तमाम रातें
मैंने किताबों के बीच गुजारे
शब्दों में तलाश रही तुम्हारी
जलते दीये की लौ में तस्वीर बनती-बिखरती
कई-कई दिन छत की मुंडेर पर रही खड़ी
यह जानते हुए कि
यह रास्ता नहीं है तुम्हारे जाने का
कभी भटक क्यों नहीं जाते तुम करती दुआ
महीने बीत गए आँसुओं को विदा किये
अब काँटा बन चुभने लगा है
जीने की उम्मीद शेष नहीं अब
स्मृतियाँ समुद्र-सा हिलोरे मारती
कई बार शब्दों की हत्या करके
अब अपना जीवन बचाती हूँ मैं।
◆ मैं मिलना चाहती हूँ
मैं मिलना चाहती हूँ
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका से
मैं जानना चाहती हूँ तुम्हारे बारे में
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका से
मैं देखना चाहती हूँ तुम्हारी पीड़ा
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका में
मैं महसूस करना चाहती हूँ तुम्हें
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका में
हाँ मुझे कोई आपत्ति नहीं
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका से
मैं देखना चाहती हूँ तुम्हारे आंसू
उसकी आंखों में
तुम्हारी तड़पाहट, बैचेनी भरी नींद
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका में
उसने तुम्हें सबकुछ दिया
प्यार दिया सम्मान दिया
यह जानते हुए कि
उसकी आहट पर तुम बोलोगे तक नहीं
इसलिए मैं मिलना चाहती हूँ
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका से
जब जब तुम्हें पीड़ा मिली
तुमने स्वत: ही उसे पुकारा
पर खुशियों के पल में
तुमने हमेशा उसे नदारद ही किया
पर तुम्हारे दुख को सुख में
परिवर्तित करने के लिए
न जाने कितनी मनौतियाँ माँगी
क्षणिक प्रेम से उसका कर्ज नहीं चुका पाओगे
इसलिए मैं मिलना चाहती हूँ
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका से
मैं मिलना चाहती हूँ इसलिए कि
ताकि उससे सीख सकूँ
विपरित परिस्थितियों में भी
प्रेम को जिंदा रखने की कला!
हाँ मैं मिलना चाहती हूँ
तुम्हारी पूर्व प्रेमिका से।
◆ मेरे पाँव तो पत्थर हैं
मैं भटक रही हूँ दो राहों के बीच
एक मेरे मन की राह है
जहाँ मैं जाना चाहती हूँ
एक हमारे पितृसत्ता समाज की बनाई गई राह है
जिसपर मुझे चलने को कहा जा रहा है
मैं उलझन में हूँ किस रहा पर चलूँ
जिसपर सभी लड़कियाँ चलती आ रही हैं अबतक
या फिर खुद के लिए कोई अलग राह बनाऊँ
जहाँ और भी लड़कियाँ चल सके
और अपने फैसले स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र हो सके
इसके लिए गर मुझे देनी पड़े चुनौती
तो तैयार हूँ मैं
मुझे बने- बनाए राहों पर नहीं चलना
क्या अपनी राह स्वयं नहीं बनाऊँ
तुम्हें तो गर्व होना चाहिए मेरे फैसले को सुनकर
लेकिन तुम हो कि हार- जीत मान लिये हो
तुम हारना चाहते नहीं, हमें हार मंजूर नहीं
इन द्वंदों के बीच पिघल जाऊँ
मैं कोई मोम की बनी मोमबत्ती तो नहीं
हे पितृसत्ता समाज!
मैं तो उन सबके खिलाफ हूँ
जो तुम्हारी गलतियों में भी तुम्हारा ही साथ देते हैं
चाहे वो स्त्री जाति की ही क्यों न हो
सुनो! मेरे पथ के कांटे मत बनो तुम
आश्चर्य होगा जानकर तुम्हें
मेरे पाँव तो पत्थर हैं।
◆ वह तुम ही हो माँ
वह तुम ही हो माँ
जो अपने माथे की बिंदी
अपनी बेटी को लगाकर
दुल्हन के रूप का अनुमान लगाकर
नजर उतारती हो
वह तुम ही हो माँ
जो लड़की वाला फ्राॅक
अपने छोटे-से बेटे को पहनाती हो
कहती हो ये तो बिल्कुल लड़की जैसा है
और आंखों के काजल तलवे में लगा
अपनी ही नजर से बचा लेती हो
वह तुम ही हो माँ
गजब हो तुम
क्या किसी को अपनी माँ से भला नजर लगती है
तुम्हारी नजर में तो अद्भुत शक्ति है माँ
जो मुझे अदृश्य भय से बचाती है
वह तुम ही हो माँ
जो मेरी सारी गलतियाँ माफ कर देती हो
और गले लगाकर कहती हो
ऐसी गलती फिर कभी नहीं होना चाहिए
वह तुम ही हो माँ
माँ तुम "मैं" भी हो
तुम "तुम" भी हो
और तुमसे मिलकर "हम" सब हैं
तुम बिन ये जीवन संभव नहीं
वह तुम ही हो माँ।
◆ कठिन है इस समय में
जब देखती हूँ किसी आदमी को
पक्षियों का शिकार करते
दिल दहल जाता है
मानव और पशु में अंतर करना
तब और कठिन हो जाता है
जब मानवता सिरे से खारिज कर दी जाती है
मैं आदम जाति का हूँ
यह इस बात का संकेत है कि
वह सबकुछ बन सकता है
कठिन है इस समय में
मनुष्य को मनुष्य बने रहना।
◆ प्रेम आँसू है
एक दिन हम हमेशा के लिए दूर हो जाएँगे
हमारे बीच न शिकायतों के शब्द होंगे
न मुलाकातों के बहाने
हम दूर देश के यात्रा पर निकलेंगे
और दर-ब-दर ढूंढेंगे तुम्हें
सूखे पत्तों पर हस्तलिखित प्रेमिल शब्द
झरनों से करेंगे मनुहार
एक बार पहुँचा दे तुम तक
प्रेम आँसू है
चाहे जितना भी बहा लो
थोड़ा बच ही जाता है
हम भटकेंगे शहर-दर-शहर
और खोजेंगे तुम्हें वहाँ के बहुमंजिला इमारतों में
आधी रात तक रेस्तरां में बैठकर
निहारेंगे आने-जाने वाले को
मत कहो अब हम कभी नहीं मिलेंगे
हम मिलेंगे तुमसे तब-तब
जब-जब पढ़ी जायेगी मेरी कविता।
◆ गिलहरी
मैं प्रेम में गिलहरी बन
एक प्रेमिल स्मृति से दूसरी तक कूदती रही
अपने बीच हुए वार्तालाप को कविताओं में पिरोया
सुखद स्मृति की तरह
यह जानते हुए भी कि
एक दिन अंत निश्चित है
प्रेम खत्म होने पर
आत्मा स्वतः ही नष्ट हो जाती है
यह बात भी
उसके जाने के बाद महसूस की
डायरी के पन्ने
अब शब्दों से नहीं
आँसुओं से लबरेज़ रहता है
जिसमें दिखती है उसकी छवि
आँखें इंतज़ार करते-करते
बन गई है नदी
जिसमें स्वप्नों का सैलाब आता है
और बहा ले जाता है मेरा अस्तित्व
कविता मेरे प्रेम की दी हुई
आखिरी बची निशानी है
खैर! अब मैं नहीं लिखती कविता
बस उसे याद करती हूँ।
मैं दिव्या श्री, कला संकाय में स्नातक कर रही हूँ। कविताएं लिखती हूँ। अंग्रेजी साहित्य मेरा विषय है तो अनुवाद में भी रुचि रखती हूँ। बेगूसराय बिहार में रहती हूँ।
प्रकाशन: वागर्थ, इंद्रधनुष, कविकुम्भ, उदिता, पोषम पा, कारवां, साहित्यिक, तीखर, हिन्दीनामा, अविसद,
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