ये जानते हुए कि ईश्वर ने मेरे भीतर शब्दों को रोपा है
और तुम्हें भेजा है शब्दों की सींचने के लिए
शब्द अंकुरित होंगे तुम्हारे समर्पण से
मेरे और शब्दों के प्रेम की उपज होंगी कविताएं
सदाबहार कविताएं !
जिनमें लिखा जाएगा हमारा प्रेम .. आत्मिक प्रेम ;
जो होगा किसी भी बसंत और सावन से परे
हमारी कविताओं की तरह ..
सदाबहार ! "
◆ क्षणिकाएं :
1.
विदा का अर्थ सदैव अंतिम विदा नहीं होता
और अंतिम विदा का अर्थ
'कभी लौटकर न आना' भी नहीं होता ।
2.
विदा में बहाये गए अश्रु
सदैव अंतिम विदा का सूचक नहीं होते
वे सूचक होते है , अक्सर
अगले मिलन की निश्चितता का ।
3.
विदा , कभी अंतिम विदा नहीं होती
विदा सदैव अगले मिलन का संकेत है
कभी प्रेमी से , कभी कविताओं से
कभी पुरानी डाइरी से ।
5.
दो प्रेमियों के प्रेम को जीते हुए देखना
अपने प्रेम को जीने जैसा है ।
6.
विरह की थाप ज़रूरी है
कविताओं में राग के लिए ।
आराधना गुर्जर मध्यप्रदेश से हैं और अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की अध्येता हैं। अंग्रेजी पढ़ते वक्त हिंदी "प्रथम प्रेम" की तरह महसूस हुआ कारणवश कविताएं पढ़ने की शुरुआत हुई।
हिन्दगी पर कविता और शब्दहार साहित्यिक संकलन में कविताएं प्रकाशित हुई है।
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