प्रेम

प्रेम

प्रेम में लोगों ने
प्रेम में गीत सुने
प्रेम पत्र भेजे
प्रेम कविताएं लिखीं.

 और मैने!!
प्रेम में स्त्री होना चाहा.


मैं बचाकर रखूँगा

मैं बचाकर रखूंगा
जाड़े की सर्द रात से थोड़ी सी ठंडक
सबसे गर्म दिनों के लिए
और सबसे स्याह रातों के लिए
तुम बचाकर रखना
जुगनुओं की थोड़ी सी रोशनी.

मैं बचाकर रखूंगा
तुम्हारी मुस्कान को
सबसे उदास दिनों के लिए
और सबसे कठोर पलों के लिए
तुम बचाकर रखना
अपना स्नेहिल स्पर्श
 
मैं बसन्त से कुछ रंग
उधार मांग लूँगा
तुम्हारे दामन के लिए
और तुम बचाकर रख लेना
उनकी खुशबू को
आने वाले पतझड़ के लिए.
 
इस तरह हम बचा लेंगे
थोड़ी सी गर्माहट
थोड़ी सी खुश्बू
थोड़ी सी रौशनी
एक स्नेहिल मुस्कान
और हमारी आंखों में
हमेशा बची रहेंगी
प्रेम की मौन अभिव्यक्तियां.
 

उपलब्धि

कल शाम मेरे हाथों में-
तेरा चेहरा यूं था
मुझे लगा! मैने हाथों में
समूची पृथ्वी उठा ली है.

धरा की सारी पीड़ाएं
तेरी आँखों से झर रही थी
उस खारे पानी से भीगकर
मैं हरा होना चाहता था.

मैने साँसों की ऊष्मा दी
पीड़ाएं भाप बन गयी
मैं बरस पड़ा बादल बनकर
और आंखों में फूल खिल गए.
मैने सारे फूल चुन लिए
मेरी सांसे महक उठी.
 
खारे पानी से सपनों का हरा होना
हमारे प्रेम की
सबसे बड़ी उपलब्धि थी.


अपने हाथ मेरे हाथों में रख देना

जब बसन्त रंग जाएगा
अपने रंगों से धरती की चूनर को..!
जब तितलियों के आगमन पर
मुस्कुरा उठेंगे बाग...!
जब बयार की शीतल छुअन
लगेगी तुम्हारे स्पर्श सी...!

जब सारे पंछी
अपने प्रवासों पर चले जाएंगे अगले साल तक के लिए।
जब पृथ्वी सफेद चादर ओढ़कर..!
कुछ देर तक शीतनिद्रा में चली जाएगी
जब सूरज मेरी छत पर...!
अपनी हथेलियों में ताप भरकर
पृथ्वी के गालों पर थपकियां देने आयेगा
 
जब त्योहारों के मौसम लौटेंगे
जब बहुत दिनों के बाद...!
पीहर आयेंगी दूर बियाही लड़कियां
जब घर लौटेंगे परदेस गये बेटे..!
और बरसों बाद आंगन में
फिर से लौट आयेगा बसन्त.....!!

 दुनियां के खौफनाक स्वप्न
जब रात के सबसे आखिरी प्रहर में
अंधेरे में लिपटकर
मेरी नींद में घुलने लगेंगे
और मैं उठ जाऊंगा सहमकर..!
 
तब तुम अपना हाथ...!
मेरे हाथों में रख देना...!!


तुमनें याद किया होगा

खमोशियाँ दिन भर रहीं
पर सुकून बहुत था
आँखों में फिर से कई स्वप्न पले
बादलों ने उड़ेल दिया
बरसकर सारा प्रेम धरा पर
हिचकियां देर तक आती रहीं
चांद झांकता रहा बार-बार
बादलों की ओट से
सितारे रात भर उदास रहे
देर तक आती रही..
मेरी खिड़कियों से तेरी खुशबू
आज हवाएं नम थी
मुझे यूं लगा!
तुमने याद किया होगा.
 

पाँव के निशान

पहले-पहल फर्श पर छपे-
हमारे पांव के निशान.!
किसी कोरे कागज़ पर-
हस्ताक्षर की तरह थे...!

हमने रोज़!
उन पन्नों पर नई कहानियां लिखीं
मिलन के संवाद लिखे
और प्रेमगीत लिखे...!

हमनें कागज़ों की-
पतंगे बनाई
और बरसात के भीगे दिनों में हमने
बादलों के नाम संदेश भेजे.
 
हमने आशाओं के पंख बनाये
और खुले आसमान में उड़ने दिया
हमने कश्तियां बनाकर
बचपन को आंगन में फिर से जिया.

सबसे उदास दिनों में
हम फिर से फर्श पर पैरों के निशान बनाते हैं
ताकि फिर से लिखे जा सकें
कहानियां और गीत
और फिर से बनाये जा सकें
कश्तियां और पंख।

 
हम प्रेम में थे

जब हम प्रेम में थे-
हमने बादलों से प्रेम किया
और बारिश में भीग गए. 

जहां हम मिले थे-
वहां दूर तक घना जंगल था
हमने पेड़ लगाये-
और जंगलों से प्रेम किया.
 
हम इस प्रेम में-
रंग भरना चाहते थे
हम तितलियों के पीछे नहीं भागे
हमने फूल उगाये.

हम प्रेम में थे-
हमने रास्तों के पत्थर उठा लिए
हमने उनसे घर बनाये-
और मूर्तियाँ तराशीं

हम प्रेम में थे-
हम अपने हिस्से की मिटटी बचाना चाहते थे
हमनें उस मिटटी पर
फसलें उगा लीं.

और अब....!
बादल, मिटटी, पत्थर और तमाम रंग हमारे थे
क्योंकि....
हम प्रेम में थे.


"कैसी लग रही हूं मैं.?"

"कैसी लग रही हूं मैं.?"
"वैसी ही, जैसी हमेशा लगती हो"
"चलो रहने दो!!

तुम्हें तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता"
यह वह संवाद है-
जो पिछले कई सालों से;
लगातार जारी है.

रोज़ सूरज डूब जाता है
रोज़ नई सुबह होती है
तुम रोज़ दोहराती हो यही सवाल
और मैं रोज़-रोज़;
यही जबाव दोहराता हूं.

हमारे पास नये सवाल नहीं हैं
नये जबाव भी नहीं
नई बहस, नई लड़ाईयां, नई बातें
कुछ भी नया नहीं
कभी-कभी सोचता हूं
क्या हम ऊब नहीं जाएंगे.?? 

किन्तु मैं जानता हूं-
कि हम जब भी ऊबने लगेंगे
तुम मुस्कुराती हुई;
आईने के सामने खड़े होकर
फिर से पूछोगी-
"कैसी लग रहीं हूं मैं.?"


नाम: अशोक कुमार

मूलतः : जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश.

वर्तमान पता: म.न.-17, पाकेट-5, रोहिणी सेक्टर-21 दिल्ली-110086

सम्प्रति: दिल्ली के सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक के पद कार्यरत

प्रकाशित संग्रह: “मेरे पास तुम हो” बोधि प्रकाशन से

इसके आलावा युवासृजन, प्रेरणाअंशु, नवचेतना, छत्तीसगढ़ मित्र, कथाबिम्ब और हंस में कवितायेँ प्रकाशित, हस्ताक्षर, साहित्यिकी, साहित्यकुंज, समकालीन जनमत, पोशम्पा वेब पोर्टल पर कवितायेँ प्रकाशित.

संपर्क: 9015538006

ईमेल :akgautama2@gmail.com