तेरे शहर में



तेरे शहर में


धर्मदेव बहुत समय तक सोचता रहा कि कहीं देखा है उन्हें! लेकिन कहाँ? इसी ख्याल में वह अपने हॉस्टल तक पहुँच गया।

हॉस्टल पहुँचते ही उसे ध्यान आया, अरे! ये तो आरिफ चाचा हैं! फिर वह तुरन्त बाजार की ओर दौड़ पड़ा। वहाँ जाकर ध्यान से देखा- हाँ! ये आरिफ चाचा ही हैं, जो अब बहुत दुबले-पतले दिख रहे थे। चेहरे पर भी पहले जैसी तरो-ताजगी नहीं रही और कपड़े भी बहुत सामान्य। धर्मदेव समझ गया आरिफ चाचा का जीवन आज भी तितर-बितर है, तो इसके पीछे अतीत में घटी एक घटना है, जिस कारण वे अपने आपको पहले जैसा नहीं बना सके। स्थिति अब पूरी तरह बदल चुकी थी।

धर्मदेव को खड़े-खड़े कुछ समय बीत गया। अपनी ओर ताकते देख आरिफ चाचा ने उसे अपने पास बुला लिया। धर्मदेव ने सिर झुकाकर आदाब कहा।

‘‘बेटा, क्या सेवा करूँ?’’ आरिफ चाचा ने धर्मदेव के आदाब का जबाव देते हुए कहा।

धर्मदेव समझ गया कि आरिफ चाचा उसे पहचान नहीं पाए हैं। जैसे कुछ देर पहले तक वह भी उन्हें पहचान नहीं पाया था। दोनों एक-दूसरे को दस-बारह वर्षों बाद भी देख रहे थे। तब धर्मदेव आठवीं कक्षा का छात्र था। अब तो वह जवान हो गया था। चेहरे पर दाढ़ी-मूँछे आ गईं और शरीर की बनावट में भी अन्तर आ गया। फिर ऊपर से यह अजनबी शहर! तो कैसे पहचानते आरिफ चाचा उसे ?

‘‘आरिफ चाचा....ये मैं!’’ धर्मदेव ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘‘मैं धर्मदेव! आपके पुराने शहर गदरपुर का निवासी। आपके दोस्त जनार्दन श्रीवास्तव जी का लड़का!’’

‘‘अरे धर्मदेव तुम!’’ आरिफ चाचा एक पल चौंके! फिर खुशी से धर्मदेव का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहने लगे- ‘‘तू तो अब बड़ा हो गया है यार। तभी तो मैं सोचूँ कि ये कौन है जो इतने प्यार से मुझे देख रहा है। आ बेटे, आ। यहाँ बैठ जा।’’ आरिफ चाचा ने उसे एक स्टूल पर बिठा दिया।

फिर बातों का सिलसिला चल निकला। घर परिवार की बातें। पढ़ाई-लिखाई की बातें। दुनिया-जहान की बातें। इधर की बातें। उधर की बातें। फिर सारी बातें खत्म भी हो गईं और दोनों के बीच चुप्पी छा गई! परन्तु कुछ बातें अभी बाकी थीं, जिन्हें धर्मदेव जानना चाहता था। इसके लिए उसे चुप्पी तोड़ने की आवश्यकता थी।

‘‘आरिफ चाचा’’, धर्मदेव ने कहा- ‘‘मुझे उस घटना के बारे में बताइए! क्या वो मामला आपके और बलिया के बीच कुछ सुलझा? कुछ बातें तो मुझे मालूम हैं लेकिन मैं सब कुछ आपसे जानना चाहता हूँ, और इमरान, इमरान कैसा है?’’

इमरान को याद कर आरिफ चाचा की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर ली। तभी चाय वाला दो कप चाय दे गया। आरिफ चाचा ने अपने आँसुओं को पोंछते हुए चाय की तरफ इशारा किया। धर्मदेव ने एक कप चाय उठा ली और एक कप आरिफ चाचा को थमा दी।

अब तो बहुत दिन हो गए थे, उस घटना को। लगभग दस वर्ष! आरिफ चाचा इस बिन बुलाई लड़ाई को भूकंप का नाम देते थे, जिसने उनके जीवन को तहस-नहस कर दिया था। घटना को याद कर वे दुख के गहरे सागर में डूबने लगे। न चाहते हुए भी आज उन्होंने अतीत में कदम रख दिया। फिर भला अतीत को कोई भूलता है क्या? तो आरिफ चाचा कैसे भूल जाते?

पहली बार जब उन्होंने गदरपुर जैसे छोटे शहर में कदम रखा तो पूरी तरह अजनबी थे। लेकिन ज्यादा दिनों तक अजनबी-अनजान बनकर रह नहीं सके। जल्दी ही शहर सहित आस-पास गाँव के लोग उनको जानने-पहचानने और समझने लगे। भीड़ ज्यादातर उन्हीं की दुकान पर होती। वे मंझे हुए बारबर थे, इसलिए लोगों को उनका काम पसंद आ रहा था। उन्होंने अपनी दुकान का नाम रखा- ‘स्माइल हेयर ड्रेसर’। यहीं से धर्मदेव और आरिफ चाचा के बेटे इमरान की दोस्ती शुरू हुई। बाद में वे दोनों अच्छे सहपाठी भी बने। आरिफ चाचा की दुकान से थोड़ी दूरी पर ही धर्मदेव का घर था।

आरिफ चाचा का व्यवहार हमेशा ही दोस्ताना और दिलखुश रहा। उनका काम भी तो कुछ इसी प्रकार यानी सभी लोगों से मिलने-जुलने का था। माता-पिता जब अपने छोटे-छोटे बच्चों को बाल कटवाने लाते तो बच्चे कैंची देखकर रोने-चीखने लगते। आरिफ चाचा बच्चों से दोस्ती करने की कोशिश करते और उनको कविताएँ सुनाते।

कविताएँ सुनकर भी यदि बच्चे नहीं मानते, तो पता नहीं आरिफ चाचा उनके कानों में क्या कहते कि वे हँसी-खुशी बाल कटवाने लग जाते। आरिफ चाचा बच्चों के कानों में क्या कहते? ये टैकनिक, उन्होंने कभी भी किसी को नहीं बताई।

‘स्माइल हेयर ड्रेसर’खुलने से आरिफ चाचा की अच्छी कमाई होने लगी। कभी-कभार विशेष अवसरों पर बढ़ भी जाती थी। ग्राहकों के बढ़ने के कारण उन्होंने दो लड़के भी रख लिए थे। काम कभी ज्यादा हुआ तो इमरान भी स्कूल टाइम के बाद आ जाया करता था।

फिर वह दिन भी आया जिसकी टीस आज भी आरिफ चाचा को कुरेद रही है। रात के आठ बज रहे थे। टीवी पर भारत और पाकिस्तान का एक दिवसीय मैच चल रहा था। मैच देखकर कोई भी यह अनुमान लगा सकता था कि भारत की हार आज निश्चित है। दुकान में छह-सात जो भी लोग बैठे थे, उन सबकी नजरें टीवी पर चिपकी हुई थीं।

तभी हट्टे-कट्टे एक आदमी ने दुकान में प्रवेश किया। उसे देखकर साफ-साफ लग रहा था कि ये धन-बल के गरूर में नहाया हुआ आदमी है। उसकी नजरें भी टीवी पर चिपक गईं। ऐसा लग रहा था कि भारत की दयनीय स्थिति देखकर वह बहुत परेशान है।

‘‘क्या कहते हैं आरिफ भाई ?’’ दुकान में बैठे एक परिचित ने आरिफ चाचा से पूछा-‘‘भारत का कुछ होगा कि नहीं?’’

‘‘जनाबे-हिन्द! कुछ भी नहीं हो सकता?’’ आरिफ चाचा ने कहा- ‘‘भारत की दयनीय स्थिति देखकर कहीं से भी नहीं लगता है कि यह जीतेगा? पहले बैंटिंग खराब की, अब बॉलिंग और फिल्डिंग भी खराब कर रहे हैं। कैच भी छोड़ रहे हैं। इसलिए आज बहुत मुश्किल है भारत की जीत!’’

आरिफ चाचा की बातें सुनकर उस आदमी ने अब आरिफ चाचा की ओर देखा और मुँह बनाकर बोला- ‘‘तुम मुसलमान लोग रहते हो भारत में और गुण गाते हो पाकिस्तान के! कभी भारत की जीत बारें में भी सोचा है?’’ 

‘’भाई साहब! इसमें सोचना क्या है?’’ आरिफ चाचा ने उस आदमी से कहा- ‘‘जो कुछ भी है आपके सामने टीवी पर साफ-साफ है। मैं कह दूँ कि भारत जीत जाएगा तो कहने भर से क्या भारत जीत जाएगा। लेकिन आपका इस तरह कहना कि मैं पाकिस्तान का पक्ष ले रहा हूँ, ठीक नहीं। भाई साहब, मैं भारत का सच्चा पुत्र...’’

अचानक उस आदमी को क्या हुआ कि उसने आरिफ चाचा की बात पूरी होने से पहले ही उन्हें अपनी ओर खींच लिया और लगा पीटने। गुस्से में काँपकर बोला- ‘‘हरामखोर तुम...!’’ आरिफ चाचा एकाएक समझ न सके कि यह क्या हुआ? वह आदमी गंदी-गंदी गालियाँ देकर आरिफ चाचा को पीटने में लगा हुआ था। दोनों गुत्थम गुत्था हो गए। फिर आरिफ चाचा का उस्तरा भी चल गया।

उस्तरे का वार वह आदमी सहन न कर सका। चीखते-चिल्लाते हुए वह वहीं सिर पकड़ कर गिर पड़ा। फर्श पर खून ही खून फैल गया। आरिफ चाचा ने तब घबराते हुए अपने लड़कों से कहा-‘‘तौफीक-रफीक! तुरन्त भागो यहाँ से। रूकना ठीक नहीं।’’

जो लोग दुकान में बैठे थे, उन्होंने भी अपने घर की राह पकड़ ली। सब कुछ बहुत तेजी से घटा। चीख-पुकार सुनकर और सारा मंजर समझकर दूसरी दुकान पर खडे़ तीन-चार लोग आरिफ चाचा के पीछे लपके। लेकिन तब तक वे अंधेरी गलियों मे गायब हो चुके थे। उनको अंधेरे के अतिरिक्त कुछ भी न मिला।

उस्तरे के वार से घायल होने वाले आदमी का नाम बलिया था, जिसे आरिफ चाचा अच्छी तरह जानते थे। वह कुछ गुण्डा मिजाज का आदमी था और ब्याज पर पैसे लेने-देने का काम भी करता था। 

रात नौ-साढे़ नौ बजे तक ये खबर आसपास फैल गई कि आरिफ चाचा ने बलिया को जान से मारने की कोशिश की है। लोग तरह-तरह की बातें बना रहे थे। अन्दर ही अन्दर कुछ लोग ये भी कहते कि जब भी भारत-पाकिस्तान का मैच होता है तो बलिया किसी को पीटता है या किसी से पिटता है। बहरहाल! बलिया के आदमी लगातार आरिफ चाचा को ढूँढ़ रहे थे। वे लोग धर्मदेव के घर भी गए परन्तु वहाँ से भी निराश होकर लौटे। वे कभी नहीं जान पाए कि आरिफ चाचा, तौफीक और रफीक उन्हीं के घर में छुपे हुए हैं। घटना के समय इमरान यहाँ नहीं था।

आरिफ चाचा काफी डरे हुए थे, अतः वे जल्दी-जल्दी यहाँ से निकलना चाहते थे लेकिन जनार्दन श्रीवास्तव ने उन्हें रोका और कहा- ‘‘अभी जहाँ भी जाएँगे, तुरन्त पकड़े जाएँगे। इस समय सिर पर खतरा है। इसलिए आप तीनों तड़के सुबह अवसर देखकर निकलिए।’’

कुछ दिनों बाद जब बलिया की हालत में सुधार हुआ तो वह अपने आदमियों के साथ आया। दुकान लड़ाई वाले दिन से ही बंद थी। बलिया ने सबसे पहले दुकान के दोनों ताले तोड़े। शटर भी तोड़ डाली। बंदूक की बट से सारे शीशे भी तोड़ डाले। एक हँसती-खेलती दुकान चंद मिनटों में ही तहस-नहस हो गई। बलिया के इस काम को देखने के लिए एक अच्छी खासी भीड़ भी जमा हो चुकी थी। लेकिन भीड़ क्या बोलती? बस तमाशबीन बनकर रह गई। तमाशबीन बनकर तो दुकान के असली मालिक भी रह गए थे। अंत में ‘स्माइल हेयर ड्रेसर’ लिखे बोर्ड के छह टुकडे करते हुए बलिया ने फिल्मी अंदाज में धमकी दी कि आरिफ कहीं भी रहे, बच नहीं पाएगा। बलिया के साथ काफी लोग थे, जो बलिया के काम आने के लिए छटपटाए जा रहे थे।

इधर भी ऐसा नहीं कि आरिफ चाचा के साथ कोई नहीं था। उनके साथ वे लोग पूरी मजबूती के साथ खड़े थे जो घटना की रात दुकान में क्रिकेट मैच देख रहे थे। जनार्दन श्रीवास्तव तो उनके सुख-दुख में थे ही। इस प्रकार बहुत से लोग आरिफ चाचा की ओर थे, जो अच्छी तरह उनके व्यवहार से परिचित थे। इन लोगों ने मिलकर बलिया के परिवार वालों को बताया कि गलती किसकी थी? और किस तरह से बात आगे बढ़ी? उस समय तक शहर में इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिन्ट मीडिया की आवाजाही लगभग न के बराबर थी। जो अखबार दिल्ली से यहाँ पहुँचता था वो भी दूसरे दिन लगभग ग्यारह-बारह बजे। और सिर्फ अखबार ही पहुँचता था, कोई पत्रकार नहीं। अतः इस घटना को ज्यादा हवा नहीं लगी। अन्यथा वह घटना यदि आज के समय घट गई होती तो ये इलैक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिन्ट मीडिया, हिन्दू-मुसलमानों में दंगा करवा कर ही मानते। बहरहाल... इस लड़ाई के कारण आरिफ चाचा ने घर से निकलना बंद कर दिया। उनकी जमा पूँजी धीरे-धीरे खत्म होने लगी। चिन्ताग्रस्त दिन-रात वे यही सोचते थे कि जैसे-तैसे ये लड़ाई खत्म हो। वे ‘स्माइल हेयर ड्रेसर’को फिर से नया जीवन दें। अपने लिए, अपने परिवार के लिए।

दूसरी ओर बलिया के दोनों भाईयों ने भी यही फैसला लिया था कि ये कानूनी लड़ाई अब बहुत लम्बी हो गई है, अतः दोनों पक्षों के आपसी तालमेल से लड़ाई को यहीं विराम दिया जाए। इसलिए बलिया के दोनों भाईयों ने कम्प्रोमाइज करवाना ही बेहतर समझा, लेकिन बलिया न माना। इस तरह कानूनी लड़ाई चलती रही। दोनों पक्षों के पैसे खर्च होते रहे। इसका प्रभाव बलिया जैसे धनाढ्य व्यक्ति पर ज्यादा तो नहीं पड़ा लेकिन आरिफ चाचा जैसे व्यक्ति पर जरूर पड़ा। उनकी हालत जर्जर होने लगी। चिन्ता के कारण अक्सर बीमार भी रहने लगे थे।

‘’धर्मदेव बेटे!’’ आरिफ चाचा कह रहे थे- ‘‘और उसके बाद तो मैं और मेरे परिवार के लोग अच्छा खाने-पीने और ओढ़ने को तरस गए। मेरे अपने ही मुझे कोसने लगे। कहने लगे परिवार के वास्ते कभी-कभी मार भी खा लेना चाहिए। अब क्या कहूँ। इस लड़ाई ने, इस कानूनी दाव-पेंच ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। भला हो आपके पिता जनार्दन जी का और बलिया के दोनों भाइयों का कि जैसे-तैसे उन्होंने मामला सुलझाया और मुझे इस कानूनी लड़ाई से मुक्ति दिलवायी। परन्तु मैं जानता था कि ये लड़ाई कानूनी रूप से खत्म हो गई है लेकिन व्यक्तिगत रूप से नहीं। क्योंकि बलिया, काले साँप की तरह फुँफकार कर कभी भी मुझे डस सकता था, या मुझ पर हमला कर सकता था। यही सोचकर मैंने गदरपुर में दुकान खोलने का विचार त्याग दिया। और हमेशा के लिए अपने शहर चला गया। लेकिन मेरा शहर भी मुझे हरा-भरा न कर सका, तो आजकल इस शहर में आ गया हूँ।’’

धर्मदेव ने इमरान के बारे में जानना चाहा तो आरिफ चाचा फफक-फफक कर रो पड़े। कुछ देर शांत रहने के बाद बोले- ‘‘बेटा, बर्बादी के बाद, एक बड़ी खुशी अल्लाह ने मुझे दी। मेरा इमरान फौज में भर्ती हो गया। ये देखकर मुझ बूढ़े बाप की आँखों में चमक उभरी थी कि पोस्टिंग के ठीक सात महीनों बाद मेरे इमरान की लाश मेरे घर आ गई। वह आतंकवादियों के आतंक का निशाना बन गया। अब आगे क्या कहूँ?’’

धर्मदेव कुछ बोल नहीं पा पाया। क्या बोले? वातावरण में फिर खामोशी छा गई। आरिफ चाचा ने आँखों से आँसू पोंछते हुए कहा- ‘‘बलिया जैसे जो लोग सोचते हैं कि मैं मुसलमान हूँ और पाकिस्तान का पक्ष लेता हूँ! तो वह मुझे बताए कि फिर क्यों मेरा इमरान भारत देश के लिए मरा? और इसके बदले में मुझे क्या मिला? या भविष्य में क्या मिलेगा? क्या सच बोलने का भी डर है! वह सच जिसके कारण आज मैं इस अवस्था में हूँ। तभी समझ पाया कि विभिन्न प्रकार के रंगों को पहचाना तो जा सकता है किन्तु जीवन के रंगों की पहचान बहुत मुश्किल है। कम से कम मेरे लिए तो बहुत मुश्किल है।’’

आरिफ चाचा की बात सुनकर धर्मदेव ने एक गहरी साँस ली। उनकी दयनीय स्थिति देखकर सोचने लगा, अब इस बूढ़े बाप की गुजर-बसर कैसे होती होगी? धर्मदेव ने उनकी पहले की जिन्दगी देखी थी। कहाँ पहले सुन्दर-सुन्दर पहनावा। ठाठ-बाट, खाने-पीने की कोई कमी नहीं। बिलकुल क्लीन शेव्ड और कहाँ अब... लम्बी-लम्बी दाढ़ियाँ, गुरबत के दिन!

धर्मदेव ने महसूस किया कि वह यहाँ पिछले तीन घण्टों से है। इस बीच आरिफ चाचा के पास केवल एक ग्राहक आया, जिसे भी उन्होंने, उसके कारण सामने की दुकान पर भेज दिया था। धर्मदेव सोचने लगा कि इस शहर में जब इतने बडे़-बड़े स्टाइलिश सैलून हैं, तो चकाचौंध के इस युग में इस फुटपाथ पर कोई भूलवश ही आता होगा।

बाजार में चहल-पहल अब बढ़ गई थी। शाम के छह बजने वाले थे। धर्मदेव ने आरिफ चाचा से अब विदा लेनी चाही। आरिफ चाचा ने बस इतना ही कहा- ‘‘बाजार आना तो मिलते रहना। और अपने शहर जाओ तो श्रीवास्तव भाई को मेरा नमस्कार कहना। खुदा खैर करे।’’

अन्दर से उदास धर्मदेव अब अपने हॉस्टल की ओर चल पड़ा। उसकी आँखों में इस समय दो लोगों का चेहरा समाया हुआ था। एक इमरान का और दूसरा, आरिफ चाचा का।

अन्य रचनाएँ:


नाम : खेमकरण ‘सोमन’
जन्म : 02 जून 1984, रूद्रपुर, उत्तराखण्ड में 
शिक्षा : एमए0 (हिन्दी), बी0एड0, यूजीसी-सेट, यूजीसी नेट-जेआरएफ, हिन्दी लघुकथा में पी-एच0 डी0।

प्रकाशन:   

सब लोग, कथाक्रम, परिकथा, वागर्थ, यथावत, बया, कथादेश, पुनर्नवा, अनुनाद, पहली बार, पाखी, साहित्य अमृत, विभोम-स्वर, नया ज्ञानोदय, यथावत, सेतु, पुरवाई, दैनिक जागरण, आधारशिला, लघुकथा डॉट कॉम, कविता विहान, शैक्षिक दखल, युगवाणी, उत्तरा, आजकल, पाठ, लघुकथा कलश, कादम्बिनी, प्रतिश्रुति, संरचना, कृति ओर, अमर उजाला और अक्सर आदि पत्र-पत्रिकाओं- ब्लॉग में प्रकाशित। रचनाओं का आकाशवाणी रामपुर (उत्तर प्रदेश) से नियमित प्रसारण।