लेखक :- शिरीष खरे जी
कुल पृष्ट संख्या :- 206
प्रकाशक :- प्रतिष्ठित प्रकाशन, राजपाल एंड संस समूह।
एक ऐसी किताब जो साहित्य प्रेमियों अथवा पाठक वर्ग द्वारा कुछ महीनों से लगातार पढ़ी जा रही है या यूँ कहूँ चर्चा का विषय बनी हुई है। और हो भी क्यों न, यह एक अलग तरह की संकलन है जिसे लेखक ने अपने अनुभवों को पाठकों के समक्ष परोसा है। यूँ कहने को तो रिपोर्ताज है पर पढ़ते वक़्त लगता है जैसे कोई यात्रा वृतांत पढ़ रहा हूँ। यह किताब मुझे प्राप्त हुए तकरीबन एक महीने हो गये। थोड़ी व्यस्तताओ के कारण इसका रस थोड़े - थोड़े करके लिया गया। आखिरकार, हाल ही में लेखक के साथ मैंने भी " एक देश बारह दुनिया" की यात्रा पूरी की। इस किताब में लेखक ने ऐसी दुनिया के बारे में जिक्र किया है जिनकी इच्छाएँ एवं महत्वकांक्षाएँ केवल और केवल रोटी , कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर टिका हुआ है। किसी भी जीव की अस्तित्व की लडाई सर्वप्रथम इन्ही तीन चीजों के लिए होती है। कहाँ एकतरफ हम बात करते हैं भारत को विश्व गुरु बनाने की, पाँच ट्रिलियन वाली अर्थव्यवस्था देश बनाने की। कहाँ एक तरफ़ हम बात करते हैं मंगलयान, चंद्रयान की। कहाँ एक तरफ़ हम बात करते हैं डिजिटल इंडिया, टेक्नोलॉजी और न जाने क्या क्या!! किन्तु,दिखावे दुनिया की सच यह है कि विकास की अवधारणा हम हमेशा एक वर्ग को पीछे छोड़ कर या एक वर्ग की उपेक्षा करके करते हैं। इन्हीं पीछे छोड़े गए वर्ग की बात करती है " एक देश बारह दुनिया "।
लेखक की यात्रा शुरू होती है " वह कल मर गया " नामक शीर्षक से। भारत के पश्चिमी क्षेत्रों में हरित क्रान्ति ने तीन दशक पहले ही दस्तक दे दी थी। बेशक इससे खाद्य उत्पादन को एक नया आयाम मिला। फ़िर क्यों आज भी कुपोषण को नियंत्रित नहीं किया जा सका? क्यों भोज्य पदार्थों का असमान वितरण हुआ ? क्यों एक वर्ग दो वक़्त के रोटी के लिए तरस रहा है! इन सभी सवालों का जवाब देने का काम करती है यह किताब ।
कौन नहीं चाहता पक्षियों की तरह चहचहाना, कौन नहीं चाहता पक्षियों की तरह खुले आसमान में उड़ना। " किन्तु पेट की भूख और अपने अस्तित्व को बचाये रखने की मजबूरी इंसान से क्या कुछ नहीं करवाती! " पिंजरेनुमा कोठरियों में जिंदगी" नामक शीर्षक एशिया की सबसे बड़ी सेक्स मंडीयों में से एक , महाराष्ट्र के कमाठीपुरा की उन सेक्स वर्कर्स की आप बीती है जिन्हें जबरजस्ती या मजबूरीवश इस दलदल में धकेला गया है। इन्हें किसी के झूठे प्यार ने तो किसी के बचपन से अपने परिवार के किसी सदस्य से मिलने की आस ने जीवित रखा है। बाजारवाद की भेंट में शरीर केवल और केवल उपभोग की वस्तु बनकर रह जाती है। जब तक नई होती है तब तक खूब इस्तेमाल करो , पुराना होने के बाद उस वस्तु की मूल्य स्वतः घट जाती है। पढ़ते वक़्त 90s दशक के किसी फ़िल्म के कोठे वाली कहानियों सी लगती है किन्तु यह वास्तविक है यह जानकर अचरज होती है। क्यों कोई जबरजस्ती या मजबूरीवश फंसे जीवन को कोठरियों से बाहर लेकर नहीं आता! यह सब अब भी सवालों के घेरे में हैं।
प्राचीनकाल में आदिमानव अपने भोजन के लिए एक जगह से दूसरे जगह भटकते थे। यह जीवन मानव समाज का एक वर्ग आज भी जीता है यदि मैं यह कहूँ तो हो सकता है स्वीकारना थोड़ा मुश्किल होगा। किन्तु यह सच है अमूमन हम उन्हें बंजारा या घुमंतू कह देते हैं। इनका कोई स्थायित्व ठौर ठिकाना नहीं होता। ये अपने देश के ही परदेसी होते हैं। मुख्यधारा से एकदम कटे हुए, न इन पर कोई NGO ध्यान देती है न सरकार और न सभ्य लगने वाले बुद्धिजीवी वर्ग के लोग।
"गन्ने के खेतों में चीनी कड़वी" शीर्षक ने बताया है कि कैसे रोजगार के लिए पलायन किये गये लोगों के रक्त से मीठी चीनी बनती है। कैसे मजबूरीवश कम पैसों में अथवा किसी कॉंट्रैट के तहत मिनिमम आर्थिक आय में या डेली भुगतान पर काम करने को विवश हैं। कैसे कुछ मजदूर दलाल के हाथों पहले से लिए गए कर्ज तले दबते चले जाते हैं। कैसे तय समय अवधि से अधिक काम लिया जाता है। जिन मजदूरों के हाथ में देश की अर्थव्यस्था को बूस्ट करने की जिम्मेदारी होती है और बेशक वे अपने जिम्मेदारी पे खरे उतरते भी हैं। किन्तु एक वर्ग उनके श्रम शक्ति का मशीन की तरह उपयोग करता है और जब बीमार पड़ जाते हैं तो मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। बाहर से भले ही नज़र न आय किन्तु यह सच है कि पूँजीवादी अर्थव्यस्था किसी भी देश के निम्न वर्ग के लिए घातक ही होता है। भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था होते हुए भी कहीं न कहीं पूँजीवादियों का प्रभाव तो है ही।
"मीराबेंन को नींद नहीं आती" शीर्षक में लेखक एक छोटे शहर के मेट्रो सिटी/ मेगासिटी बनने के बदले कुचले गये हजारों झुग्गी झोपड़ियों के चीखें को बताते हैं। लेखक ने निजी तौर पर लोगों के ढहते मकान देखें हैं इस दर्द को उनसे बेहतर और भला कौन लिख सकता है। मैं तो शुरू से गाँव में रहा हूँ इसलिए शहरी गरीबी के दर्द को केवल और केवल महसूस कर सकता हूँ लिख नहीं सकता। पलक झपकते ही बिना किसी अर्जी बिना किसी दलीलें आपके बसे बसाये घर/ मकान को ढहा दिया जाये , रातों रात आप घर से बेघर हो जाएं तो ऐसे लोगों के लिए आवास, भोजन, रोजगार के विकल्प ही कहाँ बचते हैं। एक तो ग़रीबी और उस पर सब कुछ फ़िर से शुरू करना अपने जीवन को बचाने की जद्दोजहद ही तो है। पुनर्वास के कारण बेरोजगारी की समस्या बढ़ती ही है।
"दंडकारणय यूँ ही लाल नहीं है" शीर्षक में लेखक छत्तीसगढ़ के बस्तर के घने जंगलों के बीच कैसे खूनी खेल खेला जाता है। कैसे वहाँ के मूल निवासी शिक्षा, स्वास्थ्य को लेकर अभावपूर्ण जीवन जीने को विवश हैं। कैसे वहाँ की आदिवासी युवतियां यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं। कैसे वहाँ के स्थानीय लोग फर्जी एंकाउंटर तो कभी फर्जी नक्सली आत्मसमर्पण का हिस्सा बन जाते हैं।
"धान के कटोरे में राहत का धोखा" शीर्षक में लेखक छत्तीसगढ़ के उन सुखाग्रस्त जिलों के बारे में बताते हैं कि कैसे किसानों को राहत के नाम पर छला गया। कैसे कर्ज में डूबे किसान सूखे की स्थिति के कारण फ़सल नष्ट हो जाने पर प्रशासन से राहत की गुहार लगाता है। छत्तीसगढ़ में अभी भी अन्य राज्यों की तरह सिंचाई की उतनी उचित व्यवस्था नहीं है। राज्य के अधिकांश जिले अभी भी सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर हैं। कुल मिलाकर यह किताब एक अलग ही दुनियाँ को देखने का नजरिया देती है। जिसे हम अक्सर नहीं देख पाते या देखते भी हैं तो इग्नोर कर देते हैं।
इस किताब के कवर पेज के चित्र नाम के साथ मैच नही करता । जिस तरह किताब का नाम " एक देश बारह दुनिया " है। उसी तरह भारत के मानचित्र के भीतर चित्र में भी बारह पहलुओं को दिखाया जाता तो कवर पेज और आकर्षक लगता। किताब की भाषा शैली प्रवाहपूर्ण है। लेखक स्वयं एक पत्रकार भी हैं तो व्याकरण त्रुटि होने की गुंजाईश स्वतः ही न्यून हो जाती है।
पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से इस किताब की स्वीकार्यता बढ़ी है। निश्चित ही लेखक को नया आयाम मिलेगा। यह बताने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है कि इस किताब को कई पुरस्कार प्राप्त हो चूके हैं। उम्मीद करता हूँ कि जल्द ही पाठकों के समक्ष नई किताब लेकर प्रस्तुत होंगे। लेखक शिरीष खरे जी को बहुत - बहुत शुभकामनाएं।
विजय नारायण एक युवा लेखक हैं। पठन-पाठन में विशेष रुचि रखते हैं। लेखन के क्षेत्र में अपनी कविताओं, कहानियों और समीक्षाओं से अपना स्थान निर्दिष्ट किए हुए हैं।
