दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

छवि श्रेय: गूगल









दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के 

वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं 
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के 

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन 
देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के 

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया 
तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के 

भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज 'फ़ैज़' 
मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के 


तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं 

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं 
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं 

हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं 
तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं 

हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है 
जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं 

सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन 
तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं 

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी 
फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं 

दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है 
तो 'फ़ैज़' दिल में सितारे उतरने लगते है



फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (१९११-१९८४) भारतीय उपमहाद्वीप के एक विख्यात पंजाबी शायर थे, जिन्हें अपनी क्रांतिकारी रचनाओं में रसिक भाव (इंक़लाबी और रूमानी) के मेल की वजह से जाना जाता है। सेना, जेल तथा निर्वासन में जीवन व्यतीत करने वाले फ़ैज़ ने कई नज़्में और ग़ज़लें लिखी तथा उर्दू शायरी में आधुनिक प्रगतिवादी  दौर की रचनाओं को सबल किया। उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए भी मनोनीत किया गया था।