गुलों में रंग भरे



गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले 

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले 
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले 

क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो 
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले 

कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़ 
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले 

बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही 
तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़म-गुसार चले 

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ 
हमारे अश्क तिरी आक़िबत सँवार चले 

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब 
गिरह में ले के गरेबाँ का तार तार चले 

मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं 
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले 


आप की याद आती रही रात भर

आप की याद आती रही रात भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर 

गाह जलती हुई गाह बुझती हुई 
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर 

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन 
कोई तस्वीर गाती रही रात भर 

फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले 
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर 

जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर 
हर सदा पर बुलाती रही रात भर 

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा 
इक तमन्ना सताती रही रात भर 


कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी 

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी 
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी 

कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगा 
किस दिन तिरी शुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी 

कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना 
कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी 

वाइ'ज़ है न ज़ाहिद है नासेह है न क़ातिल है 
अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी 

कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामत-ए-जानाना 
कब हश्र मुअ'य्यन है तुझ को तो ख़बर होगी 


नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं 

नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं 
क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं 

जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है 
सब उन को सुनाने के दिन आ रहे हैं 

अभी से दिल ओ जाँ सर-ए-राह रख दो 
कि लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं 

टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती 
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं 

सबा फिर हमें पूछती फिर रही है 
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं 

चलो 'फ़ैज़' फिर से कहीं दिल लगाएँ 
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं



फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (१९११-१९८४) भारतीय उपमहाद्वीप के एक विख्यात पंजाबी शायर थे, जिन्हें अपनी क्रांतिकारी रचनाओं में रसिक भाव (इंक़लाबी और रूमानी) के मेल की वजह से जाना जाता है। सेना, जेल तथा निर्वासन में जीवन व्यतीत करने वाले फ़ैज़ ने कई नज़्में और ग़ज़लें लिखी तथा उर्दू शायरी में आधुनिक प्रगतिवादी  दौर की रचनाओं को सबल किया। उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए भी मनोनीत किया गया था।