केक

केक

“पापा, आपको आपके जन्मदिन पर क्या गिफ्ट चाहिए”, बच्चे की आवाज खुशी से सराबोर थी, उसने एक दम से पिता को पीछे से आलिंगन में लेते हुए पूछा।

पिता जो किन्हीं और विचारों में डूबा था, उसकी तंद्रा टूटी, पर वो सुन नहीं पाया बच्चे ने जो कहा।

 सहज ही उसने उसे अपनी बांहों में भर लिया।

“बताओ ना, पापा?”

“क्या?” पिता ने अपने माथे पर उभरी लकीरों को सपाट करने की चाह रख हंसने की नाकाम कोशिश करते हुए पूछा।

“आप का जन्मदिन आ रहा है, मैं आपको क्या तोहफा दुं?”, हर्ष और उत्साह से लबरेज आवाज फिर से चहक उठी।

“जन्मदिन!”, पिता ने कुछ सोचते हुए कहा जैसे, “ मेरा क्या जन्मदिन अब, जन्मदिन तो बच्चों के होते हैं”, उसने बच्चे को टालते हुए कहा, उसका ध्यान भी कहीं और था, इस महीने कौन से खर्च का कैसे प्रबंध करना है, राशन के अलावा मकान का किराया और बिजली बिल तो सर पर बैठा ही हुआ है।

“क्यों पापा, आप इस बार अपने बर्थडे पर छुट्टी कर लेना, सारा दिन कहीं घूमेंगे, और कहीं बाहर खाना खायेंगे, मैं आपको एक सरप्राइज भी दूंगा.” नौ साल का मासूम सरप्राइज की बात को छुपा सकने में लगभग नाकाम रहा।

बच्चे की नजर में जन्मदिन का एक विशेष महत्व है, असल में उसने जब से होश संभाला तब से यही महसूस किया, कोई पसंदीदा खिलौना, बैट, यहां तक कि साइकिल भी, उसे जन्मदिन पर ही मिली, और साथ ही मिलता एक अच्छा सा सूट, हालांकि फिर पूरा साल, कहीं आने जाने के वक़्त, दिन त्यौहार में उस सूट को निकाला जाता और पहना जाता, जब तक वह पूरी तरह घिस नहीं जाता या छोटा नहीं हो जाता, इसके इलावा उसे दादी, नानी और कुछ रिश्तेदारों से कुछ नकद भी मिल जाता, जो उसकी मां गिन कर उसकी गुल्लक में संभाल कर रख देती, कि उसकी किसी जरूरत के वक़्त काम आएंगे, उस एक दिन में वो किसी राजा जैसा महसूस करता,

वरना बाकी का सारा साल तो चीज़ों के अभाव में ही निकल जाता, हर हफ्ते मिलने वाले जेब खर्च के पांच दस रुपए से गोली टॉफी या कोई छोटा चिप्स का पैकेट लेने वो पास की बड़ी दुकान पर जाता तो वहां रखे बड़े बड़े खिलौनों में से कोई एक खिलौना पसंद करके अपनी बहन को बताता कि इस बार वो अपने जन्मदिन पर ये वाला खिलौना लेगा, हालांकि हर हफ्ते उसका फैसला बदलता रहता। दुकानदार उसकी भोली बाते सुनकर जोर से हंसने लगता, हालांकि उसकी हंसी में एक गहरा व्यंग्य होता, पर बच्चा इतना छोटा और भोला था कि वो उस व्यंग को समझ नहीं पाता था और वो भी उसके साथ हंसने लगता, उसकी बहन जो उम्र में उस से कुछ बड़ी थी, पर समझ में कुछ ज्यादा बड़ी, वो कुछ कुछ समझ जाती और बच्चे को लगभग खींचते हुए घर की तरफ ले जाती। और ऐसे में जन्मदिन उस बच्चे के लिए साल का सर्वश्रेष्ठ दिन बन गया था, एक पूरा दिन खुशियों और सौगातों से भरा, एक दिन अपनी मनमर्जी का, स्वादिष्ट पकवानों का, एक दिन राजसी ठाठ का।

तो वो चाहता था कि उसके पापा भी एक दिन ऐसा ही महसूस करें, पूरा दिन कोई काम न करे और सारा दिन ढेर सारी मौज करें।

“छुट्टी!”, पिता ने हैरान होते कहा, “ छुट्टी कर लूंगा तो घर खर्च कैसे चलेगा, और रही बात तोहफे की तो मुझे सबसे प्यारे तुम दोनों हो, तुम दोनों आपस में झगड़ना बन्द कर दो, अच्छी तरह पढ़ाई करो, यही मेरे लिए सबसे अच्छा तोहफा है” पिता ने कहा।

“अच्छा पापा, ये तो बताओ कि आप को कौन सा केक पसंद है?”

“केक, तुम्हारा दिमाग तो सही है, मैं क्या केक काटूंगा, मुझे केक पसंद नहीं”,

“अरे पापा, आप भी तो मेरे जन्मदिन पर कितना कुछ लाते हो, इस बार मैं आपके बर्थडे पर केक लाऊंगा, और आपसे पैसे नहीं मांगूंगा केक के”, बच्चा खुशामद करते हुए बोला।

“कोई जरूरत नहीं, और गुल्लक के पैसे निकालने को सोचना भी मत, अब जाओ जा कर पढ़ाई करो, सारा दिन यूं ही खेलते रहते हो”, पिता ने अपना फैसला सुनाया।

बच्चा मन मसोस कर रह गया। पर इस बार जैसे उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि अपने पापा को वो जन्मदिन वाले दिन उस खुशी का एहसास करवा के रहेगा। उसने अपनी मां और बहन से बात की, दोनों ने उसे कई बार मना किया, पर आखिर में दोनों उसके सरप्राइज में शामिल होने को तैयार हो गई। उसने किसी कजिन से सुना था कि रात के बारह बजे ही अगला दिन शुरू हो जाता है, और आजकल लोग रात बारह बजे ही सरप्राइज पार्टी करते हैं। तो ठीक जन्मदिन से एक दिन पहले, पिता के घर आने से पहले ही तीनों पास की एक दुकान पर केक लेने पहुंचे, केक के फ्लेवर को लेकर गहन विचार विमर्श हुआ, कुछ चर्चा उसके मूल्य पर भी की गई, अंत में एक शानदार केक पसंद किया गया और उस पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखवाया “पापा”

घर आकर केक को चुपचाप फ्रिज में छुपा दिया गया। खाना खाने के बाद जब सोने का वक़्त आया, तो आदत के अनुसार पिता पानी पीने रसोई की तरफ बढ़े, कि बच्चा उनसे पहले ही दौड़ कर पानी की बोतल और गिलास ले आया। दिन भर का थका हारा पिता बिस्तर पर लेटते ही सो गया। रात के दस बज चुके थे, दो घंटे बाकी रह गए थे, नया दिन आने में, ये दो घंटे जागे रहना उस नन्ही सी जान के लिए बड़ा मुश्किल काम था, वो तो कभी नए साल के आगमन पर भी नहीं जागे, ऊपर से कमरे की लाइट्स बन्द, उस अंधेरे में नींद उस पर काबिज ना हो जाए इस लिए उसने आंखें खोल कर रखी, उसने मां और बहन की तरफ देखा, दोनों सो चुकी थी, जागे रहने का उत्साह तो था, नींद ना आ जाए इसका डर भी, वो कल्पना कर रहा था कि रात को जब ठीक बारह बजे वो पापा को जगाएगा और हैप्पी बर्थडे बोलेगा तो वो कितना खुश होंगे, उनको आज तक ऐसा सरप्राइज किसी ने नहीं दिया, उनका जन्मदिन कितना खुशगवार होगा, वो उन्हें कस कर आलिंगन में पकड़ लेगा और बोलेगा आई लव यू पापा।

बड़े यत्न और कल्पनाओं में खोए हुए आखिर वो जागे रहने में कामयाब रहा, बारह बजते ही उसने लाइट जगा दी, और पापा के पैर को हिलाया, पिता हड़बड़ा कर उठ गए, उन्हें इतनी रात में उठाए जाने पर किसी अनहोनी की आशंका हुई,

“क्या हुआ?” , हड़बड़ाहट में वो बोले।

“हैप्पी बर्थडे पापा, आपके लिए सरप्राइज पार्टी, चलो बाहर हम केक लाए है”, बच्चा खुशी से झूम कर बोला।

तब तक मां भी उठ गई थी, बहन अभी सो रही थी। पिता को एक पल तो समझ ही नहीं आया, फिर गुस्से से उसकी भृकुटी तनी और उसने से बहता सारा गुस्से का सैलाब उसकी पत्नी की तरफ बढ चला

“तुम भी बच्चों के साथ बच्चा बन जाती हो, मैंने मना भी किया था ये सब करने से, तुम लोगों को एक बार में बात समझ नहीं आती क्या, घर में खाने के लाले, यहां पार्टियों के शौक उठ रहे, अच्छा भला पता है तुम्हें इस महीने किराया किसी से पैसे मांग कर भरा….”

“मैंने इसे मना भी किया था, पर बच्चे का दिल था आपको खुशी देने का, अब गुस्सा छोड़ो आप, कितने प्यार से केक लाया है वो, उसका दिल रख लो”, पत्नी ने शांत करने की कोशिश करते कहा।

बच्चा इस सब पर हतप्रभ था।

“और केक के पैसे कहां से आए, गुल्लक से, वो पैसे इसलिए बचा कर रखे थे कि लंबा हो रहा, पुरानी साइकिल छोटी पड़ रही, साल दो साल में किसी काम की नहीं रहेगी, नई साइकिल लेने के काम आयेगी, जनाब को केक सूझ रहे, जब सब दोस्त साइकिल चलाएंगे तो क्या पैदल जाएगा स्कूल?, जा वापिस कर के आ केक….” पिता की खीझ कम होने की जगह बढ़ रही थी, “ दिन भर थके मांदे घर आओ और रात को जागो, ताकि अगले दिन काम पर ना जा सके बन्दा… लाइट बन्द करो और सो जाओ”,

बच्चे की कल्पना का महल टूट चुका था, यथार्थ उसके सामने था, उस पर वो इस अपराधबोध से भी ग्रस्त हो गया कि उसने पापा को उनके जन्मदिवस पर खुशी देने की बजाय परेशानी दी। बेहद उदासी से घिरा वो उस अंधेरे में उस बिस्तर पर बिल्कुल अकेला महसूस कर रहा था।

आज उसकी मासूमियत का पहला और सबसे मजबूत कवच टूट गया था, और दुनियां की कड़वी हकीकत से पहली मुलाकात थी, यूं तो हर एक को एक ना एक दिन अपनी मासूमियत खोनी ही पड़ती है, पर अफसोस की इस दुनियां के कसैले पन से रूबरू उसे उसके पिता ने करवाया।

पिता की नींद उचट गई थी, करवटें बदलते ही बाकी की रात बीती, बीच में एक बार पानी पीने उठा तो बेटे की तरफ नजर गई, एक तरफ दुबका हुआ था बिस्तर पर, एक पल को उसे पछतावा सा होने लगा पूरे प्रकरण पर, फिर दूसरे ही पल लगा, एक तरह से अच्छा ही है, फिजूल खर्च से बचेंगे आगे से, मैं क्या दुश्मन हूं, साइकिल के बिना रहेगा तो दोस्तों के बीच हीन भावना महसूस करेगा, इसी तरह के विचारों की उधेड़ बुन में आखिर सुबह हो गई”

उसने पास जा कर बेटे के सर पर हाथ फेरा,

“अरे, इसे तो बुखार लग रहा!”, एक दम से उसने पत्नी को कहा।

“सारी रात जागता जो रहा, थकान हो गई होगी, आप नहा कर तैयार हो जाए, ये जागेगा तो क्रोसिन दे दूंगी”

 उठ कर वो बाहर आ गया।

“कितना राक्षस हूं मैं!” उसने सोचा

 उसका पूरा चेहरा तन गया था, लग रहा जैसे किसी सैलाब ने पूरे चेहरे को जकड़ लिया हो, इस से पहले कि वो सैलाब फट पड़ता, उसने पानी से मुंह धोना शुरू कर दिया।

केक फ्रिज में पड़ा अपने कटने का इंतजार कर रहा था…..



नाम - हरदीप सबरवाल 

शिक्षा - MA (English) पंजाबी यूनीवर्सिटी पटियाला से

लेखन विधा- कविता और कहानी

लेखन भाषा - हिंदी, इंग्लिश और पंजाबी