एक वृक्ष की हत्या

छवि श्रेय: गूगल









एक वृक्ष की हत्या

अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था— 
वही बूढ़ा चौकीदार वृक्ष 
जो हमेशा मिलता था घर के दरवाज़े पर तैनात। 

पुराने चमड़े का बना उसका शरीर 
वही सख़्त जान 
झुर्रियोंदार खुरदुरा तना मैला-कुचैला, 
राइफ़िल-सी एक सूखी डाल, 
एक पगड़ी फूल पत्तीदार, 
पाँवों में फटा-पुराना जूता 
चरमराता लेकिन अक्खड़ बल-बूता 

धूप में बारिश में 
गर्मी में सर्दी में 
हमेशा चौकन्ना 
अपनी ख़ाकी वर्दी में 

दूर से ही ललकारता, “कौन?” 
मैं जवाब देता, “दोस्त!” 
और पल भर को बैठ जाता 
उसकी ठंडी छाँव में 

दरअसल, शुरू से ही था हमारे अंदेशों में 
कहीं एक जानी दुश्मन 
कि घर को बचाना है लुटेरों से 
शहर को बचाना है नादिरों से 
देश को बचाना है देश के दुश्मनों से 
बचाना है— 
नदियों को नाला हो जाने से 
हवा को धुआँ हो जाने से 
खाने को ज़हर हो जाने से : 
बचाना है—जंगल को मरुस्थल हो जाने से, 
बचाना है—मनुष्य को जंगल हो जाने से। 


सतहें

सतहें इतनी सतही नहीं होती 
न वजहें इतनी वजही 
न स्पष्ट इतना स्पष्ट ही 
कि सतह को मान लिया जाए काग़ज़ 
और हाथ को कहा जाए हाथ ही। 

जितनी जगह में दिखता है एक हाथ 
उसका क्या रिश्ता है उस बाक़ी जगह से 
जिसमें कुछ नहीं दिखता है? 
क्या वह हाथ 
जो लिख रहा 
उतना ही है 
जितना दिख रहा? 
या उसके पीछे एक और हाथ भी है 
उसे लिखने के लिए बाध्य करता हुआ? 


यह कैसी विवशता है?

यह कैसी विवशता है— 
किसी पर वार करो 
वह हँसता रहता 
या विवाद करता। 

यह कैसी पराजय है— 
कहीं घाव करें 
रक्त नहीं 
केवल मवाद बहता। 

अजीब वक़्त है— 
बिना लड़े ही एक देश का देश 
स्वीकार करता चला जाता 
अपनी ही तुच्छताओं की अधीनता! 

कुछ तो फ़र्क़ बचता 
धर्मयुद्ध और कीटयुद्ध में— 
कोई तो हार-जीत के नियमों में 
स्वाभिमान के अर्थ को 
फिर से ईजाद करता। 


घर रहेंगे

घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे : 
समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे : 
अनर्गल ज़िंदगी ढोते किसी दिन हम 
एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे। 

मृत्यु होगी खड़ी सम्मुख राह रोके, 
हम जगेंगे यह विविधता, स्वप्न, खो के, 
और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम 
अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके। 

प्रकृति औ' पाखंड के ये घने लिपटे 
बँटे, ऐंठे तार— 
जिनसे कहीं गहरा, कहीं सच्चा, 
मैं समझता—प्यार, 
मेरी अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई, 
छीन लेगा इन्हें हमसे देह-सा संसार। 

राख-सी साँझ, बुझे दिन की घिर जाएगी : 
वही रोज़ संसृति का अपव्यय दुहराएगी। 



कुँवर नारायण (१९ सितम्बर 1927-15 नवम्बर २०१७) एक हिन्दी साहित्यकार थे।नई कविता आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक (१९५९) के प्रमुख कवियों में रहे हैं। 2009 में उन्हें वर्ष 2005 के लिए भारत के साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।