मौन

मौन

संसार में कुछ भी मौन नहीं होता⁣
आवाज़ हर जगह⁣
अपना स्थान बनाये हुए है,⁣

फूलों से पंखुड़ियाँ, पेड़ो से पत्तें⁣
सूखकर चुपचाप गिर जाते हैं,⁣
जीवन से मृत्यु तक⁣
उनके इस सफ़र का शोर⁣
केवल प्रकृति ही सुन पाती है,⁣

सुख शोर करता है⁣
यह महज एक भ्रम है,⁣
अत्यधिक ख़ुशियों का⁣
एकसाथ मिल जाना भी⁣
इन्सान को मौन कर जाता है,⁣

चुप्पियों के शोर में⁣
इतना भारीपन होता है⁣
कि ज़िन्दा शरीर पर भी⁣
हृदयाघात बेअसर होता है,⁣

जब हृदय दर्द से बहुत भारी हो जाता है,⁣
तो लोग रोते नहीं,⁣
बस चुप हो जाते हैं,⁣
पूरी तरह से चुप।


स्पर्श

संक्षिप्त जुड़ाव की अधिकता⁣
शरीर में अन्दर से⁣
ख़ालीपन ला देता है,⁣

महसूस करने की क्षमता⁣
अंतरङ्गता भूल जाती है,⁣
हमेशा स्पर्श की खोज में ⁣
शरीर भ्रमित रहता है,⁣

स्पर्श शरीर को शरीर से जोड़ता है ⁣
और केवल जोड़ नहीं रहा होता⁣
बल्कि अवचेतन रूप से⁣
शरीर को शरीर का⁣
आत्मीय बन्धन बना⁣
बांध रहा होता है,⁣

मिलने का मतलब⁣
स्पर्श को ज़द में लेकर⁣
क़ैद करना होता है,⁣
सभी के साथ बाँटना नहीं⁣
महफूज़ करना होता है,⁣

बँटा हुआ शरीर अक्सर⁣
स्पर्श को भूल जाता है।⁣


प्रेम और दुःख

भावों की कोई परिभाषा नहीं होती,⁣
जैसे प्रेम अपरिभाषित है⁣
ठीक दुःख की भी कोई व्याख्या नहीं,⁣

कभी-कभी प्रेम और दुःख⁣
परस्पर चलते है,⁣
इतना कि ख़यालों ने⁣
प्रेम का सैलाब दिल में बहाया⁣
और प्रिय के शहर फटेहाल ⁣
मिलने की चाहत लिए चले गए,⁣

कभी-कभी किसी का होने के लिए⁣
उसका शहर होना पड़ता है,⁣

⁣लेकिन प्रिय के शहर जाकर⁣
बिना मिले लौट जाना⁣
ऐसा असहनीय व्रजपात है -⁣
जहाँ दुःख अपरिभाषित हो जाता है,⁣

हे प्रिय!⁣
तुम जब भी प्रेम चुनना⁣
दुःख भी साथ चुनना।⁣


प्रतीक्षा

मेरे जीवन में⁣
तुम्हारी दस्तक होते ही⁣
मैं समझ गया कि⁣
प्रतीक्षा से बढ़कर⁣
कोई प्रेम नहीं,⁣

हमारे इस दूरस्थ रिश्ते में⁣
दिन के मुकाबले⁣
रात्रि की प्रतीक्षा⁣
हमेशा से अधिक रही,⁣
दिन को प्रायः काटना चाहा⁣
और रातें अप्रतिम ⁣
वार्तालाप लेकर आयीं,⁣

प्रकाश सूर्य की प्रतीक्षा में⁣
रातभर बेचैनी में⁣
तड़पता है,⁣
ठीक तुम्हारा शहर⁣
मेरे कदमों की बस ⁣
एक आहट की प्रतीक्षा में⁣
तड़पता रहा,⁣

तुमसे मिलने के बाद⁣
मैंने जाना -⁣
जितनी लम्बी प्रतीक्षा⁣
मिलन उतना ही⁣
सुखदायी होता है।⁣

प्रिय की प्रतीक्षा में⁣
प्रेम अहिल्या हो जाता है⁣
जिसकी मुक्ति ⁣
प्रिय के तिलस्मी छुवन ⁣
से ही सम्भव है।⁣


आख़िरी रस्म

प्रेम में होने का मतलब है⁣
प्रिय के सारे भावों से⁣
प्रेम हो जाना,⁣

होठों को बख़ूबी पता है⁣
वो केवल आनन्द के⁣
हिस्से ही नहीं है,⁣

प्रेम के भावों में ⁣
जब कभी बिखराव हुआ⁣
होंठ सर्वप्रथम आगे बढ़कर⁣
उन्हें समेटने के हिस्सेदार बनें,⁣

होठों की ख़ुशकिस्मती रही⁣
कि उन्हें चूमने का⁣
अप्रतिम कार्य सौंपा गया,⁣

प्रिय का आहट पाते ही⁣
अधरों की धमनियों में⁣
रक्त का सञ्चार ⁣
तीव्र हो जाता हैं,⁣

चेहरों को संवरने के लिए⁣
आईना चाहिए होता हैं,⁣
होंठ प्रिय के दर्शनमात्र से ही⁣
सँवर जाते हैं,⁣

तुम्हारे दुःख, सुख, प्रसन्नता, ⁣
बेचैनी, अवसाद, रूष्ट, गुस्सा,⁣
इन सारे भावों को⁣
अपनी होठों की दुनिया में⁣
क़ैद कर लेना चाहता हूँ,⁣

⁣चूमना आख़िरी रस्म है अगर⁣
तो मैं अन्तिम श्वास तक⁣
तुम्हें अनवरत चूमते हुए ⁣
पूरी सदियाँ बिताना चाहता हूँ।⁣


हारी हुई प्रेमिका

मैंने तुमसे दैवीय प्रेम किया,⁣
स्वच्छन्द भाव से दिल नहीं आत्मा को सौंपा⁣
मैं मान गयी कि⁣
तुम प्रेम के कोई अवतार हो,⁣

एक प्रेम में डूबी प्रेमिका की⁣
अभिलाषा क्या हो सकती है?⁣
वह अपना जीवन न्योछावर करके⁣
सात फेरो की अग्नि कुण्ड का⁣
मंत्रोच्चारण सुनने की कामना कर सकती है,⁣

परन्तु, मैं ठहरी प्रेम में हारी प्रेमिका ⁣
मुझे क्या करना चाहिए?⁣
मैं तो पुर्नजन्म में भोग-विलास की इच्छा की⁣
वरदान भी नहीं मांग सकती,⁣

तुम जिस वक़्त किसी का घूँघट उठा रहे होंगे⁣
उस वक़्त तुम्हारे प्रति जुनून का⁣
मेरे पैरों तले तख़्तापलट होगा⁣

मैं तुम्हारे ही ख़ातिर⁣
अनासक्त भाव से प्रेम को आज़ादी देकर⁣
आस्तिक बन जाऊँगी,⁣
तुम्हारे माफ़ी को लेकर मन में गर प्रश्न उठे⁣
मैं बेवफ़ाई के बदले भी⁣
तुम्हारे लिए ज़न्नत का सुख मांगूँगी,⁣
प्रेम का अन्तिम चरण केवल प्राप्ति नहीं हो सकती।⁣


अजय यादव, जो ख़ुद को एक आकस्मिक रचनाकार के रूप में दावा करते हैं। यह न केवल एक प्रतिभाशाली शृङ्गार-रस के रचनाकार हैं, बल्कि शब्दों और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्यार भरे शब्दों को बुनने में भी माहिर हैं। इनके प्राथमिक रुचि में सङ्गीत और यात्रा शामिल है। इनकी प्रथम शृङ्गार की रचनाओं से सुसज्जित पुस्तक "ग्यारह तिल" प्रकाशित हो चुकी हैं।