◆ मुक्ति
मैंने कभी नहीं कहा
कि तुमसे प्यार करती हूँ मैं
तुमने जब भी पूछा
मैंने अक्सर ही बात को गोल-मोल जवाब देकर टाल दिया
तुम मेरी स्वीकारोक्ति के लिए
करते रहे बार - बार प्रयास
कि मैं स्वीकार कर लूँ तुम्हारे लिए अपना प्रेम
लेकिन मैंने बस तुम्हें प्रेम किया चुपचाप
बिना कुछ कहे.. बिना बदले में तुमसे कुछ चाहे
प्रेम में डूबी मेरी आत्मा तुम्हारे लिए हमेशा
करबद्ध रही प्रार्थना में
लेकिन जीवन की सांध्य बेला के समय
अनवरत यात्रा से थकी देह
और तमाम दुःखों से पड़े छालों का उपचार हो सके
मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ
कि भले न कह पायी कभी कि तुमसे प्यार करती हूँ
लेकिन इतना जान लो मेरे प्यार
कि चिरनिद्रा से पहले एक तुम ही हो
जिसकी आवाज़ सुनकर क्षणभर को ही सही ठिठक जाएंगे प्राण
कि प्रयाण से पहले मात्र तुम्हारे स्पर्श से ही
मुक्ति पा जाएगी मेरी आत्मा!
◆ यात्रा
प्रेम गीत लिखने का प्रयास करती ऊँगलियाँ
तुम्हारे प्रेमिल स्पर्श का स्मरण करते ही
विरह व्यथा लिखने लगती हैं
पढ़ने वाले उसे शोकगीत की तरह आत्मसात करते हैं
हृदय की भीत के भीतर ही भीतर
घुमड़ती है तुम्हारी याद
तब मेरी आत्मा दुनियावी सुख की छ्द्म छाया छोड़
प्रेम से काता दुःख का शाश्वत चोला ओढ़ लेती है
ऐसा लगता है कि तुम्हारे प्यार में मिली पीड़ाएँ
मेरी आत्मा का श्रृंगार हैं
इन पीड़ाओं ने मुझसे प्रेम कविताओं के नाम पर
नये लोकाचार गढ़वाए हैं
और प्राप्त करने की कामनाओं के बीच
किसी पेंडुलम की भांति झूलती
मैं जीवन और मृत्यु के द्वार पर खड़ी हूँ
मेरे प्यार.
तुम एक बार पुकारोगे तो
जीवन और मृत्यु के मध्य की यह दुष्कर यात्रा सुगम हो जाएगी!
◆ मूल्य
अपनी भूख बो कर उसने
तुम्हारे लिए स्वाद उगाया
यह भूख का सबसे मार्मिक अनुवाद था
कुँवारी धरती के आँचल में
हल की फाल से लिखी उसने
ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक सार्थक कविताएँ
बैलों के कंधे पर जुते हल के साथ
जब वो घूमा धरती के सीने पर
घूर्णन करती धरती का गुरुत्वाकर्षण बल शतगुणित हुआ हर बार
तब रूठकर जाते बादल घुमड़ते आए इस बल के प्रभाव से।
इस अवदान के बदले तुमने उसे क्या दिया?.....
सड़कों के किनारे ठंड में बेतरह ठिठुरते टैंट की रातें?
या फिर "सोने की चिड़िया" का घोंसला
अब तुम्हारे अहंकार का मूल्य चुकाने को विवश है...!!!
◆ साक्षात्कार
जब तुम प्रेम में आकंठ डूबोगे
तब तुम्हें अनुभव होगा कि
साक्षात्कार हुआ है ईश्वर से
जब तुम उसके गालों पर ढुलका आँसू
समेट लोगे अपनी हथेलियों पर
तब तुम्हें अनुभव होगा
कि ईश्वर ने चुपके से तुम्हारे माथे पर
एक स्नेहासिक्त चुंबन रखा है
जब डूब रहोगे किसी की लागणी में
तब तुम्हें लगेगा कि
जो सांकल तुमने कसके चढ़ाई थी दिल के द्वार
उसे प्रेम की सुकोमल हथेलियां खड़का रही हैं
और उन हथेलियों को कष्ट न हो जरा भी
तुम आतुरता से खोल दोगे द्वार हृदमंदिर का
जब प्रेम का पवित्र स्पर्श पा जाओगे
तब शरीर की सीमाओं के बाहर
तुम्हारी आत्मा का कौमार्य भंग हो जाएगा
मन के इकतारे पे राम धुन के स्थान पर
उसी के नाम का संकीर्तन करेंगी धड़कनें!
◆ सलीक़ा
ऊबड़-खाबड़, पथरीले रास्तों से चलकर
लहूलुहान पैर लिए आई थी नदी तुम तक सागर
अपने पैरों में बांध कर बूँदों की पायल
लहरों का संगीत सुनाती आई थी बंजर भूमि को
मैदानों में अपने लहूलुहान आलते लगे कदमों से
बनाती आई थी हरे शुभ पगों के चित्र
तुम्हें उसके प्रेम के स्वागत का सलीक़ा भी नहीं आया
तुमने उसके छालों से भरे सुकोमल तलुवों पर
संदेह का नमक मल दिया!
नाम : रुचि बहुगुणा उनियाल
जन्म स्थान : देहरादून
निवास स्थान : नरेंद्र नगर, टिहरी गढ़वाल
प्रकाशन : प्रथम पुस्तक - मन को ठौर,
(बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित)
प्रेम तुम रहना, प्रेम कविताओं का साझा संकलन
(सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित)
पिछले तीन सालों से लगातार दूरदर्शन व आकाशवाणी पर रचनाओं के प्रसारण के साथ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनगिनत लेख व कविताएँ प्रकाशित, विभिन्न आनलाइन पोर्टल पर अनगिनत लेख व कविताओं का प्रकाशन ।
संपर्क: ruchitauniyalpg@gmail.com
