अँजुरी भर कर पुष्प बाँटते-बाँटते
न जाने कब बाँट बैठा वो
हृदय में संचित छल
कुछ आभास ही नहीं हुआ,
प्रेम कब तिरोहित हुआ
संकोचवश
न वो बोल सका..न मैं पूछ सकी
प्रयासरत रहे हमारे नेत्र
दुबारा फिर कभी न मिल सके,
कविताएं अब
छल का आवरण बन चुकी थीं,
छल के प्रकट होने पर
आक्षेप ही एकमात्र अस्त्र है
जिससे प्रेम को
स्तब्ध किया जा सकता है,
स्तब्धता के आघात से तप्त हृदय
मूकता के अतिरिक्त
द्वारबन्ध ही अंतिम उपहार था
जो तुमसे माँग बैठा,
रात्रि की कई प्रहर
भीगती रही नम हिचकियों से
अमलताश
निहारता रहा नए पूनम के चाँद को
शिउली सिहर कर उतर गई भूमि पर
समय पूर्व ही,
प्रेम सिर्फ विछोह से नहीं
मर जाता है छल से भी
जो किया है तल्लीनता से
प्रेम के नाम पर।
◆ तुम्हारे जाने के बाद
मेहन्दी का रङ्ग अब भी
गहराता रहा
महावर लकीरें खिंचती रही
बढ़ती रही पगडण्डियों की लंबाई
लेकिन तुम तक जो जा पहुँचे
वो राह स्वप्न में भी नहीं मिली,
तुम्हारा प्रेम मेरी अँजुरी का वो पुष्प था
जो मेरे नेत्र खुलने से पहले ही
बनकर बह गई पुष्पसार की नदी
शेष रह गई मेरी आत्मा पर स्मृति गन्ध,
क्षणिक मिलन के बाद कल्पों के विछोह ने
मुझे ट्राइटन बना दिया जहाँ चिर काल के लिए
हो चुका है हिमयुग का आगमन
जहाँ पर मेरी जमी हुई पीड़ाएँ आज भी हैं प्रतिक्षारत,
तुम्हारे जाने से स्तब्ध मेरी आत्मा को
अब न तो प्रेम की
और न ही तुम्हारे पुनरागमन की प्रतीक्षा है
बल्कि प्रतीक्षा है उस चोट की जो कर दे हमारे घावों को
सर्वदा के लिए हरित,
मैं प्रतिक्षारत रहूँगी तुम पत्रों की जगह
भेजते रहना अनवरत पीड़ाओं की
झिलमिलाती शृंखला
क्योंकि प्रतीक्षा का अंत तो प्रेम का अंत है।
◆ अंतहीन
प्रतीक्षा के अन्तहीन होने के उपरान्त भी
मैं विरक्त नहीं हो पाई प्रेम के मोहबन्ध से
और तुम
विरक्त होकर भी असक्ति से छूट नहीं पाए
कदाचित तुममें साहस ही नहीं था मुझसे मिलकर जाते !
मेरी संवेदनाएँ अब मात्र प्रेम से नहीं जुड़ी,
जुड़ी हैं अब मानिनी के मान से, स्वाभिमान से,
स्तब्धता से, मेरी निःशब्दता से
और तुम
अब भी लिए बैठे हो शून्यता का छल , पीड़ा से भय
और इस भय से मुक्ति में मोह में पलायन
बताओ न ! ये असक्ति नहीं तो और क्या है ???
हारे तो तुम प्रेम से ही हो, तब मेरे प्रेम से
अब सबके प्रेम में, और प्रेम तो प्रेम है
इसे हृदय से न मन की सजगता हटा सकती , न विवशता
न किसी ज्ञान के प्रकाश में इतनी शक्ति है
और न ही शून्यता के आंदोलन में !
सुनो!
पीड़ा और प्रेम से पलायन मोक्ष नहीं है
बल्कि
मोक्ष तो प्रेम और पीड़ा का उचित समायोजन है,
खैर!
अपनी शून्यता की दुनिया में ही सही
तुम खुश रहना बस।
◆ त्वम् ब्रम्हास्मि
ब्रम्हमहूर्त की शुभ्र बेला में तुम्हारा पदार्पण
बिल्कुल वैसा ही था
जैसे शीत से काँपते धरा को मिला हो मयूख का प्रथम स्पर्श
मैं स्तब्ध-सा तुम्हें देखता ही रह गया,
झील के जल में तुम्हारा प्रवेश इतना कोमल था कि
स्पर्श मात्र से पूरा झील हो उठा तरंगित
मानो हर लहर चूमना चाहता हो
तुम्हारे चरण से बेणी तक को,
ब्रम्हा ने स्वयं अपनी तूलिका से खींची थी तुम्हारी रेखाएं
जिसमें शतदल कमल की व्यंजनाएँ प्रस्फुटित होती हैं,
तुम्हारे भीगे स्वर्णिम बेणी से गिरी जहां-जहां पीयूष की बूंदें
उग आये वहाँ पर देवपुष्प पारिजात
तुम्हारे नेत्रों के प्रस्फुटन के साथ ही घोर तिमिर
स्वर्णिम आभा में परिवर्तित होती जाती है,
प्रस्तर बनती प्रतिक्षारत आँखें
तुम्हारी नीलाभ आभा पाकर जीवंत हो उठी
और मैं जड़ से चेतन की ओर अग्रसर होता चला गया।
◆ लालसा
मुझे तुम्हारा साथ, मात्र उतना ही चाहिए
जितना भस्म बनकर भी सती को शिव का मिला,
अगर मैं जलाभिषेक से बहकर पृथक भी हो जाऊँ तो
पुनः गोमुख चन्दन बनाकर लगा सको अपने ललाट पर,
हरसिंगार या सुगन्धित बेला बनने की मेरी कोई अभिलाषा नहीं
मुझे तो बनना है बिल्वपत्र कि मैं अवशोषित कर सकूँ हलाहल के ताप को,
मुझे नहीं जताना, न ही बताना है अपना प्रेम दुनिया भर को
मेरी ध्वनि बस इतनी हो कि
झंकृत न हो पाए तुम्हारा श्रवनिन्द्रिय,
किन्तु छू ले तुम्हारी आत्मा को,
मेरी समृद्धि किसी धन सम्पदा में निहित नहीं है
बल्कि न्यस्त है तुम्हारी हस्त-रेखाओं में बहती नदियों में
जो बनती हैं हमारे हाथों के मिलने से बने स्वेदकणों से,
विछोह की कल्पना मात्र मुझे ला पटकती है पुनः दक्ष के यज्ञवेदी पर
और मेरे पास अग्नि में प्रविष्ट होने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं,
सुनो !
लौट सकती है पुनः पुष्पसार की नदी धरातल पर
खिल सकता है ब्रम्हकमल पुनः अपराजिता के हस्तदल पर,
किन्तु,
विछोहित प्रेम विलीन हो जाती है अथाह समुद्र में
और फिर बन जाती हैं जाकर, समुद्रतल की अंधी मछलियां,
जो जीती हैं प्रेम की उज्ज्वलता
और विरह के अंधकार के मध्य।
◆ व्यथा
मैं मलिन मन लिए स्फ़टिक से प्रेम को
क्लांत करती रही अरुणोदय से चन्द्रोदय तक
कलुषित हृदय लिए मैं देखती भी चन्द्र को
तो मात्र दाग ही दाग दिखता मुझे,
चन्द्रमौली ज्यों-ज्यों निखारता गया
अपनी समस्त सोलह कलाओं को
अचम्भित हो मैं अपने नेत्र प्रकोष्ठ में
प्रेममिश्रित संकोच लिए निहारती रही प्राणान्त तक,
तदुपरान्त , मैं मानिनी ,
लज्जा को त्याग , हो निःशंक , निश्छल और निःस्वार्थ
आत्मग्लानि के चिता पर विदीर्ण हो ऐसे गई
कि पदचिह्न को भी लटकते आँचल ने पोछ लिया चुपचाप
पीछे छूटती नूपुर की ध्वनियों ने
कलुष की काली रेखाओं ने पकड़े बार बार
मेरे मान और अभिमान को
किन्तु व्यथा से पृथक होते नेह में
फिर पीछे मुड़कर देखने की कोई इच्छा शेष नहीं थी
अहा! ये मोहबन्ध नहीं मेरा प्रेम था
जो भ्रमित हो स्तब्ध हुआ था क्षण भर को।
◆ तिरस्कृत हृदय
हजार आकाश गङ्गाओं के मध्य तुम
देदीप्यमान थे प्रखर अंशुमाली की तरह
तुम्हारा गाम्भीर्य प्रतिबिम्बित होता रहा पग-पग पर
जैसे प्रागैतिहासिक गर्भ से पुनर्जीवित हो
वेद ऋचाएं गूँज उठी हों सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में
मैं प्रेम के सस्वर प्रकटीकरण में असमर्थ रही सदैव
किन्तु अंतर्ध्वनि ने समझाया मुझे
परस्पर मानसिक सम्वाद की निरन्तरता ही
प्रेम की प्रथम कड़ी है
नेह के ओस से भीगे मन से प्रीत का गुलाबी रङ्ग
बसन्त बीतने पर भी कहाँ ढल पाता है
वह तो शनैःशनैः विगलित हो जाता है
हृदय के तप्त भीत में
अपने अँजुरी के जल में चन्द्र के प्रतिबिम्ब को समेट मैं
भूल चुकी थी साकार और निराकार का भेद
अपने प्रेम की दिव्यता को हृदय में समेटे
मैं स्वयं को शिव की सती समझ
मोक्ष की कामना कर बैठी थी
पुनर्जन्म की परिकल्पना को ठुकराती हुई
जब-जब मैं प्रेम को समझी मोक्षद्वार
मेरी वर्तमान आयु नित प्रति क्षीण होती गई
और मेरे ईष्ट की प्रतिमा मोम की तरह पिघलती चली गई
अब वहाँ प्रतिमा की जगह व्याप्त है
तुम्हारे द्वारा प्रदत्त अथाह मौन
और मेरी निःशब्दता
तिरस्कृत हृदय के अपराधों की गणना करता हुआ।
सौम्या सिंह एक युवा कवयित्री हैं। द्वितीय वर्ष साहित्य की छात्रा हैं जो मूल रूप से गुहावटी की रहने वाली हैं परन्तु वर्तमान में दिल्ली में रह रही हैं। साहित्य में विशेष रुचि रखती हैं और आगे बेहतर करने को प्रयासरत हैं।
