सफर में धूप तो होगी


सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो 

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो 
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं 
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता 
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो 

कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा 
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो 

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें 
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो 


जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम 

जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम 
ख़ुद अपने आइने को लगे अजनबी से हम 

कुछ दूर चल के रास्ते सब एक से लगे 
मिलने गए किसी से मिल आए किसी से हम 

अच्छे बुरे के फ़र्क़ ने बस्ती उजाड़ दी 
मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम 

शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था 
ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम 

अच्छी भली थी दुनिया गुज़ारे के वास्ते 
उलझे हुए हैं अपनी ही ख़ुद-आगही से हम 

जंगल में दूर तक कोई दुश्मन न कोई दोस्त 
मानूस हो चले हैं मगर बम्बई से हम 


दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है 

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है 
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है 

अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम 
हर वक़्त का रोना तो बे-कार का रोना है 

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने 
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है 

ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है 
हर गाम पे पहरा है फिर भी इसे खोना है 

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं 
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है 

आवारा-मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को 
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है 


दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए 

दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए 
जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए 

यूँ तो क़दम क़दम पे है दीवार सामने 
कोई न हो तो ख़ुद से उलझ जाना चाहिए 

झुकती हुई नज़र हो कि सिमटा हुआ बदन 
हर रस-भरी घटा को बरस जाना चाहिए 

चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं 
कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए 

अपनी तलाश अपनी नज़र अपना तजरबा 
रस्ता हो चाहे साफ़ भटक जाना चाहिए 

चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त 
इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए 

बिजली का क़ुमक़ुमा न हो काला धुआँ तो हो 
ये भी अगर नहीं हो तो बुझ जाना चाहिए 


कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता 

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता 
कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता 

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो 
जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता 

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें 
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता 

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं 
ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता 

चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है 
ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता 


निदा फ़ाज़ली किसी तार्रुफ़ के मोहताज नहीं हैं। वह मशहूर शायर और गीतकार रहे हैं। उनकी ग़ज़लें उनकी शख़्सियत का आईना हैं, जो आज भी उनके होने का एहसास कराती हैं।